वह कोई और नहीं, तुम थी

ओंकार 

मैं नहीं चाहता
कि कोई जाने
तुम्हारे बारे में,
हमारे बारे में
और इस बारे में
कि तुम मेरे लिए क्या हो.

उस चाहत का,
जिससे लोग अंजान हों,
मज़ा ही कुछ और है,
जैसे दो किनारे साथ-साथ
मीलों तक चलते रहें
और नदी को पता भी न चले.

सुनो, कोई नहीं जानता
कि सालों पहले मैंने
जो कविता लिखी थी,
वह दरअसल एक प्रेम कविता थी
और उसकी पंक्तियों के बीच
मैंने तुम्हें कहीं छिपाया था.

बहुत चर्चा हुई उस कविता की,
बहुत सराहा उसे लोगों ने,
पर नहीं खोज पाए तुम्हें.

सिर्फ़ मुझे पता था
कि वह एक प्रेम कविता थी
और उसकी पंक्तियों के बीच
मैंने जिसे छिपाया था,
वह कोई और नहीं,
तुम थी.

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