आप लाख जतन कर लें, डोसा सस्ता हो ही नहीं सकता

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रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन से पिछले शनिवार एक कार्यक्रम में जो सवाल हुआ वह बहुत हलके फुलके ढंग में ले लिया गया, जबकि वास्‍तव में वह सवाल हमारी आज की समूची अर्थव्‍यवस्‍था और महंगाई जैसी समस्‍या की पोल खोलने वाला हे। कोच्चि में राजन से इंजीनियरिंग की एक छात्रा ने पूछा कि- ‘’जब महंगाई दर बढ़ती है तो साथ-साथ डोसा भी महंगा हो जाता है। लेकिन जब महंगाई दर घटती है, तब डोसा सस्‍ता नहीं होता।‘’
पहले वो जवाब सुनिए जो रघुराम राजन ने दिया। वे बोले- ‘’डोसा बनाने की टेक्‍नालॉजी नहीं बदली है। डोसा बनाने वाला व्‍यक्ति आज भी तवे पर घोल डालता है, उसे फैलाता है और फिर उतार लेता है। इस बारे में किसी नई तकनीक का विकास अभी तक नहीं हुआ। दूसरी तरफ डोसा बनाने वाले का वेतन या पारिश्रमिक बढ़ता जा रहा है और यही कारण है कि डोसे की लागत बढ रही है।‘’
रघुराम राजन वाला किस्‍सा इसलिए याद आया क्‍योंकि ऐसा ही एक सवाल पिछले दिनों एक उच्‍चस्‍तरीय बैठक में हमारे मध्‍यप्रदेश में भी पूछा गया था। हुआ यूं कि मुख्‍यमंत्री की मौजूदगी में एक बैठक के दौरान मुख्‍य सचिव ने अफसरों से पूछ लिया कि जब स्‍कूल बस वालों से लिए जाने वाले टैक्‍स की राशि में भारी कटौती कर दी गई है तो फिर इसका फायदा बच्‍चों के माता पिता या अभिभावकों को क्‍यों नहीं मिल पा रहा है? मुख्‍य सचिव जानना चाहते थे कि यदि सरकार ने जनता को सुविधा देने के लिए किसी कर या शुल्‍क की दर में कटौती की है तो वह राहत अंतिम हितग्राही तक पहुंचनी चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। सरकार की ओर से दी गई छूट बस मालिक या बिचौलिए ही जीम रहे हैं और जनता लगातार बढ़ता शुल्‍क देने को मजबूर है।
कोच्चि और भोपाल की घटनाओं में फर्क सिर्फ इतना रहा कि कोच्चि में तो रघुराम राजन ने तवे और तकनीक को दोषी ठहराते हुए समझाने की कोशिश की डोसा सस्‍ता क्‍यों नहीं हो रहा है। लेकिन भोपाल में न तो किसी ने इसका जवाब जानने में रुचि दिखाई और न ही यह समझाने की कोशिश की कि स्‍कूल बस वालों द्वारा प्रतिमाह ली जाने वाली राशि सरकार की छूट के बाद भी कम क्‍यों नहीं हो रही है।
कुछ माह पहले जब तुवर दाल के दामों में अचानक बेतहाशा बढ़ोतरी हुई थी तो बहुत वाजिब सवाल उठा था। उसका लब्‍बो लुआब यह था कि दाल के दाम 80 रुपए प्रतिकिलो से बढ़कर 180 रुपए तक हो जाते हैं, सरकार कुछ नहीं करती। जब बहुत ज्‍यादा हो हल्‍ला मचता है तो दिखावटी छापामारी और आयात आदि के जरिए नया खेल होता है और दाम 180 रुपए से गिरकर 125 या 140 तब आ जाते हैं। सरकार वाहवाही लूटने के लिए बयान देती है कि उसके प्रयासों से दामों में 40 से 55 रुपए प्रतिकिलो की भारी गिरावट आ गई। लेकिन जो बात जनता को बताई नहीं जाती या जो बात जनता को भुगतनी पड़ती है वह यह कि इस पूरे खेल में दाल असलियत में दो तीन महीनों में ही 80 रुपए प्रतिकिलो से बढ़कर 125 या 140 रुपए तक पहुंच जाती है। यानी दाम कम नहीं हुए होते हैं, बल्कि 45 से 60 रुपए प्रतिकिलो तक बढ़ गए होते हैं। पूरा खेल ऐसे रचा जाता है कि चंद दिनों में बाजार को प्रतिकिलो 45 से 60 रुपए की खुली लूट करने का जायज अधिकार मिल जाता है।
अब जरा फिर से लौटिए उसी सवाल पर जो रघुराम राजन से पूछा गया था। सवाल यह था कि जब महंगाई दर बढ़ती है तो चीजों के दाम भी बढ़ जाते हैं, लेकिन जब महंगाई दर घटती है तो उसी अनुपात में लोगों को मिलने वाले सामान की दर क्‍यों नहीं घटती? होता यही है कि एक बार जो दाम बढ़ गए सो बढ़ गए। दिखावे के लिए दो, चार रुपए कम कर दिए जाते हैं लेकिन असलियत में 15, 20 या 25 रुपए की बढ़ोतरी हो चुकी होती है।
मोदी सरकार जिन मुद्दों को लेकर सत्‍ता में आई थी उसमें सबसे अहम मुद्दा महंगाई का था, लेकिन डेढ़ साल बीत जाने के बाद भी लोगों को महसूस नहीं हो रहा कि महंगाई में कोई कमी आई है। सरकार के आंकड़े अपनी जगह कमी दर्शाने वाले हो सकते हैं लेकिन आप किसी से भी पूछ लीजिए उसका जवाब यही होगा कि उसे कमी तो ‘महसूस’ नहीं हो रही।
रघुराम राजन ने तवे और तकनीक का उदाहरण देकर भले ही उस छात्रा को बहला दिया हो, लेकिन सवाल वहीं का वहीं है कि डोसा सस्‍ता क्‍यों नहीं होता? यदि आप मुझसे यह सवाल पूछें तो मैं भी तवे का ही सहारा लूंगा, और मेरा जवाब होगा- कुछ लोग मुनाफाखोरी के ‘तपते तवे’ पर बैठे हैं, वे जनता को जल्‍दी से जल्‍दी लूट लेने की होड़ में है… ऐसे में डोसा कभी सस्‍ता हो ही नहीं सकता।

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