होने वाले महान व्यंग्यकार के लिये

आज रविवार का दिन था, सुबह सुबह ही दरवाजे पर लगी कालबेल बज उठी, घर भर सशंकित हो उठा कि आज कोरोना काल में कौन सी मुसीबत बिन बुलाये आ टपकी है, मैंने पहले दरवाजे पर लगे सूक्ष्म पारदर्शी ग्लास से झाँककर देखा परंतु पहचान न सका सो हिम्मत करके दरवाजा खोला, और आसन्न ख़तरे की आशंका से सुरक्षित दूरी तक पीछे हट गया वे मुँह पर मास्क लगाये हाथ में दस्ताने पहने, गले में अंगोछा डाले और हाथ में एक झोला लिये हुए थे, जैसे ही उन्होंने मास्क को थोड़ा नीचे खिसकाया तब मैं पहचान पाया कि वे ज्ञानी जी थे। मैंने हिम्मत करके उन्हें अंदर आमंत्रित किया और फिर स्वयं सोफे के दूसरे कोने पर जा बैठा ।

ज्ञानी जी ने बताया कि उनका नया व्यंग्य संग्रह ‘होने वाले महान व्यंग्यकार के लिये’ प्रकाशित हुआ है,जिस दिन छप कर आया उसके ठीक दूसरे ही दिन लॉक डाउन हो गया था अत: कल ही ऑनलाइन विमोचन हो सका और आज उसकी प्रति भेंट करने के लिये आये हैं । वे बोले- मैंने सुना है कि आप भी आजकल व्यंग्य लिखने लगे हैं, मैंने कहा – जी कोशिश कर लेते हैं । कहने लगे व्यंग्य लेखन कोई आसान विधा नहीं है जिसमें कोई भी हाथ आजमा ले और अपनी जगह बना ले, परंतु यदि आप महान व्यंग्यकार बनना चाहते हैं तो आपको निराश होने की कतई जरूरत नहीं है, बस आप सिर्फ एक बार मेरे व्यंग्य संग्रह में सुझाये मेरे नुस्खों को आज़मा कर देख लें, आप बहुत ही आसानी से शीघ्र ही, महान व्यंग्यकारों की श्रेणी में अपने जीवनकाल में ही आ खड़े होंगे।

वे आगे बोले- होने वाला महान व्यंग्यकार समाज की विसंगतियों और विद्रूपताओं पर निरंतर अपनी पैनी दृष्टि बनाये रखेगा और व्यंग्य के बाजार में हमेशा नये प्लॉट की तलाश में रहेगा । प्लॉट ठीक मिल गया तो समझें कि आपकी व्यंग्य यात्रा की अच्छी शुरुआत हो गयी । महान व्यंग्यकार प्लाट कब्जाने या अतिक्रमण में विश्‍वास नहीं रखेगा, वह व्यंग्य की बुनियाद सदैव निज नये प्लॉट पर ही रखेगा । अपनी पैनी नज़र सेनित नया प्लॉट खोजकर उसपर पाठकों की पसंद के अनुरूप रातोंरात व्यंग्य की इमारत खड़ी कर, छपने में सफल हो जाने वाला ही कल का महान व्यंग्यकार होगा ।
महान व्यंग्यकार उपलब्ध प्लॉट पर शब्दों के शिल्प के साथ उलटबाँसियों, कहावतों और मुहावरों का प्रयोग कररचना की खूबसूरती में चार चाँद लगा देगा । वह रचना तैयार करते समय प्लॉट की साइज और उसपर निर्माण की वांछित सीमा का सदैव ध्यान रखेगा,वह रचना में काँट छाँटका कोई भी अवसर सम्पादक को उपलब्ध नहीं करवायेगा । वह कदापि पुराने प्लॉटों पर व्यंग्य रचने  की जोखिम मोल नहीं लेगा वरन हमेशा नये प्लाट पर रचना तैयार कर छपने की संभावना कोप्रबल बनायेगा । होने वाला महान व्यंग्यकार, व्यंग्यकारों में नम्बर वन होगा। वह दूध का धुला होगा अन्यथा जिसका घर शीशे का हो फिर भला वह दूसरों के मकानोंपर पत्थर कैसे फेंक सकेगा, वह एक पत्थर दिल इंसान होगा तभी वह समाज की विद्रूपताओं और विसंगतियों पर सशक्त प्रहार कर सकेगा । वह शब्दों का बड़ा बाजीगर होगा, शब्दों को तोड़ना-मरोड़ना, उलटपलट देना उसके बाएँ हाथ का खेल होगा, वह मुँह का मीठा परंतु शब्दों का अत्यंत तीखा होगा । वह शब्दों के बाण चलाने वाला व्यंग्य की दुनिया का अर्जुन होगा,जिसकी दृष्टि तीक्ष्ण  तथा लक्ष्य भेदने में उसका निशाना अचूक होगा । वह मखमल में लपेट लपेट कर मारने में कुशल हस्त होगा ।

होने वाला महान व्यंग्यकार अपने शहर में होली के अवसर पर आयोजित होने वाले जोकर,मूर्ख सम्मेलन जैसे आयोजनों में शिरकत से अपनी व्यंग्य यात्रा की शुरुआत करेगा और मंचासीन  अतिथियों पर अपने व्यंग्य रूपी तीक्ष्ण बाणों से सतत तीव्र प्रहार कर अपने व्यंग्य की मारक क्षमता को सिद्ध करेगा । वह व्यंग्य के प्रेमवादियों और ज्ञानवादियों दोनों को साध कर चलेगा वह प्रगतिवादियों और रूढ़िवादियों को समान रूप से प्रिय होगा । महान व्यंग्यकार अपने व्यंग्यगुरु का प्रिय शिष्य होगा  परंतु वह एकलव्य के समान अपना अंगूठा गुरु दक्षिणा में देने की ऐतिहासिक भूल को कभी भी नहीं दोहरायेगा, वरन मौका आने पर अपने गुरु को भी अंगूठा दिखाने से नहीं चूकेगा। वह गुरु मार्ग से चार कदम आगे चल कर शीघ्र ही गुरु गुड़ और चेला शक्कर कहावत को चरितार्थ करेगा और वह दिन दूर नहीं जब वह स्वयं महान व्यंग्यकार बन बैठेगा ।
इतना कहकर अकस्मात वे उठ खड़े हुए, उन्हें और लोगों तक भी अपने व्यंग्य संग्रह की प्रतियां पहुंचानी थीं, उनके जाने के बाद मुझे ऐसा महसूस हुआ कि जैसे आज मेरे व्यंग्य गुरु ने मुझे साक्षात दर्शन देकर और वांछित ज्ञान बाँटकर मेरा मार्ग भी प्रशस्त कर दिया हो

-डॉ. तीरथ सिंह खरबंदा

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