आतंक : सुषमा स्‍वराज और नरेन्‍द्र सिंह तोमर की अजीब चुप्‍पी…

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पठानकोट हमले से देश सकते में हैं, वैसे ही जैसे प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी की औचक पाक यात्रा पर आश्‍चर्यमिश्रित प्रसन्‍नता में था। लेकिन इस हमले के बाद भाजपा नेताओं की खामोशी ने भी कई सवाल खड़े कर दिए हैं। भाजपा प्रदेश अध्‍यक्ष की ताजपोशी के जश्‍न में शामिल होने आई विदेश मंत्री सुषमा स्‍वराज से जब मीडिया ने पठानकोट हमले पर प्रश्‍न किया तो वे बिना कुछ कहे चली गईं जबकि केन्‍द्रीय इस्‍पात मंत्री नरेन्‍द्र सिंह तोमर ने कहा कि इस बारे में प्रवक्‍ता ही कुछ कहेंगे। इन दोनों सहित अन्‍य भाजपा नेताओं ने नंदकुमार चौहान और पार्टी के विस्‍तार पर तो दिल खोलकर बातें कीं लेकिन पठानकोट का सवाल होते ही सभी ने अजीब सी चुप्‍पी ओढ़ ली। कूटनीतिक और सामरिक महत्‍व के इस मुद्दे पर कोई बयान न देना अलग बात है लेकिन कम से कम हमले की निंदा कर शहीदों के प्रति श्रद्धा भाव तो व्‍यक्‍त किया ही जा सकता है। भाजपा नेताओं की यह बेरुखी खटकती है।

23 मार्च 2011 का दिन आपको शायद ही याद होगा लेकिन इस दिन संसद में सुषमा स्‍वराज द्वारा तत्‍कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर कसा गया तंज बताया जाए तो आपको यह दिन याद आ जाएगा। उस दिन लोकसभा में नियम-193 के तहत हुई चर्चा के दौरान सुषमा ने प्रधानमंत्री के नेतृत्व और कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए शेर पढा था–

तू इधर-उधर की न बात कर, ये बता के कारवां क्यों लुटा/

मुझे रहजनों (लुटेरों) से गिला नहीं, तेरी रहबरी (नेतृत्व) का सवाल है।

सुषमा स्‍वराज ने पूववर्ती यूपीए सरकार को पाक स‍मर्थित आतंकवाद के कारण कई बार निशाने पर लिया है। खुफिया सूचना उपलब्ध रहने के बावजूद हैदराबाद में दोहरे बम विस्फोट पर तो विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने लोकसभा में कहा था कि आतंकवाद से लड़ाई में केन्‍द्र सरकार प्रतिबद्धता दिखाए। क्या केंद्र सरकार की भूमिका सिर्फ राज्यों को सचेत करने तक है या फिर आतंकी गतिविधि रोकने की भी है?

अतीत को इसलिए याद किया जा रहा है कि देश ने पठानकोट में सात सुरक्षाकर्मियों को खोया है। पहले विदेश मंत्री स्‍वराज और फिर प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी की पाकिस्‍तान यात्रा के बाद हुए इस हमले ने सरकार की पहल पर सवाल उठाए हैं। ऐसे माहौल में तेजतर्रार नेता सुषमा स्‍वराज से उम्‍मीद की जाती है कि वे उन तमाम मसलों पर अलहदा रुख रखें जिन मसलों पर वे तत्‍कालीन केन्‍द्र सरकार को घेरती रही हैं, लेकिन अब तो उन्‍होंने इन मामलों पर जैसे बोलना ही बंद कर दिया है। मंगलवार को जब इस बात पर सवाल उठाए जा रहे थे कि पठानकोट में जांबाज देशभक्‍त शहीद हुए हैं तो भाजपा और कांग्रेस कार्यालय में जश्‍न क्‍यों मनाया जा रहा है? उल्‍लेखनीय है कि मंगलवार को कांग्रेस कार्यालय में भी झाबुआ जीत के बाद कांतिलाल भूरिया के पहली बार राजधानी आने पर जश्‍न मना।

आप-हममें से कई की राय हो सकती है कि पठानकोट हमला अलग मसला है और पार्टी के आयोजन अलग। ऐसे में जश्‍न के आयोजन और औचित्‍य पर सवालों की बात भले ही न हो लेकिन मसला यह है कि जो नेता अपने संगठन और उसके सूत्रधार की प्रशंसा में घंटों बोल रहे हैं, क्‍या वे मीडिया से पठानकोट के मुद्दे पर बात भी नहीं कर सकते। मीडिया ने जब नन्‍दकुमार सिंह चौहान की प्रशंसा कर रही सुषमा स्‍वराज से पठानकोट हमले पर प्रश्‍न पूछा तो वे सबकुछ नजर‍अंदाज कर बिना कुछ कहे क्‍यों आगे बढ़ गईं? तोमर ने कम से कम सवाल सुना और कह दिया कि इस बारे में प्रवक्‍ता जवाब देंगे। पार्टी लाइन और सरकार की गाइड लाइन पर कायम रहना नेता की मजबूरी हो सकती है लेकिन बतौर काबीना मंत्री एक स्‍पष्‍ट राय तो रखी ही जानी चाहिए। एक ओर तो छोटे-छोटे मसलों पर भाजपा नेता अपने बयानों से विवादों को जन्‍म देते रहते हैं, नेतृत्‍व द्वारा बार-बार की हिदायतों के बाद भी वे चुप नहीं होते खासकर कथित देशभक्ति के मामलों में। ऐसे में भाजपा नेताओं की यह खामोशी चुभती है।

 

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