गण से दूर होता तंत्र

सुशील शर्मा

स्वतंत्रता के 68 साल बाद गण से तंत्र की दूरी दर्शाती है की कहीं चूक हो रही है। गण के लिए तंत्र या तंत्र से त्रस्त गण स्वतंत्रता का मतलब सब के लिए अलग अलग है। लेकिन भारत के 70 % गण के लिए स्वतंत्रता का मतलब है दो जून की रोटी सर पर छत तन के लिए लंगोटी। वैश्वीकरण के इस दौर में मोबाइल सस्ता होता जा रहा है और रोटी लगातार उछाल मार रही है। आंकड़ों के खेल में तंत्र भले ही साबित कर दे की भारत विकास के रस्ते पर सरपट दौड़ रहा है लेकिन गण आज भी विकास के दूसरे छोरे पर ही खड़ा है। वह छोर जंहा से जीवन की मूलभूत सुविधाओं की शुरूआत होती है। देश की एक तिहाई आबादी रोटी और मकान के लिए झूझ रही है।ग्रामीण अंचल के अधिकांश बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। स्वास्थ शिक्षा जिसे सबसे सस्ता होना चाहिए आज सबसे महंगे हैं। गण की हैसियत से बहुत दूर गण कुपित हैं तंत्र के आगे असहाय। सविधान ने गण को अभिव्यक्ति की आजादी दी हैं।लेकिन वो किस बात की अभिव्यक्ति करे किस से करे अपने गुस्से का इजहार तंत्र के खिलाफ सिर्फ चुनाव के समय बोल सकता हैं। वोट देने के बाद बोलना गुनाह हैं।

एक सन्नाटा से पसरा था उसकी सियासत में

वह लोग जो सच बोलते थे खड़े थे हिरासत में।

एक तंत्र ने लगातार ६० वर्षो तक गण को बहलाया फुसलाया हंकाया छकाया।दूसरा भी कोशिश में है की वह भी गण को तंत्र में शामिल करे । सभी तंत्र देश के विकास का दावा कर रहे हैं फिर भी गण घिसट रहा है। गण ताक रहा तंत्र की ओर। तंत्र के 2 G कोयलाजी व्यापमजी सभी मुंह चिड़ा रहे हैं गण को जब आतंकियों पर होती हे सियासत। जब निर्भयाओं को निर्भय होकर लूटा जाता है। जब गण का पैसा तंत्रिओं की तिजोरी में समां जाता है। जब बुद्धि जाती आधार पर नापी जाती है। जब सत्ता आरक्षण की पतवार का सहारा लेती है। जहाँ कूटनीतियां सत्ता के गलियारों से शुरू हो कर गरीब की रोटी पर ख़त्म होती हों। जहाँ योग्यता भ्रष्टाचार के क़दमों में दम तोड़ती हो उस देश का गण तंत्र में कैसे समाहित होगा।

68 वर्षों में ताँता गण को छोड़ कर विकाश के सपने देख रहा है। 1945 में जापान व जर्मनी नेस्तनाबूत हो गए थे। आज विकसित राष्ट्र हैं। 1947 के स्वतंत्र हम आज भी उनसे बहुत दूर विकास की बाह जोट रहे हैं। हमारा तंत्र चल रहा है यंत्रवत परंपरागत सत्ताओं,कूटनीतियो,विदेशनीतियों की पतवार के सहारे। गण की किनारे कर विकास के पथ पर हमारा देश आगे बढ़ रह है।

इस देश के गण से भी कई सवाल हैं।100 रूपये में अपना मत बेचने वाले गण क्या तंत्र से सवाल पूछ सकते हैं। पडोसी के घर चोरी होती देख छुप कर सोनेवाल गण क्या स्वतंत्रता पाने का अधिकारी है। भ्रूण में बेटी की हत्या करनेवाल गण किस मुंह से तंत्र से सवाल पूछेगा। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिमायती गण आतंकियों की फांसी पर सवाल खड़े करेगा तो उसे ये भी भुगतना होगा।प्रश्न बहुत है उत्तर देने वाला कोई नहीं। सुलगते सवालों के बीच यह स्वतंत्र गणतंत्र ,गण से अलग खड़ा तंत्र। और तंत्र से त्रासित गण एक दूसरे के पूरक होकर भी अपूर्ण हैं | एक प्रार्थना जो कविवर रविंद्रनाथ टैगोर नाथ की थी हम सभी को करनी चाहिए।

जहाँ मष्तिस्क भय से मुक्त हो।

जहाँ हम गर्व से माथा ऊँचा कर चल सकें।

जहाँ ज्ञान बंधनो से मुक्त हो।

जहाँ हर वाकया हृदय की गहराइयों से निकलता हो।

जहाँ विचारों की सरिता तुच्छ आचारों की मरुभूमि में न खोती हो.।

जहाँ पुरूषार्थ टुकडों में न बटा हो

जहाँ सभी कर्म भावनाएं अवं अनुभूतियाँ हमारे वश में हों।

हे परम पिता !उस स्वातंत्र्य स्वर्ग में इस सोते हुए भारत को जाग्रत करो ।

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