किसान आत्महत्या पर यह कैसी असंवेदना

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क्या विडंबना है जब एक तरफ देश के प्रधानमंत्री मध्यप्रदेश में किसानो के भले के लिए महत्वाकांक्षी फसल बीमा योजना की शुरूआत की तैयारी कर रहे थे, उसी समय महाराष्ट्र में उन्हीं की पार्टी के एक सांसद किसानों की आत्महत्या को ‘फैशन’ बता रहे थे। इन ‘विद्वान’ सांसद का मानना है कि किसानों की आत्यहत्या भूख और कंगाली से नहीं हुई, बल्कि सरकार से ज्यादा से ज्यादा मुआवजा पाने के लालच के चलते हुई हैं। इस पर हल्ला मचा तो सांसद ने यह कहकर सफाई दी ‍िक उन्होने यह बात किसी और संदर्भ में कही थी। सत्ता नेताअों की आंखों पर कैसे हरा चश्मा चढ़ा देती है, इसे समझने के लिए दूसरे उदाहरण की आवश्यकता नहीं है।

किसानों की आत्महत्या हमारी व्यवस्था का सबसे बड़ी असफलता और अ‍भिशाप है। हर साल बेहतर फसल की आस में कर्ज में डूबते किसान और प्रकृति की दगाबाजी ने उन्हे कहीं का नहीं छोड़ा है। देश में हर सरकार खुद को किसानो का हितैषी बताकर सत्ता में आती है और सबसे पहले उसी को हाशिए में पटक देती है। बार बार खराब होती फसलों ने छोटे किसानों के सामने खुदकुशी के अलावा कोई विकल्प नहीं छोड़ा है। ऐसे किसानों की पत्नियों और मांअों के लिए तो जिंदगी और मुश्किल हो जाती है। जब घर का ‘कर्ता’ पुरूष तो दुनिया छोड़ जाता है लेकिन परिवार को पालने का जिम्मा घर की महिलाअो पर छोड़ जाता है। ऐसे किसानों को तत्काल और न लौटानेवाली बिना शर्त आर्थिक मदद  चाहिए। यही बात करने को कोई सरकार तैयार नहीं है। देश में ‘नाम फाउंडेशन’ जैसी संस्थाएं ऐसे ही पीडि़त ‍िकसान परिवारों को यथा संभव आर्थिक मदद देकर उनके आंसू पोंछने  का काम कर ही है।

अफसोसनाक तो यह है कि भाजपा के सांसद गोपाल शेट्टी उसी महाराष्ट्र में उत्तर मुंबई से हैं, जहां पिछले 45 दिनों में 124 किसान फसल बर्बादी के बाद दम तोड़ चुके हैं। लेकिन सांसद महोदय को उनका दर्द नहीं दिखा। निहायत असंवेदनशील ढंग से उन्होने उसका मजाक बनाते हुए कहा ‍िक वे केवल ज्यादा मुआवजा पाने  के ‍िलए  बतौर ‘फैशन’ अपनी जानें गवां रहे हैं। कोई किसान अपने परिवार को भगवान भरोसे छोड़ बिना कारण जान देना क्यों चाहेगा। घोर निराशा के क्षणों में ही वह ऐसा कदम उठाने पर विवश होता है।

देश में मध्यप्रदेश सहित 6 राज्य ऐसे है, जहां बीते कुछ वर्षों में सर्वाधिक किसानों ने अात्महत्याएं की है। मप्र के अलावा यह हैं महाराष्ट्र, तेलंगाना,  आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़  और कर्नाटक। महाराष्ट्र में बीते 20 सालों में किसानों की आत्महत्याअों का आंकड़ा 63,318 तक पहुंच गया है. बीते साल देश भर में किसानों की कुल आत्महत्या में 45 फ़ीसदी से ज़्यादा मामले इस राज्य में दर्ज़ किए गए हैं।

शेट्टी के इस शर्मनाक बयान पर किसी ने सवाल  उठाया है कि क्या खुदकुशी भी कोई फैशन हो सकता है? क्या कोई सिर्फ य ह दिखाने के लिए भी मरेगा कि वह ‘मर’ सकता है। शायद नहीं। लेकिन अगर सत्ता हाथ में हो तो इस सवाल का जवाब ‘हां’ में भी हो सकता है। सत्ता और सुविधाअों के रथ पर सवार होते ही नेता आसमान में उड़ने लगते हैं और उन्हे सावन के अंधे की तरह अपना सब कुछ अच्छा और विपक्षी का सब बुरा लगने लगता है। जमीनी हकीकत को समझने और उसे स्वीकारने की सहज बुद्धि भी सत्ता सोच की रेहन हो जाती है। किसानों को वास्तविक मदद पहुंचाना तो किसी भी राजनीतिक पार्टी का मकसद नहीं होता। कुछ टोटके कर किसानों को वोट बटोरना उनका असली उद्देश्य होता है। इस देश में अरबों रूपए भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ सकते हैं, लेकिन पीडि़त‍ किसान को एक पैसा देने में भी जान पर आती है।

 

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