काफिर

– श्री सुबोध

जो मानवता के दुश्मन है
वोही जग मे काफिर है

जो नव युवको को केवल
मौत का पाठ पढ़वाता है
स्वयं को छोड़ कर जग में
सबको काफ़िर बतलाता है

तू ख़ुद ही सोच जरा मन में
जीवन दान जब तुझे मिला
तब भी ओ मानव हित में
क्या तेरा नही ईमान हिला

जिसको तू धर्म कहता है
वो धर्म नही हो सकता है
मर्महीन होकर अब तू
यूँ ही बकता फिरता है

जब जग में न जीवन होगा
क्या तू ही बच पाएगा
निर्दोषो का जीवन लेकर
क्या तू सत्ता पायेगा

तेरी मनसा न पूरी होगी
कितना चाहे जोर लगा ले
तू धर्म क्या बचा सकता
ख़ुद को ही तू आज बचा ले

भारत फिर भी भारत है
परसेवा है आदत जिसकी
पीड़ित की सेवा करना
नीति सदा रही इसकी

दमन अमन का करते हो
दमन तुम्हारा ही होगा
निर्दोष छात्र जो मारे तुमने
अब दण्ड भुगतना ही होगा

आतंकी का न धर्म कोई
तेरी इंसानियत सोई है
इंसानियत के दुश्मन तुम
सोचो अब तेरा क्या होगा

न हिन्दू मुस्लिम काफिर है
न सिख ईसाई काफिर है
जो मानवता का दुश्मन है
बस वो ही इंसा काफिर है

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