बातचीत का दबाव बनाकर पाक को विवश करना होगा : हैप्पीमोन जेकब

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जेएनयू दिल्ली के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज में डिप्लोमेसी और डिसआर्मामेन्ट के एसोसिएट प्रोफेसर हैप्पीमोन जेकब तीन अहम इंडिया-पाकिस्तान ट्रेक-टू डायलॉग्स का हिस्सा रहे हैं। डिप्लोमेसी और अंतर्राष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ जेकब से भारत-पाक सम्बन्धों पर यह साक्षात्कार किया है सुबह सवेरे के कान्ट्रीब्यूटर और जेएनयू के रिसर्च स्कॉलर अंशुल त्रिवेदी ने।

 

आप मोदी सरकार के दौरान भारत की पाकिस्तान नीति का आकलन कैसे करते हैं? भारत की पाकिस्तान नीति में मनमोहन सिंह सरकार के समय से क्या बदलाव आए हैं और क्या निरंतरता रही है

मोदी सरकार के पहले डेढ़ वर्षों में उनकी पाकिस्तान नीति में काफी अस्थिरता देखने को मिली थी। लेकिन पिछले कुछ महीनों में काफी बड़े पैमाने पर उसमें बदलाव आया है और सुधार हुए हैं। खासकर बैंकाक में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों से बातचीत के समय से यह बदलाव देखने को मिला। इसके बाद हमारी विदेश मंत्री ने पाकिस्तान दौरा किया और फिर प्रधान मंत्री खुद लाहौर गए। जहां तक मनमोहन सिंह सरकार में और मोदी सरकार की नीति में समानता की बात है – दोनों नेताओं को सत्ता में आने के बाद यह आभास हो गया की पाकिस्तान से निपटने के लिए बल के प्रयोग का विकल्प मौजूद नहीं है। बल प्रयोग में बिलकुल आवश्यक नहीं की आपको पाकिस्तान के विरुद्ध सफलता ही मिले। और दूसरी बात जो उनको समझ में आई है वह यह है की पाकिस्तान की नागरिक सरकार और इस्लामाबाद में उसके नेतृत्व के हाथ में सत्ता की पूरी बागडोर नहीं है। सत्ता के कुछ पहलुओं पर उसका काबू नहीं है और उसका कुछ नहीं किया जा सकता।

जहां तक दोनों सरकारों में अंतर की बात है वह मुख्य तौर पर पाकिस्तान से सम्बंधित भाजपा और उसकी सरकार के बयानों में ही आया है। मनमोहन सिंह सरकार पाकिस्तान के विषय में अपने वक्तव्यों को जनता के समक्ष नापतौल कर पेश करती थी। मोदी सरकार के दौरान शुरुआत में ज्‍यादा बेबाक बयानबाजी होती थी किन्तु पिछले कुछ समय से इसमें भी बदलाव आया है।

मोदी सरकार के पाकिस्तान के विषय में बयानों में यह बदलाव क्यों आया है?

देखिए सरकार में आ जाने के बाद आपको मालूम पड़ता है कि पाकिस्तान से निपटने के लिए आपके पास ज्‍यादा विकल्प नहीं है। अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का दबाव है, अन्य आर्थिक और राजनैतिक दबाव होते हैं। पाकिस्तान के साथ रिश्तों का असर हमारे ट्रेड पर पड़ता है। मोदी आर्थिक विकास के वादे के साथ सत्ता में आए हैं जिसके चलते वे मेक इन इंडिया जैसी नीतियां ला रहे हैं। यदि इस समय भारत पाकिस्तान में सैन्य द्वंद्व होता है तो अर्थव्यवस्था पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। इन सारे कारणों से किसी भी सरकार का रुख नरम हो जाता है।

अजय शुक्ला ने बिजनेस स्टैण्डर्ड के एक लेख में पठानकोट प्रकरण के दौरान आतंरिक सुरक्षा के नजरिए से गंभीर कमियों का उल्लेख किया है। क्या आप उनसे सहमत हैं? आपके अनुसार हमसे कहाँ चूक हुई और किस तरह इसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए?

मैंने उनका लेख पढ़ा और मेरे अनुसार वह काफी साहसिक आलेख था। मैं उनसे कमोबेश सहमति रखता हूँ। पठानकोट प्रकरण में यूनिटी ऑफ कमांड नहीं थी। अलग-अलग एजेंसी पठानकोट में अलग-अलग स्तर पर काम कर रही थी। इस तरह के ऑपरेशन के लिए तालमेल की आवश्यकता होती है जो ठीक नहीं बैठा। नेशनल सिक्योरिटी गार्ड को दिल्ली से बुलाकर पंजाब के एयर फोर्स ऑपरेशन के लिए तैनात करना जरूरी नहीं था। शायद अन्य सैन्य दल बेहतर और जल्दी से जवाब दे सकते थे। लेकिन ज्‍यादा बड़ी बात यह है की 26/11 के बाद भी हम अपनी गलतियों से नहीं सीखे हैं। मुंबई हमलों के बाद काफी बढ़ चढ़ कर घोषणाएं की गई थीं लेकिन हम देखते हैं कि बढ़ते आतंकवाद के दौर में भी हमारी काउंटर-इंटेलिजेंस व्यवस्था दुरुस्त नहीं है। उदाहरण के तौर पर दिल्ली के इंटेलिजेंस ब्यूरो में अरबी के केवल 3 ट्रांसलेटर हैं। आज जब तरह तरह के आतंकवादी संगठन जैसे आई.एस.आई.एस. औ लश्कर-ए-तोइबा हमारे ऊपर नजर लगाए बैठे हैं हमें काउंटर इंटेलिजेंस व्यवस्थाओं को दुरुस्त करना होगा। बातें बहुत होती हैं लेकिन जमीन पर चीजें नाकाफी दिखती हैं।

जैसा कि आपने कहा की पाकिस्तान के भीतर सत्ता के एक से अधिक केंद्र हैं। तो ऐसे विभाजित एवं अनप्रेडिक्‍टेबल राज्य से निपटने के लिए क्या किया जाए?

मेरे अनुसार पाकिस्तान के विषय में हम जो गलती निरंतर कर रहे हैं वह यह है कि हम पाकिस्तान को एक आम राज्य समझते हैं। किसी भी परिभाषा के अनुसार पाकिस्तान एक आम -वेस्टफालिअन- राज्य नहीं है जहां सत्ता एक जगह संगठित हो। वहाँ सत्ता के एक से अधिक केंद्र है। इस स्थिति में थोड़ा क्रिएटिव होना होगा, थोड़ा असामान्य रवैया अपनाना होगा। इसका यह मतलब है कि जहां तक उनकी सुरक्षा नीति का सवाल है हमें यह समझना होगा की वह सेना द्वारा निर्धारित होती है। हमें वहाँ की सेना से बातचीत के मार्ग खोलने होंगे। मैंने पिछले दशक में अनेक ‘ट्रैक टू इनीशिएटिव’ में हिस्सा लिया है और मैं आपको बता सकता हूँ कि पाकिस्तान के रिटायर्ड आर्मी अफसर मुझे बताते हैं कि वे नई दिल्ली के साथ बातचीत का चैनल खोलने के विरोध में नहीं हैं। यदि सर्वमान्य तथ्‍य है कि सुरक्षा नीति सेना संचालित करती है, तो उनसे बात क्यों ना की जाए? उनकी क्या सोच है, क्या मांगें हैं?

उफ़ा के बाद दिए गए बयान में कश्मीर का जिक्र नहीं था और आतंकवाद से साझा तौर पर लड़ने का विजन था; लेकिन पाकिस्तान की घरेलू राजनीति के चलते नवाज शरीफ को उससे पीछे हटना पड़ा। प्रधानमंत्री मोदी भी विचारधारा से कड़े हिन्दुत्ववादी नेता माने जाते हैं। हिन्दुत्ववादी ताकतों के लिए पाकिस्तान एक बहुत ही भावोत्तेजक राजनैतिक मसला रहा है और उससे शत्रुता की काफी राजनैतिक रोटी सेकी जाती है। इस राजनैतिक रवैये का मोदी की पाकिस्तान नीति पर क्या प्रभाव पडेगा?

देखिए इसमें कई जरूरी बातें ध्यान रखनी होंगी। पहली बात तो यह की सत्ता में आते ही किसी भी दल की विचारधारा में कट्टरवाद कम हो जाता है, फिर वह कोई भी विचारधारा क्यों ना हो। जहां तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की बात है आपको याद होगा कि शायद पिछले वर्ष सितम्बर में आरएसएस के नेताओं ने दिलचस्प बयान दिया था कि पाकिस्तान हमारा भाई है उससे हमें बात करके मसले सुलझाने चाहिए। तो एक तरह से मुझे लगता है कि आरएसएस को भी मालूम है की साउथ एशिया की भूराजनीतिक स्थिति को देखते हुए पाकिस्तान के साथ स्थायी कूटनीतिक द्वंद्व हमारे हित में नहीं है। विश्व स्तर पर यदि भारत को उभरना है तो हमें अपने घरेलू मुद्दों का युद्ध के बिना निपटारा करना जरूरी है। तीसरी बात यह है की मोदी भाजपा और एनडीए के एक कद्दावर और शक्तिशाली नेता हैं। मनमोहन सिंह का अपनी पार्टी और गठबंधन में वह स्थान नहीं था जो आज मोदी का है। और इसीलिए मुझे नहीं लगता की निकट भविष्य में कम से कम अगले एक साल तक संघ परिवार और उनके गठबंधन में उनका कोई खुला विरोध होगा। हाँ शिव सेना को छोड़ कर जो हर मौके पर पाकिस्तान को लेकर बयानबाज़ी करती है।

26/11 के हमलों में हमने पाकिस्तान की भूमिका होने के सबूत दिए थे और फिर भी पाकिस्तान सरकार ने उस पर कोई कदम नहीं उठाया। यदि आप आज राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार होते तो आप प्रधान मंत्री को क्या सलाह देते

यदि मैं उनका सलाहकार होता तो मैं उनसे बोलता कि वे भारत के संबंधित अधिकारी को निर्देश दें कि वे तुरंत पाकिस्तानी आर्मी प्रमुख से बात करें और हमारे इंटेलिजेंस प्रमुख आईएसआई के प्रमुख से बात करें। और उनसे कहें यह रहे सबूत। इस पर कार्रवाई करिए और यदि पाकिस्तानी पक्ष सही में सहयोग देना चाहता है और दोषियों को सजा देना चाहता है तो उन्हें कुछ ठोस कदम उठाने होंगे। नवाज शरीफ को यह सुनिश्चित करना होगा की दोषियों को सजा मिले। यह सही है कि वहाँ की स्थिति पर शरीफ का पूर्णतः काबू नहीं है। लेकिन पाकिस्तान को वहाँ हो रही गतिविधियों के बारे में उत्तर देना होगा। ऐसा नहीं हो सकता की वह अपने देश में हो रही गतिविधियों से पल्ला झाड़ लें। लेकिन इसका यह मतलब कतई नहीं है कि हम बातचीत करना बंद कर दें। हमें बातचीत को और गंभीरता से आगे बढ़ाना होगा और कूटनीतिक दबाव बनाकर उन्‍हें उचित कार्रवाई करने के लिए विवश करना होगा।

 

 

 

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