आमिर और असहिष्णुता की बहस में खपती युवा ऊर्जा

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मीडिया में खबरों के बवंडर का उठाना और उतनी ही जल्दी शांत हो जाना कोई नयी बात नहीं है। तीन दिन पहले उठा, आमिर ख़ान और उनकी देश-भक्ति से जुड़ा बवंडर भी अब ठंडा होने को है। थोड़ी बहुत हलचल यहाँ-वहाँ है, पर कुछ ही दिनों में वह भी पूरी तरह ख़त्म हो जाएगी। और इसके साथ आम जनता के बीच छिड़ी बहस को भी विराम लग जायेगा। ज़्यादातर लोग इस तर्क-वितर्क का विश्लेषण कर अपनी राय बना चुके हैं की भारत में सहिष्णुता या असहिष्णुता और आमिर खान देश-भक्त या देश-द्रोही। 

इस बहस के अंत में, अगर हम कुछ क्षणों के लिए निष्पक्ष होकर देखें तो महसूस करेंगे की यह बहस कितनी निरर्थक थी। क्योंकि हम पाएंगे की इस बहस के अंत में हमारे हाथ ‘आमिर खान’ के बारे में बनायी गयी ‘राय’ के सिवाए कुछ नहीं लगा है। कुछ समय बाद अगर हम पलट कर देखें तो हंसेंगे की इस तरह के मुद्दे ने हमें दो फाड़ बाँट दिया था। लेकिन इसी सतही दो फाड़ के नीचे, कहीं गहराई में इस बहस का सार्थक सार छिपा है।

वह सार यह नहीं की भारत में असहष्णिुता है या नहीं, पर यह है की भारत का युवा वर्ग बहुत ही ऊर्जावान है, और देश भक्त भी। वह युवा वर्ग जो आमिर को लेकर पक्ष-विपक्ष में अलग तो है लेकिन देश भक्ति के एक अटूट सूत्र में बंधा है। जहाँ एक पक्ष को भारत की वैश्विक छवि की चिंता है, तो दूसरे को भारत की संप्रभुता की। और यहीं पर पक्ष-विपक्ष की रेखाएं फीकी पड़ जाती हैं, और क्षमताओं से भरा, एक ऐसा युवा भारत उभर कर दिखता है जिसकी रग-रग में देश भक्ति और ऊर्जा का संचार हो रहा है। अगर हम पूरे विश्व में देखें तो ऐसा ऊर्जावान और देश भक्त युवा वर्ग इतनी बड़ी तादाद में कहीं नहीं मिलेगा, और यही क्षमता हमें एक ऐतिहासिक मोड़ पर ला खड़ा कर देती है जहाँ से भारत के उज्जवल भविष्य का रास्ता निकलता है।

शायद यह कहना गलत नहीं होगा की इस समय, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथ में भारत की बागडोर, उज्जवल भविष्य की उन संभावनाओं को और बढ़ा देती हैं। क्योंकि मोदी से भारत के उस ऊर्जावान युवा वर्ग का जुड़ाव अभूतपूर्व है। आजादी के समय और उसके कुछ दशक बाद तक भी, स्वतंत्रता संग्राम से निकले नेताओं के राष्ट्र आव्हान में आहुति देने लोगों का निकलना आम बात थी। पर उस पंक्ति के आखिरी नेता लाल बहादुर शास्त्री थे। शास्त्रीजी के राष्ट्र योगदान में एक वक़्त के उपवास का आव्हान और उनका ‘जय जवान जय किसान’ का नारा उस क्रम में आखिरी था। अब करीब आधी सदी बाद एक ऐसा प्रधानमंत्री भारत को मिला है जिसके आव्हान पर देश का युवा वर्ग निकल पड़ता है, फिर चाहे वो ‘स्वच्छ भारत’ हो या ‘मेक इन इंडिया’। वह आमजन का मोदी से जुड़ाव ही है जिसने इन अभियानों को घर-घर का नारा बना दिया है। याद करें की ऐसा पिछली बार कब हुआ था जब प्रधानमंत्री के एक आग्रह पर 50 लाख लोगों ने देश के विकास में एलपीजी सब्सिडी जैसा स्वैच्छिक योगदान दिया था? नरेंद्र मोदी ने भारत में देशभक्ति की उमंग एक बार फिर जगाई है। उनके ‘इंडिया-फर्स्ट’ के नारे ने लोगो को देश के विकास से जुड़ने का और योगदान देने का मौका दिया है।

और यही मौका एक ऐसे पड़ाव का संकेत है जो इतिहास में बार-बार नहीं आता। एक प्रधानमंत्री के पीछे ऐसी ऊर्जावान शक्ति, और प्रधानमंत्री का उस शक्ति को किसी भी दिशा में मोड़ देने का माद्दा, एक ऐतिहासिक समयबिन्दु को दर्शाता है। और यही नरेंद्र मोदी के लिए सबसे बड़ी चुनौती भी है। क्योंकि भारत की इस देशभक्त युवा ऊर्जा को कहाँ मोड़ना है, यह उन पर निर्भर करता है। अभी तो ऐसा लग रहा है की इस युवा ऊर्जा का सही उपयोग नहीं हो रहा है। क्योंकि फिलहाल वह युवा वर्ग आमिर खान की देश भक्ति पर सवालिया निशान लगा एक निरर्थक बहस में पड़ा दिख रहा है। वह युवा वर्ग ‘स्नैपडील’ को सज़ा देते हुए #appwapsi जैसी नकारात्मक मुहिम में एक भारतीय कंपनी का मोबाइल एप्प अनइंस्टॉल करने में लगा है। वही युवा वर्ग देश-भक्ति के अलग-अलग मायनों में दो फाड़ हो आपस में लड़-भिड़ रहा है।

यह ज़रूर है की भारत की इस ऊर्जा को सकारात्मक दिशा में प्रवाहित करना बहुत चुनौतीपूर्ण है। लेकिन यही चुनौती प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजनेता और राष्ट्रनेता बनने के बीच खड़ी है। अब ज़िम्मेदारी प्रधानमंत्री पर है की वह कैसे पूरे देश को एक सूत्र में बाँधने वाला नारा देते हैं। अब दारोमदार उन पर है की वह कैसे आपस में भिड़ी इस दो-फाड़ युवा पीढ़ी को एक जुट कर सही दिशा देते हैं। डर सिर्फ यह है की कहीं प्रधानमंत्री और हमारा युवा वर्ग, दोनों ही हनुमान की तरह, अपनी इस शक्ति से अनजान विकास के सागर को लांघने से न रह जाएं। और पता चले फिर किसी दिन किसी निरर्थक बहस में देश का विकास कहीं खो जाये। तब इतिहास हमें इस मौके को गंवाने के लिए माफ़ नहीं करेगा।

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