शनि, महिला और कुछ तार्किक सवाल

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जिस हिंदू धर्म में सती जैसी अमानवीय प्रथा को करीब दो सौ साल पहले खत्म कर दिया गया हो, उसी धर्म में महिलाअों को एक मंदिर में पूजा के अधिकार की लड़ाई लड़नी पड़े, इससे शर्मनाक और क्या हो सकता है। ज्यादा अफसोस शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जैसे धर्मगुरूअोंके बेतुके बयान पर है,  जिसमें महिलाअो को शनि की पूजा न करने का औचित्य ठहराया गया है। विडंबना तो यह है कि महिलाअो को शिंगणापुर शनि मंदिर में पूजा का हक दिलवाने पर भी राजनीति की जा रही है। इसका क्या अर्थ निकाला जाए?

शिंगणापुर महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में पड़ता है। यूं देश में कई शनि मंदिर हैं, लेकिन शिंगणापुर मंदिर की ख्याति कई विरोधाभासों  के कारण है। यहां शनि की स्वयंभू प्रतिमा है, लेकिन मंदिर नहीं है। ज्योतिष में शनि की प्रसिद्धि समता के पोषक और न्याय दाता की है, लेकिन इस मंदिर में महिलाअों को तो  प्रवेश की अनुमति नहीं थी और पूजा का अधिकार तो अब भी नहीं है। खगोलशास्त्र की दृष्टि से शनि सौरमंडल का छठा ग्रह है, जो पृथ्वी के कई गुना बड़ा और 1.2 अरब किलोमीटर दूर है। शनि नील वर्ण और सुंदर  वलय से घिरा है। रोमन सभ्यता में इसे कृषि का देवता माना जाता है। भारतीय पुराणों में शनि  सूर्य पुत्र माना गया है, जो उसकी दूसरी पत्नी छाया से उत्पन्न हुआ। रंग से जन्मत: काला होने के कारण शनि को देवता होकर भी वर्णभेदी पिता से तिरस्कार सहना पड़ा। गिद्ध उसका वाहन है। शनि की कुदृष्टि आपके दुर्भाग्य का कारण हो सकती है। उसका कृपावंत होना सौभाग्य की इबारत लिख सकता है। शनि की प्रशंसा के पीछे भी एक भय निहित है। लेकिन शनि असा‍माजिक नहीं है, जिस शनि ने एक महिला नीलादेवी से विवाह किया हो, उसीकी पूजा महिलाएं न करें, इसका क्या तर्क है?

शिंगणापुर का शनि मंदिर कब बना, इसका कोई प्रामाणिक इतिहास नही है। जिसने भी बनवाया, उसकी महिलाअों से क्या दुश्मनी थी, यह भी स्पष्ट नहीं है। अगर काला होने  के कारण ही शनि महिलाअों के लिए अपूजनीय है तो फिर यम और चित्रगुप्त  की पूजा भी नहीं होनी चाहिए। अगर शनि अनिष्टकारी है तो हिंदू पुरूष भी उसे क्यों पूजें? जब देवताअों ने स्वर्ग में कोई लिंग भेद नहीं रखा तो पृथ्वी पर उसे ढोने का क्या आधार है?

हैरत की बात  है कि बहुतांश हिंदू समाज महिलाअोंशिंगणापुर में पूजा के अधिकार  के पक्ष में है, फिर भी उस पर अमल को लेकर कोताही क्यों है? इसकी आड़ में वोट पकाने का गोरखधंधा चल रहा है? शनि शिंगणापुर मंदिर का संचालन न्यासी बोर्ड बाॅम्बे पब्लिक ट्रस्ट एक्ट 1950 के नियम 53 के तहत करता है। महाराष्ट्र का विधि और न्याय विभाग मुख्यमंत्री फडणवीस के पास है। वे चाहे तो विशेष एक्ट पास कराकर मंदिर के नियमों में बदलाव कर सकते हैं। लेकिन न जाने किन कारणों से महाराष्ट्र सरकार स्पष्ट स्टैंड नहीं ले रही है। दूसरी तरफ शिवसेना  की महिला विंग पोंगापंथ का का समर्थन परंपरा के नाम पर कर रही है। इसी चलते भूमाता ‍ब्रिगेड ने मंदिर में जबरिया प्रवेश का असफल प्रयास किया। इसी दौरान स्वामी स्वरूपानंद ने शनि पूजा पर ही सवाल खड़ा किया। बोले कि शनि को बुलाया नहीं जाता, भगाया जाता है। शनि भगवान नहीं, ग्रह हैं। उनकी पूजा महिलाएं क्यों करें? उन्होने यह भी फरमाया कि धर्म में सामाजिक न्याय जैसी कोई चीज नहीं होती। उनका भय स्वाभाविक है। आज महिलाअोंको शनि पूजा का हक मिला तो कल को महिला किसी पीठ के शंकराचार्य पद पर भी दावा कर सकती है। बुनियादी बात यह है कि यदि शनि न्याय और समता प्रिय हैं तो महिलाअोंके प्रति दुराग्रह क्यो और यदि वह देवता ही नहीं हैं तो पुरूषों का उन पर एकाधिकार क्यों?

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