मुठ्ठी भर उजियारे

-कृष्णा वर्मा

जीवन के द्वंद्वों से मैंने
कभी ना मानी हार
विपदाओं से लड़-भिड़ के
की इक-इक सीढ़ी पार

शांत कहाँ भीतर बहती
लावे की सदा नदी
लगातार दे ख़बर ताव की
साँसों तपी लड़ी

ओढ़ा चिंताओं को बिछाया
पोर-पोर दुख का सहलाया
साथ ना छोड़ा उम्मीदों का
तब जा टुकड़ों में सुख पाया

चहल-पहल खुशियों के सपने
आँखों बीच सजाए
चक्रवात के बीचों-बीच
हवा के महल बनाए

हमने अँधियारी रातों को
काटा गिन-गिन तारे
यूँही नहीं मिले मुठ्ठी भर
जीवन में उजियारे।

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