परिवार का प्यार-दुलार मिले तो जिंदगी हो जाए खुशहाल

उम्र चाहे कोई भी क्यों न हो जाए, दादी-नानी को हम सब कभी नहीं भूलते। हमारी जिंदगी में उनका एक खास तरह का योगदान रहता है। आपकी ही तरह आपके बच्चों को भी ग्रैंड पेरेंट्स की जरूरत है। मानसिक विकास से लेकर जिंदगी की कई दूसरी समझ दादा-दादी और नाना-नानी से खास अंदाज में बच्चों को मिलती है। इसलिए आज से ही अपने बच्चों और उनके इन खास साथियों के बीच सेतु का काम करना शुरू कर दें, बता रही हैं चयनिका निगम

मुझे दादी की सिखाई हुई बातें आज भी याद हैं। और वो नानी के हाथ की मीठी पूरियां। आह… इतना ही नहीं और भी बहुत कुछ है, जो हमारे ग्रैंड पेरेंट्स हमें गाहे-बगाहे सिखा जाते हैं। पर अब वक्त ऐसा आ गया है कि अधिकांश बच्चे अपने माता-पिता के साथ दूसरे शहरों में रहते हैं और दादी-दादी या नाना-नानी से साल में महज कुछ दिनों के लिए ही मिल पाते हैं। अपने बच्चे के अच्छे भविष्य के लिए और उन्हें जिंदगी जीने का सही तरीका सिखाने के लिए जरूरी है कि आप उनकी जिंदगी में उनके दादा-दादी और नाना-नानी के लिए खास जगह बनाएं।

परिवार का अहसास
परिवार का अहसास तब होता है, जब सच में सारा परिवार एक साथ हो। पर, आज के जमाने ऐसा बमुश्किल हो पाता है। एकल परिवार का चलन बढ़ चुका है। वहां भी अमूमन मां-पापा दोनों कामकाजी होते हैं। बच्चा स्कूल और टय़ूशन के बीच ही व्यस्त रहता है और दादा-दादी कहीं दूर किसी दूसरे शहर में अकेले जिंदगी जीने के लिए मजबूर होते हैं। पर, अगर थोड़ी-सी कोशिश और सामंजस्य के साथ आप इस स्थितियों को बदलने में सफल हो जाती हैं और बच्चे के दादा-दादी को भी अपने साथ रहने के लिए बुला लेती हैं तो बच्चे की जिंदगी कई गुना खुशनुमा हो जाएगी। बच्चे अपने ग्रैंड पेरेंट्स के साथ समय बिताकर ही परिवार में रहने का अहसास कर सकते हैं। उन्हें यह अहसास भी होता है कि किसी भी परेशानी में परिवार साथ खड़ा होता है और इसीलिए वो भी वक्त आने पर परिवार को अहमियत देंगे।

साथ रहेंगे, खुश रहेंगे
विशेषज्ञ मानते हैं कि डिप्रेशन होने का खतरा उन बच्चों को ज्यादा होता है जो एकल परिवार में रहते हैं, जबकि ज्वाइंट फैमिली में रहने वाले बच्चों का विकास बेहतर तरीके से होता है। उन्हें डिप्रेशन होने की आशंका कम होती है। साइकोलॉजिस्ट डॉं स्मिता श्रीवास्तव कहती हैं कि बड़े परिवार का मतलब है, चौबीसों घंटे हर किसी का साथ। ऐसे में बच्चे के मन में अकेलेपन की भावना नहीं आती है और टेंशन या परेशानी के वक्त भी किसी न किसी का साथ मिल जाता है। हमेशा किसी से जुड़े रहने की यह भावना बच्चे को अवसाद का शिकार नहीं होने देती।

सुरक्षित महसूस करेंगे बच्चे
दादा-दादी साथ रहेंगे तो स्कूल से घर लौटने के बाद खाली घर या डे केयर सेंटर बच्चे का स्वागत नहीं करेंगे। घर पर उनकी बातें सुनने और उनके नाज-नखरों को सहने के लिए दादा-दादी या नाना-नानी होंगे। बच्चे के मन में कभी भी यह खयाल नहीं आएगा कि पापा-मम्मी तो खुद में ही व्यस्त रहते हैं और मेरे लिए किसी के पास समय नहीं है। इससे बच्चों के मन में सुरक्षा का भाव आता है। उनके कोमल मन में किसी तरह की गांठें नहीं बनतीं और उनका विकास कहीं बेहतर तरीके से हो पाता है।

पुरानी बातें और यादें
परिवार से जुड़ी, माता-पिता से जुड़ी और बच्चों के खुद के बचपन से जुड़ी, सारी पुरानी बातें बच्चों को ग्रैंड पेरेंट्स से ही तो पता चलती हैं। उन्हें पता चलता है कि उनके परिवार की खासियत क्या है, किसने क्या गलती की या किसने कैसे परिवार का नाम रोशन किया। ये बातें उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती हैं और आत्मविश्वास भी देती हैं। दादी-नानी के मुंह से सुनी ये पुरानी बातें उनके आगे के जीवन को थोड़ा और आसान बना देती हैं। इन्हीं बातों को जानने और सुनने के दौरान बच्चों की यादें भी बनती हैं, जो उनके आगे के जीवन में उन्हें अच्छी बातों के तौर पर याद रहती हैं।

मशीन नहीं ले सकती लोगों की जगह
माता-पिता कामकाजी होते हैं तो बच्चों को कंप्यूटर, मोबाइल आदि का सहारा मिल जाता है, जबकि ग्रैंट पेरेंट्स का साथ उन्हें यह सिखाता है कि मशीन लोगों की जगह नहीं ले सकती है। हमेशा फोन पर व्यस्त रहने वाले पिता जी की जगह दादा-दादी ले सकते हैं, पर कंप्यूटर नहीं।

सीखेगा नई-पुरानी सारी बातें
दादा-दादी, नाना-नानी और माता-पिता, इन सबका साथ बच्चों को मिलने का मतलब है कि उन्हें पुराने और नए दोनों पीढ़ी का साथ मिल रहा है। मतलब उन्हें हवाई जहाज के बारे में माता-पिता बता रहें हैं, तो बैल गाड़ी के बारे में ग्रैंड पेरेंट्स। बच्चे सिर्फ नए को नहीं जानेंगे, पुराने को भी पहचानेंगे। नई जानकारी उनकी जरूरत है तो पुरानी जानकारी उनकी धरोहर।

कहानियां करती हैं कमाल
हमेशा सच बोलो, बच्चों को यही सिखाया जाता है। पर, क्या वो ऐसा हमेशा करते हैं? वो ऐसा करने के बारे में जरा और सोचेंगे अगर उन्हें कहानियों के माध्यम से सच बोलने के फायदे और जिंदगी को सही तरीके से जीने के ऐसे ही तौर-तरीके सिखाएं जाएं। ग्रैंड पेरेंट्स ऐसा ही तो करते हैं। यह कहानियां बच्चों को छुटपन में ही नैतिक समझ दे जाती हैं, जो जिंदगी में आगे उन्हें गलत रास्ते पर चलने से रोकती हैं।

आपको करानी होगी इन लोगों की दोस्ती
बच्चे अपने ग्रैंड पेरेंट्स का सम्मान करें, इसके लिए पहले आपको भी अपने माता-पिता का सम्मान करना और बच्चों की जिंदगी में उनके महत्व को समझना होगा। आपके इस व्यवहार से आपके माता-पिता को अच्छा लगेगा और वो आपके बच्चों के साथ समय बिताने के लिए हमेशा प्रोत्साहित रहेंगे। उन्हें अहसास होगा कि बच्चों के साथ समय बिताना उनकी जिम्मेदारी भर नहीं है ,बल्कि वो सबसे खास हैं, जो इतना समय बच्चों के साथ बिता रहे हैं।

आप हैं रोल मॉडल
हर बच्चे के लिए उसके माता-पिता रोल मॉडल होते हैं। आप अपने माता-पिता का साथ देंगे तो बच्चा इस बात से सीखेगा जरूर। वह जानेगा कि माता-पिता जिंदगी में बहुत अहमियत रखते हैं। बच्चे के मन पर इन बातों का गहरा असर होगा और वो इससे सीख लेगा।

थोड़ी सतर्कता भी है जरूरी
ग्रैंड पेरेंट्स के साथ अमूमन बच्चे सुरक्षित और खुश ही रहते हैं। पर, बच्चे की जिंदगी में दादा-दादी या नाना-नानी की अहम भूमिका है तो इसका मतलब यह नहीं है कि आप अपनी जिम्मेदारियों से पीछे हट जाएं। बच्चे पर कम ध्यान देने लगें या उनके साथ बेहद कम वक्त बिताने लगें। अगर आपको ऐसा लग रहा है कि बच्चे के साथ आपका रिश्ता पहले से कमजोर हो रहा है तो इसके लिए ग्रैंड पेरेंट्स को दोष देने की जगह आपको अपने व्यवहार के बारे में सोचने की जरूरत है। अपने मन की सुनें और फिर उसके अनुसार बच्चे के साथ अपने रिश्ते को मजबूत बनाने की दिशा में काम शुरू करें। आपको चिंता उस वक्त करने की जरूरत है, जब आप अपने बच्चे के व्यवहार में कुछ बदलाव देखें। जैसे लगातार रोना, आपकी बातों को एक सिरे से नकारना, पढ़ाई में ढेर सारी गलतियां करना और सामाजिक रूप से गलत व्यवहार करना, गाली-गलौज करना, गुस्सा करना और सामान तोड़ना आदि। बच्चे के व्यवहार में आए इन बदलावों को लेकर समय रहते सतर्क हो जाएं। इन संकेतों को पहचानें और उनके साथ ज्यादा-से-ज्यादा वक्त बिताना शुरू कर दें।

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