काश काम आ जाएँ किसी के, इच्छा है ,दीवानों की !

सतीश सक्सेना

काश काम आ जाएँ किसी के, इच्छा है ,दीवानों की !

 

दुनिया वाले क्या पहचाने,फितरत हम मस्तानों की !
कहाँ से लायेंगे, उजला मन, आदत पड़ी बहानों की !

हँसते हँसते सब दे डाला , अब इक जान ही बाकी है !
काश काम आ जाएँ किसी के, इच्छा है ,दीवानों की !

रहे बोलते जीवन भर तुम,हम किससे फ़रियाद करें !
खामोशी का अर्थ न समझे,हम फक्कड़ मस्तानों की !

सूफी संतों ने सिखलाया , मदद न मांगे, दुनिया से !
कंगूरों को, सर न झुकाया, क्या परवा सुल्तानों की !

प्यार बाँटते, दगा न करते , भीख न मांगे दुनिया से !
ज्वालामुखी मुहाने जन्में , क्या चिंता अंगारों की !

अभिशापित जीवन पाया है, क्या हमको दे पाओगे !
जाओ, जाकर, बाहर घूमो ,रौनक लगी बाजारों की !

बंजारे को ख्वाब दिखाते , महलों और मेहराबों के !
बरगद तले, बसेरा काफी, मदद न लें इन प्यारों की !

 

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