मक्का में गैर मुस्लिम को प्रवेश की इजाजत क्यों नहीं?

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दलवाई शब्द कानों में सुनाई पड़ते ही हमीद दलवाई की याद आ जाना स्वाभाविक बात है। बीसवीं शताब्दी के सातवें-आठवें दशक में हमीद भाई ने भारतीय संविधान में लिखित धर्मनिरपेक्ष शब्द को चर्चित करके एक नए इतिहास का निर्माण किया था। योगायोग छागला का नाम भी उन दिनों देश के कोने-कोने में चर्चित था। इनके प्रयास से ही देश में समान नागरिक कानून की चर्चा होने लगी थी। लेकिन शाहबानो के मामले में राजीव गांधी ने घूम जाओ की नीति अपनाकर देश के प्रगतिशील लोगों को बड़ा निराश किया। इसका प्रभाव अब भी कम नहीं हुआ है, जिसका परिणाम हमारे सामने है।

भारत का अल्पसंख्यक समुदाय अपनी धार्मिक और तथाकथित सामाजिक कट्टरता में से निकल कर राष्ट्रवादी माहौल में सांस लेना चाहता है, लेकिन कांग्रेस अपने अल्पकालीन राजनीतिक स्वार्थों में से निकल कर उसे प्रगतिशील मार्ग पर अग्रसर नहीं होने देना चाहती है। धर्म के नाम पर उसे भयभीत करके यह अहसास दिलाना चाहती है कि इससे उनकी पहचान हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगी। हमीद भाई अपने राजनीतिक पिंड के आधार पर समाजवादी थे, इसलिए डॉ लोहिया के शिष्य के रूप में एक नए हिन्दुस्तान की कल्पना करते थे। ऐसा हिन्दुस्तान जिसमें सामाजिक एकता और स्वतंत्रता होगी। कांग्रेस उन दिनों भी मुसलमानों को बरगलाने में लगी हुई थी। वे उनकी पहचान राष्ट्र के नाम पर न रखकर केवल धार्मिक पहचान को ही स्थायी बनाने के प्रयास में संलग्न रहते थे। एक समय था कि कांग्रेस ने भी उन कानूनों का समर्थन किया था, जिससे देश में राष्ट्रीय एकता को बल मिलेगा, लेकिन वोटों की राजनीति ने उन्हें इस मार्ग से भटका दिया। आज मुस्लिम समाज के सामने जो कठिनाइयां हैं वे केवल और केवल कांग्रेस के द्वारा उन्हें राष्ट्रवाद से दूर रखने के कारण ही जन्मी हैं।

अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक के नाम की राजनीति ने इस देश को कितना खोखला किया है यह बतलाने की आवश्यकता नहीं है। पिछले दिनों सहनशीलता और असहनशीलता के नाम पर पैदा किया गया द्वंद्व इस का जीता जागता सबूत है, लेकिन यह सौभाग्य की बात है कि आज भी हुसैन दलवाई जैसे नेता और विचारक मुस्लिम समाज को जागरूक करने में लगे हुए हैं। इस बार हुसैन दलवाई ने जो मुद्दा उठाया है, वह इसी जागरूकता का प्रमाण और परिणाम है। पिछले दिनों मुंबई से प्रकाशित दैनिक उर्दू टाइम्स ने अपने मुख पृष्ठ पर हुसैन दलवी का एक बयान प्रकाशित कर साम्प्रदायिक तत्वों के तम्बू में एक नई हलचल मचा दी है। दलवी ने यह सवाल उठाया है कि मक्का में गैर मुस्लिमों को प्रवेश करने की अनुमति क्यों नहीं है? उनका कहना है कि सऊदी सरकार ने यदि इस प्रतिबंध को दूर नहीं किया तो वे अपना सत्याग्रह प्रारंभ करेंगे। पाठकों को यह बतलाने की आश्यकता नहीं है कि मक्का मुस्लिम समाज के लिए सबसे बड़ा और पवित्र तीर्थ माना जाता है। पैगम्बर मोहम्मद साहब का जन्म यहीं हुआ था। इतना ही नहीं इस्लाम धर्म की शुरुआत भी इसी नगर से हुई थी। इसलिए यहां प्रतिवर्ष हज यात्रा का आयोजन किया जाता है। पैगम्बर मोहम्मद साहब पर कुरान अवतरित होने की घटना भी मक्का में ही घटी है। इसलिए प्रतिवर्ष आयोजित होने वाली हज यात्रा भी यहीं सम्पन्न होती है।

यद्यपि तत्कालीन अरब के लोगों का विरोध करने के कारण पैगम्बर साहब ने मक्का छोड़कर मदीना में अपना निवास प्रारंभ कर दिया था। बाद में उनका निधन भी मदीना में ही हुआ। इसके उपरांत भी मक्का एकमात्र मुस्लिमों के लिए पवित्र नगर का सम्मान धराता है। प्रतिवर्ष हज यात्रा के अवसर पर इस नगर में मुस्लिम लाखों की संख्या में उपस्थित होकर अपनी आस्था का प्रदर्शन करते हैं। मक्का धार्मिक दृष्टि से मुसलमानों के लिए अति पवित्र नगर है, इस मान्यता पर किसी को भी आपत्ति नहीं है। हज यात्रा के अवसर पर एक विशेष परिसर में कुछ धार्मिक प्रक्रिया पूर्ण की जाती है, वहीं पर काबा की पवित्र मस्जिद है, जहां जाकर नमाज पढ़ना हर मुस्लिम अपने लिए अत्यंत सौभाग्य की बात समझता है। पाठकों को भली प्रकार से पता है कि हज यात्रा के अवसर पर जो धार्मिक क्रियाएं की जाती हैं, वे लगभग कुछ ही दिवसों में समाप्त हो जाती हैं। वहां की मस्जिद में नमाज पढ़कर हर मुस्लिम अपने आपको धन्य मानता है। जूदी पहाड़ पर दुआ मांगकर वह इस बात की अपेक्षा करता है कि ईश्‍वर उसे सभी पापों से मुक्त कर देगा। एक साधन सम्पन्न मुसलमान के लिए हज अनिवार्य है। उसे उक्त प्रक्रियाओं से जोड़ा गया है। काबा की परिक्रमा के साथ जिन अनिवार्य संस्कारों से यह यात्रा जुड़ी हुई है, उसे हर हाजी पूर्ण करता है। इन दिनों औसतन चालीस लाख की भीड़ इन अनिवार्य धार्मिक प्रक्रियाओं को पूर्ण करती है। पाठक यह भी जानते हैं कि उक्त यात्रा प्रारंभ करने से पूर्व जिन कपड़ों को धारण कर लिया जाता है, उन्हें अहमराम कहते हैं। उक्त अहमराम हज यात्रा पूर्ण कर लेने के बाद उतारे जाते हैं। संक्षेप में कहा जाए तो हज यात्रा जितने दिनों तक चलती है, उसमें हाजी लोग अपनी इबादत में व्यस्त रहकर अनिवार्य प्रक्रियाओं से गुजरते हैं। जिसमें अंतिम क्रिया में उन पशुओं की जिन्हें इस्लाम ने वैध घोषित किया है, उनकी कुर्बानी की जाती है। सऊदी सरकार ने इस कार्य के लिए मक्का के निकट ही एक स्थल बनाया है। मक्का में यूं तो धर्मालु मुस्लिम वर्ष में कभी भी इस स्थान पर आकर अपनी इबादत कर सकते हैं, लेकिन हज के अवसर पर इसका एक विशेष महत्व होता है, जिसमें मुस्लिम बंधु शामिल होकर पुन्य कमाते हैं।

मदीना मक्का से कुछ ही दूरी पर है, जहां पैगम्बर साहब का भव्य रोजा है। सामान्य भाषा में रोजा दरगाह का समानार्थी शब्द है। हज यात्रा की अवधि तो कुछ ही दिनों की होती है, लेकिन लगभग हाजियों का आवागमन दो माह तक चलता रहता है। सऊदी सरकार इस अवधि को कम से कम करना चाहती है। इसलिए सऊदी सरकार ने उक्त यात्रा जल मार्ग से लगभग बंद कर दी है। हवाई यात्रा द्वारा ही हज यात्री अपने इस पवित्र और मुस्लिम के नाते अनिवार्य यात्रा को दो माह की अवधि में ही समाप्त करने का भगीरथी प्रयास करते हैं। इससे यात्रियों को अधिक सुविधाएं भी मिलती हैं और सऊदी सरकार को कानून और व्यवस्था की कठिनाइयों का सामना नहीं करना पड़ता। जो भी यात्री हज यात्रा से लौटता है, वह सऊदी सरकार की व्यवस्था की मुक्त कंठ से प्रशंसा करता है, लेकिन एक साधारण व्यक्ति इस मर्म को समझ नहीं पाता है कि इतना खुलापन होने के उपरांत भी सऊदी सरकार ने मक्का में अन्य धर्मियों के प्रवेश पर प्रतिबंध क्यों लगाया है? कोई भी समझदार इंसान मक्का के पवित्र स्थलों से कदापि छेड़छाड़ नहीं कर सकता। उन पवित्र स्थानों को सरकार अपनी व्यवस्था के अन्तर्गत प्रतिबंधित कर सकती है। हज यात्रा की भीड़ के समय उन धार्मिक स्थलों तक केवल हज यात्रा के लिए आए यात्रियों को ही जाने की छूट को अनिवार्य किया जा सकता है, लेकिन सम्पूर्ण मक्का नगर को वर्षभर गैर मुस्लिमों के लिए प्रतिबंधित करना कितना औचित्यपूर्ण है, उस पर विचार करना आवश्यक है। इस मुद्दे को हुसैन दलवाई ने उठाया है, उनका कहना है कि जब विश्‍व के अन्य धर्मस्थलों के दर्शन करने की छूट दी जा सकती है, तो फिर मक्का की क्यों नहीं? हज यात्रा के समय मक्का में अन्य लोगों के प्रवेश से कानून और व्यवस्था का सवाल उठना तो समझ में आ सकता है, लेकिन सऊदी सरकार का वर्षभर इस प्रकार का कदम उचित नहीं कहा जा सकता।

-मुजफ्फर हुसैन
लेखक राष्ट्रवादी चिंतक हैं।

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