शिव की वैज्ञानिक शक्ति को भी परखना होगा

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जिस तरह हमारी प्राचीन मान्यताओं और मिथकों को महज पोंगापंथ और काल्पनिक कहकर खारिज नहीं किया जा सकता,उसी तरह उन्हें केवल इसलिए स्वीकार नहीं किया जा सकता कि वे हमारी धार्मिक सांस्कृतिक विरासत हैं। मैसूर में चल रही 103 वीं राष्ट्रीय विज्ञान कांग्रेस में इस बार भी कुछ शोध पत्रों पर सवाल उठा है कि इनका लक्ष्य वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देना है या मिथकवाद और प्रतीकवाद को पोषित करना है। ताजा विवाद का आधार कांग्रेस में प्रस्तुत एक शोध पत्र है,‍जिसमें अब तक सामने आई जानकारी के अनुसार भगवान शिव को विश्व का पहला पर्यावरणविद बताया गया है। शिव की वेशभूषा और स्वभाव के आधार पर यह स्थापित करने का प्रयास है कि पर्यावरण की चिंता सबसे पहले भारत में हुई। हमारे ऋषि मुनि इसको लेकर शुरू से सचेत थे। यह शोध पत्र मप्र निजी  विश्वविद्यालय नियामक आयोग के अध्यक्ष डॉ. अखिलेश के. पांडे ने प्रस्तुत किया। कुछ इसी तर्ज पर एक और शोध पत्र शंख ध्‍वनि की वैज्ञानिक महत्ता पर एक आईएसएस अधिकारी राजीव शर्मा ने भी प्रस्तुत किया है।

इन शोध पत्रों का विज्ञान से ‍कितना वास्ता है, इस पर बहस छिड़ी है। पिछले साल हुई विज्ञान कांग्रेस में भी दो वैज्ञानिकों ने ऐसा ही एक शोध पत्र पढ़ा था, जिसमें कहा गया था कि विमान उड़ाने की तकनीक का जिक्र वेदों में हैं और अमेरिका में राइट बंधुओं से पहले ऋषि भारद्वाज ने यह कर दिखाया था। इसके पक्ष में कुछ प्रमाण भी दिए गए थे। लेकिन विज्ञान जगत में इसकी काफी आलोचना हुई। वास्तव यह शोध पत्र कुछ पारंपरिक मान्यताओं को वैज्ञानिक जामा पहनाने की कोशिश ज्यादा थी। जिसका कोई ठोस तार्किक और प्रायोगिक आधार नहीं था।

डॉ. पांडे के शोध पत्र में भी अप्रत्यक्ष रूप से हिंदू मान्यताओं को वैश्विक और वैज्ञानिक फ्रेम में कसने की कोशिश दिखती है। जैसे कि इसमें बताया गया है कि भगवान शिव 108 रुद्राक्षों की माला पहनते हैं। उनकी जटाओं से गंगा निकलती है। वे शेर की खाल पर बैठते हैं। शरीर पर राख मलते हैं आदि। संक्षेप में कहें तो शिव का स्वरूप और दर्शन ही इको फ्रेंडली है। यह स्थापना पर्यावरण को धार्मिक, आध्यात्मिक और सामाजिक अभिस्वीकृति दिलाने का उपक्रम तो हो सकती है, लेकिन प्रयोगसिद्ध वैज्ञानिक तथ्‍य नहीं हो सकती। शिव की वैज्ञानिक शक्ति को भी विज्ञान की कसौटी पर परखना होगा।

वैसे भी हिंदू धर्म में वैज्ञानिक से लेकर सामाजिक विचार आम लोगों तक पहुंचाने के लिए प्रतीकों का अत्यधिक उपयोग हमारे पूर्वजों ने किया है। हमारे देवी देवता भी इन्हीं प्रतीकों, कल्पनाओं और आंकाक्षाओं के मूर्तिमंत स्वरूप हैं। परिकल्पनाएं विज्ञान में भी होती हैं, लेकिन उन्‍हें मान्यता प्रायोगिक रूप से सिद्ध होने पर ही मिलती है। विमानों का उल्लेख हमारे प्राचीन ग्रंथों में है, लेकिन वे विमान योग शक्ति से चलते थे या तंत्रशक्ति से इसकी कोई पुख्‍ता जानकारी हमें नहीं है। इसका कारण यह भी है कि हमारा प्राचीन ज्ञान संस्कृत में है। उसे जानने और उसकी सही व्याख्या करने वालों की संख्या बहुत कम है। यह मानने का भी कोई ठोस आधार नहीं है कि जो लिखा गया है, वह प्रयोगसिद्ध ही था। अगर था तो क्या हम आज की स्थिति में उसे उसी रूप में प्राप्त कर सकते हैं, यह भी हम नहीं जानते। उदाहरण के लिए आधुनिक काल में लियानार्दो द‍ विंसी ने पहली बार आकाश में उड़ने वाले विमान की कल्पना की। लेकिन विमान का आविष्कारक राइट बंधुओं को ही माना गया। इसका अर्थ यह भी नहीं कि हम अपने प्राचीन ज्ञान को न सहेजें या उसे कपोल कल्पना कहकर ठुकराएं। लेकिन मान्यताओं के तार्किक आधारों को खोजना, प्रतीकों को प्रायोगिक रूप से सिद्ध करना और जटिल सूत्रों की सुगम व्याख्या करना भी हमारी ही जिम्मेदारी है। कल्पना और तर्क का सेतु ही विज्ञान है। तथ्‍य के माध्यम से सत्य का अन्वेषण ही वैज्ञानिक दृष्टि है। इसे दरकिनार कर केवल पारंपरिक मान्यताओं को सत्य मानने का आग्रह अहंमन्यता ही होगी। इससे बचना होगा। लुप्त हुई सरस्वती नदी जब विज्ञान की आंख से भी दिखेगी, तभी विज्ञान जगत में मान्य होगी। ऐसा होता आया है, इसलिए सही है, यह वैज्ञानिक सोच नहीं है।

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