यही तो नेता का इंसानी पहलू है….

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सवाल दिलचस्प है कि सांसद और विधायक विधानमंडलों में जब बोल नहीं रहे होते हैं तो करते क्या हैं? हंगामें में तो फिर भी टाइम आसानी से पास हो जाता है, लेकिन लंबी और कई बार उबाऊ बहसों के दौरान वे सदन में बैठे बैठे क्या करते हैं?  उनका व्यवहार एक आम इंसान जैसा होता है या फिर वे जनप्रतिनिधि होने के नाते कुछ मुद्राएं अोढ़े रखते हैं? संसद एक सभाकक्ष है या कोई क्लास रूम? इन तमाम सवालों के जवाब राकांपा सांसद सुप्रिया सुले की साफ बयानी में ढूंढे जाएं तो सही होगा। सुले ने माना कि वो और उनके सहयोगी संसद की गंभीर बहसों के बीच भी साड़ी और फैशन जैसे विषयों पर भी गपशप लड़ा लेते हैं।

सुप्रिया सुले राष्ट्रवादी कांग्रेस के अध्यक्ष शरद पवार की बेटी हैं और शुरू से ही राजनीतिक माहौल में पली हैं। लेकिन उनके भीतर भी एक आम महिला जिंदा है। ना‍सिक में महिलाओं को लेकर आयोजित एक सेमिनार में सुप्रिया ने खुलासा किया कि संसद में एक जैसे भाषण सुन सांसद जब बोर हो जाते हैं तो बगल में बैठे सांसद से बातें करने लगते हैं। इस दौरान साड़ी व फैशन पर भी चर्चा होती है। उन्होने यह भ्रम भी तोड़ा कि ये लोग किसी गंभीर मुद्दे पर ही एक दूसरे से चर्चा कर रहे होते हैं। हमेशा ऐसा नहीं होता। क्योंकि सांसद या विधायक भी इंसान हैं। उनसे हर वक्त किसी देवता या मसीहा जैसे आचरण की अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए। कई बार सांसद अपनी सीट से उठकर घनघोर राजनीतिक विरोधी सांसद के पास जाकर गुफ्तगू करते हैं तो कभी कभी सांसदों में हंसी ठिठोली भी होती है। विधान मंडलों की बहसों में राजनीतिक दलों की हिस्सेदारी उनकी संख्या के ‍िहसाब से तय होती है। लेकिन कई दफा वक्ताअों को समय का ध्यान नहीं रहता और वे अपनी रौ में बोलते चले जाते हैं। कोई कितना ही धैर्यशील क्यों न हो, लंबी चर्चा हजम करने की उसकी भी एक सीमा होती है। ऐसे में बाकी सांसद क्या करें? ऐसे में खुसर पुसर, इशारेबाजी और मी‍ठी छेड़छाड़  भी चलती है। ऊपर से गंभीर ‍दिखने वाले सदन के भीतर चुहलबाजियों का दौर भी चलता है।

वैसे कुछ जनप्रतिनिधि मनोरंजन की मर्यादाअों के पार भी चले जाते हैं। कर्नाटक और गुजरात विधानसभाअों विधायक कार्यवाही के दौरान ही पाॅर्न देखते हुए पकड़े गए थे। अगंभीर सांसद विधायक उबासियां लेते भी देखे जाते हैं। कतिपय लोग तो झपकी भी ले लेते हैं। हालांकि जनमानस में जनप्रतिनिधियों की छवि हंगामा करने वालों की ज्यादा होती है। जबकि यह काम अक्सर विपक्षी सांसद ही करते हैं। बाकी लोगों के लिए वह टाइमपास का साधन ज्यादा होता है। शोर शराबा और नारेबाजी माहौल गर्माए रखते हैं।

मतलब कि जनप्रतिनिधि वो चाहे सांसद,  विधायक या पार्षद हों, एक इंसान उनके भीतर हमेशा जिंदा रहता है। यह न हो तो वे नियम कायदों  के निर्जीव पुतले बनकर रह जाएं। सुप्रिया की तारीफ इसलिए करनी होगी कि उन्होने अपने इस मानवीय पहलू को सार्वज‍निक रूप से स्वीकार  किया। वरना सत्ता मिलते ही जनप्रतिनिधि खुद को युधिष्ठिर के रथ की तरह जमीन से दो इंच ऊपर समझने लगते हैं। उन पर देश के संचालन का जिम्मा होता है। इसका अर्थ यह भी नहीं कि वे व्यंजनों का स्वाद भूल जाएं, कपड़ों की पसंद नापसंद को दरकिनार कर दें, ठहाके लगाना छोड़ दें, चुटकियां न लें, भावुक न हों। यही उनकी इंसानियत का तकाजा है। यह बात अलग है कि कई सांसद विधायक अापसी रिश्ते और भाई भतीजावाद में भेद नही कर पाते। लेकिन जनप्र‍ति‍निधियों और विधानमंडल की जीवंतता इसी में है कि वे अपनी मानवीय खूबियों खामियों को न भूलें, उसे बनाए रखें, सहजता से स्वीकार भी करें।

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