टेंट हाउस के सामान से भी जरूरी हैं जो..!

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प्रकाश पुरोहित

नहीं पता कि किस घड़ी में उन्हें बुद्धिजीवी मान लिया गया था। वे भी नहीं जानते कि उनसे ऐसा क्या हो गया था कि बुद्धिजीवी का तमगा उन पर लग गया। वे खुलकर हंसना चाहते हैं, फिजूल-सी बातें करना चाहते हैं, ‘बजरंगी भाईजान’ और ‘जज्बा’ जैसी फिल्में सिनेमाघर में देखना चाहते हैं, मगर मन मसोस कर रह जाते हैं। जब कभी वे खुद को टटोलते हैं, तो पाते हैं कि उनमें ऐसा तो कुछ भी नहीं है कि उन्हें ऐसा-वैसा यानी बुद्धिजीवी मान लिया जाए, मगर कहते हैं ना कि होनी को कौन टाल सकता है, तो वे भी हालात से समझौता करते हुए बुद्धिजीवी बने रह गए।
अब हालत यह है कि जब भी शहर के किसी मामले पर मुख्यमंत्री या कलेक्टर या किसी और को कुछ शगल करने का मन होता है, तो उन्हें न्यौत लिया जाता है। उनका दर्जा चूंकि बुद्धिजीवी का होता है, इसलिए कहने को तो कम मिलता है, सुनना ज्यादा पड़ता है। कई बार तो उन्हें यही लगता है कि आज जो कुछ कहा-सुना जा रहा है, पहले भी कई बार ऐसा कहा-सुना जा चुका है। कुछ चेहरे, खास तौर पर मंच पर धरे हुए, ही बदलते हैं, वरना तो सेम-टू-सेम यानी दे जा वू होता है। उन्हें इस तरह के जमावड़े में नींद भी खूब आती है। चूंकि, बुद्धिजीवी हैं, इसलिए आंखें बंद कर चिंतन की घनघोर मुद्रा में वे झपक भी लेते हैं। जानते हैं, बाबूलालजी ने अपनी जापान यात्रा से बात शुरू की है, तो रूस तक पहुंचने में आधा घंटा तो लग ही जाएगा।
कल्पना कीजिए कि किसी अभागे शहर में अगर बुद्धिजीवियों की रेवड़ ही न हो, तो राजनीति के गड़रिये किसे हांकने जाएंगे, इसीलिए कोशिश यही करते हैं कि एक बार जो हाथ लग गया, उसे अंतिम सांस तक बुद्धिजीवी बनाए रखा जाए। एक तो इनकी नई लिस्ट नहीं बनानी पड़ती और एक लंच, एक डिनर, एक हाई-टी में ये लोग घंटों बैठे रहते हैं। इस बात का डर ही नहीं रहता है कि भीड़ आएगी या नहीं। सौ को बुलाओ तो चेले सहित सवा सौ तो चले ही आते हैं।
इनकी एक खूबी रहती है कि अपनी जुबान से कभी पलटते नहीं हैं। पहली बार जो भाषण दिया था, आज भी उस पर कायम हैं। सरकार किसी भी दल की हो, ये बात एक ही बोलते हैं। यह इनकी अति विनम्रता ही कही जाएगी कि बेहूदे से विषय पर भी इन्हें बोलने के लिए बुलाया जाए तो इंकार नहीं करते हैं, क्योंकि विषय इनके बोलने का तरीका नहीं बदल सकता, भाषा नहीं बदल सकता, इन्हें नहीं बदल सकता।

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