ब्यूटी पॉर्लर वाली बाई!

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विशेष प्रतिनिधि

डुप की 35 वर्षीया मेड सविता दगड़ू कदम सुबह मैनेजमेंट प्रोफेशनल गोपाल कुलपति के फ्लैट में काम करती हैं और शाम को भांडुप के टेंभीपाड़ा में एक ब्यूटी पॉर्लर चलाती हैं। घाटकोपर की 45 वर्षीय भारती ‘डेलीसेवा’ में ट्रेनिंग के लिए जाया करती हैं। 75 वर्षीय अर्जुन दाजी मुलुंड की छेड़ा फैमिली का कहने को नौकर है, पर है उसका सदस्य। उस परिवार में काम करने वाली अर्जुन की महाराष्ट्रियन मां मरने से पहले अपने बेटे को परिवार के सुपुर्द कर गई थी।
सविता और भारती मुंबई के उन घरेलू कामगारों में से हैं जिन्होंने नए हुनर सीखकर अपनी तकदीर बदल डाली है। आज इन बाइयों की मदद के लिए लरलरक्षेल.लेा जैसे ऑनलाइन जॉब पोर्टल और ढहश चरळवी उेारिपू (ढचउ) जैसी कई एजेंसियां हैं जो सेहत, साफ-सफाई, गैजेट्स चलाने, मेहमानों का स्वागत, फस्ट एड हैंडिल करने, आदि के टिप्स के साथ उन्हें प्रशिक्षित करती हैं। यही नहीं, घर मालिक भी ग्रूमिंग के लिए उन्हें कुकिंग क्लासेज में भेजा करते हैं जहां से सीख-पढ़कर आने का मतलब है बढ़ी डिमांड और बेहतर सैलरी। खोकू पात्रा ने संजीव कपूर के पॉपुलर टीवी शो ‘मास्टर शेफ’ का डे कांपिटीशन जीता है और मनोज गुरंग के पास आज अपना होटल है। अंग्रेजी बोलने वाले और एनआरआई घरों मे काम करते इन मेड्स ने अंग्रेजी भी सीख ली है। वे फेसबुक अकाउंट्स और वाट्सएप धड़ल्ले से ऑपरेट करती हैं और सैलून और पॉर्लर रेगुलर जाया करती हैं।
अब पहले से खुशहाल
पिछले वर्षों में बढ़ी आमदनी से घरेलू नौकरों का जीवन-स्तर बढ़ा है। मुंबई और दिल्ली जैसे कई शहरों में आज उनकी आमदनी ऑफिस में नौकरियां करने वाले कई लोगों से भी ज्यादा है। बर्तन धोने के अलावा उन्हें सुखाने और यथास्थान रखने के रेट अलग हैं। दो बार आने पर ज्यादा मिलता है, संडे की छु्ट्टी और पेंशन अलग। परेल, मुंबई के अशोक टॉवर में काम करने वाली गीता राजपूत 25 हजार माहवार कमाती है जिसकी बचत से वे अपने बच्चों को इंग्लिश मीडियम स्कूलों में पढ़ाती हैं और अपना घर खरीदने का सपना भी देखती हैं। उनके घरों में टीवी, फ्रिज, एलसीडी टीवी ही नहीं, लैपटॉप, टैब्लेट और डिश एंटीना भी देखे जा सकते हैं।
देश के करोड़ों घरेलू कामगारों में आज अपने अधिकारों और महत्व के प्रति जो नई चेतना आई है वह सिर्फ कामगार संरक्षण उपायों और बढ़ी जागरूकता का परिणाम नहीं है। इसके पीछे सहृदय ‘साहब’ लोगों की उस नई जमात का भी हाथ है जिसने उनमें बराबर होने का विश्‍वास ही नहीं पैदा किया है, उन्हें सपने देखना भी सिखा दिया है। उनके घरों में इन नौकरों में कुछ के आज खुद के कमरे हैं, डाइनिंग टेबल पर नियत जगह और किचन के साथ टीवी के रिमोट पर भी कंट्रोल है। उन्हें मोबाइल के साथ शादियों में महंगे उपहार मिलते हैं। कुछ तो अपने मालिकों के साथ ही सिनेमा, थिएटर, रेस्टोरेंट, जिम और वेकेशन पर भी जाया करते हैं।
नैशनल डॉमिस्टिक वर्कर्स मूवमेंट के प्रमुख जियेनी डिवोस स्वीकार करती हैं, ‘पिछले 30 साल में जबसे हमने घरलू कामगारों के लिए काम करना शुरू किया माली हालत के साथ उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा भी बढ़ी है। मसलन, थियेटर क्षेत्र की जानी-मानी हस्ती अलीक पदमसी जिन्होंने उनके लिए बैंक अकाउंट खुलवाने के साथ पी.एफ. और मेडिकल जांच और मेडिकल इंश्योरेंस जैसी सुविधाएं मुहैया कराई हैं और मेड की बेटी को दी शैक्षिक मदद के बूते पर उसकी बेटी विल्सन कॉलेज से ग्रेजुएशन करके एक ऐड फिल्म कंपनी में जॉब करने लगी है।
संरक्षण से दूर
सुबह से देर रात तक काम, बासी व घटिया खाना, आने-जाने पर पाबंदी, झूठे आरोप और बात-बात में डांट-डपट व पिटाई-देश के घरेलू नौकरों की नियति है। असंगठित क्षेत्र में होने के कारण ज्यादातर घरेलू नौकरों को निर्धारित वेतन, छुट्टियां या दूसरे लाभ नहीं मिलते। घरेलू नौकरों को ‘वर्कर’ के बजाय ‘व्यक्तिगत सेवा’ मानने से झाडू-पोछा करने और कपड़े व बर्तन साफ करने वाली बाई, आया और बेबीसिटर, आदि ये कामगार उस संरक्षण से दूर हैं जो ऑफिस और फैक्टरी जैसे संगठित ही नहीं, कुछ असंगठित क्षेत्रों के कामगारों को भी हासिल हैं। कई मामलों में उनकी हालत बंधुआ गुलामों से भी गई-गुजरी है।
देश में घरेलू कामगारों की संख्या न्यूनतम पचास लाख और अधिकतम तीन करोड़ होगी। इन कामगारों ने अब अपनी मान्यता, नियमन व संरक्षण के लिए एक समुचित कानून बनाने की मांग की है। देश के 15 राज्यों के 20 से ज्यादा संगठनों ने नैशनल प्लेटफॉर्म ऑफ डॉमिस्टिक वर्कर्स के झंडे तले एकत्र होकर शिकायत की है कि डॉमिस्टिक वर्कर्स (कंडीशंस ऑफ एंम्प्लायमेंट) कानून में उनके हितों को पर्याप्त संरक्षण नहीं है। न्यूनतम मजदूरी कानून में शामिल करने की मांग भी बहुत समय तक अनसुनी रही। पर, अब घरेलू कामगारों के हितों की रक्षा के लिए केंद्र सरकार एक राष्ट्रीय नीति के मसौदे को अंतिम रूप दे रही है जिसके तहत सामाजिक सुरक्षा और अनिवार्य अवकाश के साथ न्यूनतम वेतन के प्रावधान के साथ प्लेसमेंट एजेंसी के जरिए कांट्रैक्ट के माध्यम से ही नियुक्ति करनी पड़ेगी और स्किल्ड फुल टाइम नौकर को कम से कम 9000 रुपये माहवार वेतन देना पड़ सकता है। एक महीने की पेड लीव, दो महीने की पेड मैटर्निटी लीव और एक साप्ताहिक छु्टटी के साथ उनके रहने व खाने की उचित व्यवस्था करनी पड़ेगी और प्राविडेंट फंड और चिकित्सा व जीवन बीमा सहित सामाजिक सुरक्षा भी देनी होगी।

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