टोल के खेल में हो रही जनता की फजीहत

मध्यप्रदेश सरकार ने फैसला किया है कि वह राज्‍य के 32 ऐसे पुलों पर अब कोई टोल टैक्‍स नहीं लेगी जिनसे होने वाली सालाना आय 10 लाख रुपए से कम है। सरकार ने यह फैसला सोमवार को मंत्रिमंडल की बैठक में किया जिसके मुताबिक यह वसूली एक अप्रैल 2016 से बंद कर दी जाएगी।
दरअसल मध्‍यप्रदेश में ही नहीं पूरे देश में टोल टैक्‍स एक बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है। सरकारों के पास जब सड़क जैसी बुनियादी सुविधा मुहैया कराने तक के लिए पैसे नहीं बचे तो यह रास्‍ता निकाला गया कि निजी क्षेत्र के साथ मिलकर सड़कें या पुल बनाए जाएं। इस व्‍यवस्‍था से सरकार के लिए यह आसानी हुई कि वह अपने संसाधनों से जो पैसा नहीं जुटा सकती थी वह निजी क्षेत्र ने मुहैया करा दिया और इस तरह नई सड़कें और पुल पुलियाएं बनने लगीं। इस व्‍यवस्‍था का फायदा भी हुआ और लोगों को कुछ ठीक ठाक सड़कें मिलने लगीं। अनुबंध के तहत संबंधित कंपनी की ही यह जिम्‍मेदारी रखी गई कि वह सड़कों व पुल पुलियाओं का रखरखाव भी करेगी। इसके एवज में यह सुविधा दी गई कि निर्माण में लगाई गई राशि की वसूली के लिए सड़क या पुल से गुजरने वाले वाहनों से एक निश्चित राशि वसूल की जाए। इसके लिए टोल नाके नीलाम किए गए।
बुनियादी तौर पर आर्थिक सुविधा जुटाने के लिए शुरू की गई यह प्रैक्टिस धीरे धीरे बड़ी आमदनी का जरिया बन गई। क्‍योंकि वाहनों की संख्‍या लगातार बढ़ी और पहले जो यात्राएं बसों या सार्वजनिक वाहनों से होती थी कालांतर में उसके साथ साथ लोगों ने खुद के वाहनों से भी यात्राएं करना शुरू कर दिया। चूंकि आरंभिक दौर में इस काम में काफी फायदा दिख रहा था इसलिए नेताओं और अफसरशाही ने भी ऐसे प्रोजेक्‍ट्स में परोक्ष रूप से अपनी भागीदारी तय करना शुरू कर दिया। बाद में तो कई राजनेताओं ने खुद टोल नाकों की नीलामी में बोलियां लगाईं और उन्‍होंने या उनके पट्ठों ने ऐसे कई टोल नाके हथिया लिए।
ऐसा नहीं था कि इस तरह का टैक्‍स पहले नहीं लिया जाता था लेकिन पीपीपी मोड में बनने वाली सड़कों और पुल पुलियों पर इसकी वसूली काफी अधिक होने लगी। जगह जगह ऐसे टोल नाके बनाकर वसूली के अड्डे खोल दिए गए। पहले यह तय था कि एक निर्धारित अवधि तक ही टोल टैक्‍स या पथ कर लिया जाता था। मोटे तौर पर यह व्‍यवस्‍था थी कि उस पुल के बनाने में जितनी लागत आई है उस लागत की वसूली हो जाने के बाद वह पुल या सड़क जनता के लिए फ्री कर दिया जाता था। लेकिन बाद में कई मामले ऐसे सामने आए जहां ऐसे पुलों की लागत का कई गुना वसूल हो जाने के बाद भी वहां से गुजरने वाले लोगों से टोल टैक्‍स के नाम पर वसूली जाती रही। आज भी प्रदेश में ऐसे कई टोल नाके मिल जाएंगे जो उन जगहों पर बने हैं जहां पुल पुलियों की लागत कब की निकल चुकी है।
अब सरकार ने यदि फैसला किया है कि दस लाख रुपए सालाना से कम आय वाले टोल नाके बंद कर दिए जाएंगे तो इसे फौरी तौर पर वाहवाही लेने का सबब भले ही बना लिया जाए पर प्रदेश की जनता को कोई खास राहत मिलने वाली नहीं है। ये ऐसे पुल पुलिया होंगे जिनकी लागत या तो जनता दे चुकी होगी या फिर वहां से वाहनों का अवागमन बहुत ही कम होगा। गणित ही लगाना है तो दस लाख रुपए सालाना से कम की आय का मतलब है औसतन ढाई से पौने तीन हजार रुपए रोज। और यदि एक वाहन से औसतन 25 रुपए की वसूली भी मानी जाए तो ढाई हजार रुपए प्रतिदिन की आय के मान से उस पुल से दिन भर में मात्र सौ ही वाहन गुजरते होंगे। और 24 घंटे में 100 वाहनों के गुजरने का मतलब हुआ एक घंटे में चार से पांच वाहन। यानी एक तरह से वह मार्ग सुनसान ही पड़ा रहता होगा। वहां तो टोल नाके का वैसे भी कोई अर्थ नहीं है। ऐसे नाके चाहे निजी क्षेत्र के हों या सरकार के, वहां तैनात किए जाने वाले मानव संसाधन और अन्‍य रखरखाव का खर्च ही इससे कहीं अधिक हो जाता होगा। इसलिए माना जाना चाहिए कि सरकार के इस फैसले के पीछे आमदनी अठन्‍नी और खर्चा रुपैया वाली मजबूरी ज्‍यादा होगी।
अगर प्रदेश की जनता को कुछ राहत ही दी जानी है तो टोल नाकों पर लिए जाने वाले शुल्‍क को उत्‍तरोत्‍तर कम करने जैसी कोई व्‍यवस्‍था होनी चाहिए। अभी इसका उलटा हो रहा है। हर बार बढ़ी हुई दरों पर टोल नाके दिए जाते हैं और ठेकेदार के दबाव में प्रति वाहन ली जाने वाली दरें भी उस हिसाब से संशोधित होती रहती हैं। बेहतर सुविधा के लिए मामूली शुल्‍क पर किसी को ऐतराज नहीं होगा लेकिन सड़क का इस्‍तेमाल गुनाह हो जाए यह तो ठीक नहीं है।

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