ताकि बनी रहे इनकी मुस्कान…

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रीता मोदी

बच्चियों में किशोरावस्था का दौर सबसे निर्णायक और महत्वपूर्ण होता है। उनके कई सवाल होते हैं जिनका जवाब देने वाला कोई नहीं होता। अगर उम्र के इस दौर में उन्हें सही मार्गदर्शन मिल जाए तो इनका पूरा जीवन संवर जाता है और गलत राह पर चल पड़े तो जिंदगी बिखरते देर नहीं लगती है। हमारे समाज में आम तौर पर महिलाओं व युवतियों के बारे में बहुत अधिक चिंता की जाती है और ऐसा मानकर चला जाता है कि उनकी ही बातों में किशोरियों की समस्याएँ भी शामिल हो जाती हैं, जबकि उन पर अलग से विचार होना चाहिए। किशोरियों के स्वास्थ्य, शिक्षा के प्रति उनका व्यवहार तथा उनकी सुरक्षा भी बहुत संवेदनशील विषय है। उनके जीवन में एक ऐसा मोड़ आता है, जब उन्हें गंभीर परामर्श की जरूरत होती है, जिससे कि वह घबराएं या डरे नहीं।
यूनिसेफ की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में 15 से 19 साल की उम्र के बीच की लगभग 77 प्रतिशत किशोरियाँ यौन हिंसा का शिकार बनी हैं। हमारे देश में किशोरियों का जीवन इनके अलावा और भी कई तरह की समस्याओं से ग्रस्त है, जिन्हें अलग से तवज्जो देनी होगी। यहां लड़कियां आम तौर पर 8 वीं कक्षा के बाद पढ़ना छोड़ देती हैं। उनकी शादी भी जल्दी ही कर दी जाती है। अक्सर उन्हें अपनी इच्छा के विरुद्ध मां बनना पड़ता है। कम उम्र में गर्भधारण से कई तरह की समस्याओं से वे जिंदगी भर जूझती रहती हैं। महिलाओं की असमय मौत का यह एक बड़ा कारण होता है। किशोरियों की सबसे मुख्य समस्या उनकी सुरक्षा को लेकर है। विभिन्न सर्वेक्षणों में पता चला है किशोरियों का शोषण उनके परिवार के किसी अत्यंत निकट अथवा उनके परिचितों में से ही किसी के द्वारा किया जाता है। इसका मुख्य कारण यह है कि किशोरियों को इस दिशा में पूरी तरह से सचेत नहीं किया जाना है।
वहीं एक चौंकाने वाला सच ऑस्ट्रेलियाई शोध में भी सामने आया है कि किशोरावस्था में लड़कों की तुलना में लड़कियों के मानसिक विकार जैसे रोग से ग्रसित होने की आशंका लगभग दोगुना होती है। मेलबर्न के मिशन ऑस्ट्रेलिया और सिडनी के ब्लैक डॉग इंस्टीट्यूट की संयुक्त रिपोर्ट में कहा गया है कि आस्ट्रेलिया के 15 से 17 साल आयु वर्ग की किशोरियों-किशोरों के मनोवैज्ञानिक समस्याओं से पीड़ित होने के संकेत सामने आए हैं। आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि किशोरियां मानसिक रोगों की चपेट में ज्यादा आती हैं। कई ऐसे कारक हैं जिनका असर उन पर ज्यादा होता है। दुनिया भर में किशोरियों की इस स्थिति में बदलाव लाने के लिए अब इस पर भी ध्यान देने की कोशिश की जा रही है। संयुक्त राष्ट्र ने इसे महसूस कर उनकी समस्याओं को अपने सस्टेनेबल डेवेलपमेंट गोल्स 2030 के लक्ष्यों में शामिल किया है। ‘द पावर ऑफ द अडोलसेंट गर्ल विजन फॉर 2030’ उनका विशिष्ट अजेंडा है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून ने अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस के मौके पर इसकी घोषणा की। उन्होंने कहा कि किशोरियों को कम उम्र में शादी, अनचाहे गर्भ और एचआईवी के संक्रमण से बचाना और उचित शिक्षा तथा विकास के अवसर उपलब्ध कराना एक सबक है। उनके लिए सरकार को कई स्तरों पर प्रयास करने होंगे। ऐसे समय के लिए किशोरियों को परामर्श देने की उचित व्यवस्था होनी चाहिए। यहां तक कि उनकी माताओं को भी विशेष प्रशिक्षण द्वारा सचेत व जागरूक किया जाए, ताकि वे अपनी बेटियों को उचित मार्गदर्शन दे सकें। अभिभावकों खासतौर पर माँ और परिवार की अन्य महिला सदस्यों का यह विशेष दायित्व बनता है कि वह किशोरावस्था की ओर कदम बढ़ा रहीं अपनी बेटियों की सहेली बनकर उनकी बात सुनें और उनकी समस्याओं को दूर करने का प्रयास करें ताकि वे पूरे आत्मविश्‍वास के साथ आगे बढ़ सकें।

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