अच्छा पैकेज, प्लेसमेंट और आईआईटी की अनुकरणीय पहल

दो दिन पहले देश के सभी आई.आई.टी. ने साथ मिलकर फैसला लिया कि वे अब अपने छात्रों के प्लेसमेंट आंकड़ों का खुलासा नहीं करेंगे। इसके पीछे कारण छात्रों के ऊपर बढ़ता दबाव बताया गया। आई.आई.टी. खड़गपुर के करियर विकास केंद्र के अध्यक्ष श्री सुधीर कुमार बरई के अनुसार, छात्रों के सैलरी पैकेज का खुलासा करने से उन पर “पियर प्रेशर” यानी प्रतिद्वंदिता का दबाव बढ़ रहा था, और साथ ही उनके माता-पिता और समाज की बढ़ती आकांक्षाएं भी तनाव का कारण बन रही थीं। यह ख़बर अपेक्षित रूप से आई-गयी हो गयी। पर इस खबर का अवलोकन पिछले कुछ दशकों के व्यावसायिक और तकनिकी शिक्षा के परिपेक्ष में करें तो हम जानेंगे कि इस ख़बर का जितना स्वागत किया जाये कम है। देश के सभी आई.आई.टी. ने मिलकर जो एक शुरुआत की है, अगर सभी शिक्षण संस्थान अपना लें तो हमारी शिक्षा प्रणाली के लिए विलम्बित पर एक बहुत ज़रूरी बदलाव होगा। वह बदलाव जो हमारी इस ‘शॉर्ट-कट’ पीढ़ी को सही रास्ते पर लाने के लिए बहुत आवश्यक है।  

कई दशकों से भारत में बच्चों को इंजीनियर या डॉक्टर बनाना हर माता-पिता का सपना रहा है, और इंजीनियरिंग में आई.आई.टी. में दाखिला उन सपनों का शिखर। एक मिडिल क्लास परिवार के लिए सफल और संपन्न बनने की इससे अच्छी गारंटी कोई और नहीं थी। और इसीलिए आई.आई.टी. में चयन भारत के मिडिल क्लास लोगों के सपनों का अभिन्न अंग रहा है। इन सपनों को वास्तविकता में बदलने के लिए एक संस्थागत व्यवस्था देश में फलीभूत हुई जिनके दो अहम हिस्से थे; कोचिंग क्लास और निजी शिक्षण संस्थान। और दोनों ने ही आई.आई.टी. की ही तरह आंकड़ों का ऐसा तान-बाना बुना जिसने देश में एक ‘शॉर्ट-कट’ पीढ़ी को जन्म दिया। 

इस शॉर्ट-कट पीढ़ी की शुरुआत तब हुई जब आई.आई.टी. की परीक्षा में चयन के लिए ‘असेंबली लाइन प्रोडक्शन’ जैसी कोचिंग क्लासेज हमारे यहाँ शुरू हुईं। हज़ारों की तादाद में छात्र इन कोचिंग क्लास में मौलिक और प्रायोगिक ज्ञान नहीं, पर प्रश्न हल करने के ‘शॉर्ट-कट’ सीख रहे थे। इन संस्थानों में छात्रों में फ़िक्र इस बात की नहीं थी कि जो सीखा है उसका असल जीवन में उपयोग कहाँ होगा, पर इस बात की थी प्रश्न हल कर जवाब पर जल्द से जल्द कैसे पहुंचा जाये। और तो और इन कोचिंग क्लासेज ने आई.आई.टी. में उत्तीर्ण अपने ‘रैंकर्स’ का प्रचार-प्रसार भी ज़ोरों से किया। उस प्रचार-प्रसार में उन छात्रों की रैंक तो काफी अच्छे से बयान करी गयी, लेकिन उस रैंक के पीछे की गयी मशक्कत कहीं दिखाई नहीं दे रही थी। और सिर्फ वही ‘रैंक’ देख कर कई और हज़ार छात्र आई.आई.टी. में चयनित होने के शॉर्ट-कट सीखने की होड़ में लग गए। 

सन 2000 के कुछ साल बाद तक भी आई.आई.टी. में प्रवेश क्षमता बहुत कम थी। देश के बाकी सरकारी संस्थान भी आर्थिक उदारवाद और सूचना प्रौद्योगिकी की क्रांति से उपजी इंजीनियर और प्रोफेशनल्स की मांग को पूरा नहीं कर पा रहे थे। उस समय जिन लोगों के लिए आई.आई.टी. और उनके जैसे संस्थान पहुँच के बाहर थे, उनके लिए  निजी इंजीनियरिंग और व्यावसायिक कॉलेज उन दूरस्थ सपनों तक पहुँचाने की सीढ़ी बनकर उभरे। पर जैसे-जैसे इन संस्थाओं की संख्या में इजाफा हुआ और प्रतिस्पर्धा बढ़ी, यह संस्थान भी छात्रों को आकर्षित करने के लिए आंकड़ों के प्रचार-प्रसार में लग गए। बड़े-बड़े होर्डिंग, बैनर और पूरे पेज के अख़बार विज्ञापन इन कॉलेजों में पढ़ते कामयाब छात्र और उनके लाखों-करोड़ो के पैकेज से भरे थे। 

अच्छे से अच्छी कंपनियों और ज़्यादा से ज़्यादा पैकेज पर चयनित छात्र उसी संपन्न और सफल जीवन को दर्शाते थे, जो हमारे मिडिल क्लास के लिए सबसे बड़ा प्रलोभन थे। पर यहाँ भी यह कॉलेज जो नहीं बता रहे थे वह थी उन चयनित छात्रों की मेहनत और लगन जिसने उन्हें सफल बनाया था। इन विज्ञापन और प्रचार-प्रसार को देख छात्रों को एक और शॉर्ट-कट का भ्रम हो गया था। छात्रों और पलकों को लगा कि उनकी ट्यूशन फीस उनके लाखों के पैकेज की गारंटी हैं। उनका प्लेसमेंट मेहनत से अर्जित किया प्रतिफल नहीं पर एक ऐसा अधिकार है जो उनके फीस मात्र चुकाने से उन्हें मिल जायेगा। जिसमे उनकी कल्पना में वे खुद को कॉलेज में दाखिला लेते और सीधे वहां से लाखों के पैकेज पर चयनित होते देख रहे थे। बस नहीं देख रहे थे तो बीच के वर्षों का अर्जित ज्ञान, और उस ज्ञान को अर्जित करने के लिए की गयी साधना। देखते ही देखते प्लेसमेंट के आंकड़ों की दौड़ में एक ऐसी भ्रमित पीढ़ी पैदा हो गयी जिसे मेहनत के मायने तो नहीं पता पर “शॉर्ट कट” के सारे पैंतरे आते हैं। 

अब आलम ये है कि यह शार्ट-कट पीढ़ी हमारे सामने आकर खड़ी है। इस पीढ़ी में वैसे तो इंजीनियरों की फ़ौज है पर उनमे सिर्फ 20% ही योग्य इंजीनियर की श्रेणी में आते हैं। वही हाल तक़रीबन बाकी सभी प्रोफेशनल कोर्स का है। इस शार्ट-कट के चक्कर में बचे 80% छात्र अपना लम्बा नुक्सान कर बैठे। इन छात्रों की नज़र अगर प्लेसमेंट के आंकड़ों की जगह हुनर, ज्ञान और सीखने की ललक पर होती तो नज़ारा कुछ और होता। देर ही सही रेंचो ने ‘3 इडियट्स’ में ठीक ही कहा है था कि, “काबिल बनो… कामयाबी तो झक मार के तुम्हारे पीछे भागेगी”। पर शायद यह बताना भूल गया की प्लेसमेंट के आंकड़े कामयाबी तो बताते हैं पर काबिलियत नहीं। और इसीलिए आई.आई.टी. के प्लेसमेंट आंकड़ों का खुलासा नहीं करने की इस पहल की जितनी तारीफ की जाये कम है। अब सरकार को भी इसी तरह आंकड़ों के प्रचार-प्रसार और विज्ञापनों के लेकर कोई ठोस नीति बनाना चाहिए। जिससे हमारी आने वाली पीढ़ी आंकड़ों के इस फेर में और भ्रमित न हो, और फिर किसी शॉर्ट-कट की चक्कर में अपने भविष्य से समझौता न कर बैठे।

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