प्रशंसनीय स्वीकारोक्ति

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इंदौर में प्रारम्भ हुए अंतर्राष्ट्रीय धर्म धम्म सम्मेलन के लिए इससे अधिक प्रासंगिक समय दूसरा नहीं हो सकता था। साम्प्रदायिक तनाव, हिंसा और धर्म को लेकर कट्टरपंथी अभिव्यक्तियों के बीच यह  सम्मेलन आमजन से ज्यादा उन राजनीतिज्ञों की आँखें खोलने के काम आ सकता है जो अपने छोटे-छोटे राजनीतिक हितों के लिए धार्मिक भावनाओं के साथ खिलवाड़ करते हैं और इसकी कीमत निर्दोष आमजन को चुकानी पड़ती है। दादरी कांड की पृष्ठभूमि में हो रहे इस सम्मलेन में मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान के कथन पर विशेष तौर पर गौर किया जाना चाहिए। मुख्यमंत्री ने बिलकुल ठीक ही कहा है कि धर्म का मकसद मारकाट और लड़ाने भिड़ाने के लिए नहीं है। यही बात है जो इस वक्त देश के कुछ कट्टरपंथी संगठन और कतिपय पड़ोसी देश समझने के लिए तैयार नहीं हैं। वे मान भी नहीं रहे हैं और अपनी करनी से बाज भी नहीं आ रहे हैं। जियो और जीने दो का मूल मानवीय मन्त्र, जिसका उल्लेख शिवराज सिंह ने भी अपने उद्बोधन में किया है, केवल भारत के लिए ही नहीं वरन् पूरे विश्‍व के लिए है। जहाँ-जहाँ जीवन है, वहां-वहां इस बात की जरूरत है। बात बहुत सीधी है, साफ़ है, सरल है लेकिन कुछ लोग इसे समझने के लिए तैयार नहीं हैं। ग्रन्थ भरे पड़े हैं इस समझाइश से, समय गुजर गया यह समझाते समझाते लेकिन समाज से मारकाट वैमनस्य, नफरत ख़त्म नहीं हो रही है।  इसके भी कारणों पर गौर करना चाहिए। क्यों यह स्थिति बदल नहीं रही है। धर्म में भी यही मकसद सबसे ऊपर लिखा जाता है, यही प्रवचन दिए जाते हैं लेकिन धर्म सभा से निकलते ही सब भूल कर उसी नफरत में, उसी वैमनस्य मेें लग जाते हैं। मुख्यमंत्री ने ठीक ही कहा है कि इस समस्या को दूर करने में धर्म गुरुओं का भी योगदान कम नहीं है। मुख्यमंत्री की इस स्वीकारोक्ति को देश के सभी नेताओं को स्वीकार करना चाहिए कि जनता और समाज की सभी बुराइयों और समस्याओं को नेता दूर नहीं कर सकते हैं। शायद यह पहला मौक़ा है कि किसी सक्रिय राजनीतिज्ञ ने राजनीति की इस बेबसी को सार्वजनिक रूप से साफ़ शब्दों में स्वीकार किया है। वे इसके लिए न केवल बधाई के पात्र हैं बल्कि आज की राजनीति में फैले स्वार्थ के अंधेरे में आशा की किरण भी हैं। अब तक के इतिहास के आधार पर यह विश्‍वास भी जताया जा सकता है कि शिवराज सिंह अपने ये शब्द वापस नहीं लेंगे और ना ही ऐसा कोई उदाहरण पेश करेंगे जो उनके शब्दों को झुठलाता हो। उनका यह वक्तव्य वैसे तो सभी के लिए हितकारी है लेकिन ख़ास तौर से भाजपा के उन नेताओं और  उन सहयोगी संगठनों को इस पर गंभीरता के साथ विचार करना चाहिए जो धर्म को दूसरों को पराजित करने का हथियार समझते हैं और कट्टरपंथी विचारों को ही धर्म मानते हैं। आशा की जाना चाहिए कि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान के इन विचारों से अच्छे दिनों की शुरुआत होगी। यह भी उम्मीद निरर्थक  नहीं है कि उनके इन विचारों पर पार्टी के भीतर भी सकारात्मक वातावरण बनेगा।

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