पर्यटन की क्रूरता : राकेश दीवान

इंदिरा सागर की चपेट में आए करीब ढाई सौ गांव, कस्‍बे पुनर्वास के नाम पर बताए गए अपने-अपने ठिए पर अभी ठीक से बसे भी नहीं हैं, लेकिन राज्‍य का पर्यटन विभाग वहीं, एन जलाशय की देहरी पर ‘उत्‍सव दिल से’ मनाने के लिए ‘जल महोत्‍सव’ का आयोजन करने जा रहा है। तरह-तरह के विज्ञापनों, पर्चे-पोस्‍टरों की मार्फत हर खासो-आम को बताया जा रहा है कि खंडवा जिले के हनुवंतिया में खडी की गई मौज-मजे की तरकीबों का लुत्‍फ उठाकर कोई भी धन्‍य हो सकता है। इतने पर भी न मानने वालों को भरोसा दिलाने के लिए राज्‍य सरकार ने वहीं, जलाशय में केबिनेट की ‘क्रूज मीटिंग’ भी कर ली है।

दस दिन का यह तमाशा दुनिया के विशालकाय बांधों में से एक इंदिरा सागर की वजह से, सरकार के मुताबिक विस्‍थापित हुए करीब 44,631 परिवारों की छाती पर किया जा रहा है। विस्‍थापितों की नफरी में हमेशा गफलत करती रही सरकार के ‘नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण’ उर्फ एनवीडीए के मुताबिक हालांकि सभी गांवों और विस्‍थापितों का पुनर्वास हो चुका है, लेकिन लगभग एक फीसदी यानि करीब साढे चार हजार ‘भडकाए’ गए परिवार अब भी ‘शिकायत निवारण प्राधिकरण’ और अदालतों के चक्‍कर में फंसे हैं। यानि आज भी विस्‍थापितों का सौटंच पुनर्वास नहीं हुआ है। क्‍या तरह-तरह के ‘वाटर स्‍पोर्टस्,’ ‘नाइट केंपिंग,’ कैम्‍प फायर,’ पक्षी-अवलोकन आदि के साथ हनुवंतिया और उसके आसपास डूबी इस भरी-पूरी समाज-व्‍यवस्‍था, कृषि और इतिहास के बारे में पर्यटकों को नहीं बताया जाना चाहिए?

जालिम जमाने की छोडिए, इस पूरे तामझाम को अमली जामा पहनाने में लगा राज्‍य का पर्यटन विभाग खुद इस मामले में अनजान है। पर्यटन विभाग के मामूली कारिंदों से लगाकर आला अफसरों तक को इस नामुराद विस्‍थापन-पुनर्वास और यहां तक कि इंदिरा सागर के बारे में भी नहीं मालूम। उनसे पूछें तो जबाव मिलता है-विस्‍थापन हुआ है तो पुनर्वास भी हुआ ही होगा। कहां हुआ है-पूछने पर वे आसमान ताकने लगते हैं। इंदिरा सागर के जलाशय में नर्मदा से एक समूचे सतपुडा पहाड की दूरी पर बहने वाली ताप्‍ती का संगम करवाने और उसके करीबी टापू को इसीलिए ‘मेल’ नामधारी बताने वाले पर्यटन विभाग के वरिष्‍ठ अफसर इससे ज्‍यादा और क्‍या कर सकते हैं ?

सरकारी अमले की नजर से ‘देश के लिए त्‍याग’ करने वाले विस्‍थापितों की थोडी-बहुत ‘वीर-गाथा’ देश-विदेश से पधारने वाले पर्यटकों को भी सुनाई तो जानी ही चाहिए। उन्‍हें बताया जाना चाहिए कि बांध में पानी भर जाने के बाद कुछ हजार विस्‍थापितों को भले ही घर-प्‍लॉट मिल गए हों, लेकिन पेट भरने के लिए रोजगार की जमीन आज तक उनके नसीब में नहीं है। जाहिर है, नर्मदा पंचाट, सुप्रीम कोर्ट और भांति-भांति के सरकारी निर्देशों के बावजूद विस्‍थापितों को, उनकी पसंद की जमीन पर छह महीने पहले पुनर्वास किए बिना ही बांध में पानी भर दिया गया। लेकिन अपने समाज, उसकी गाथा और आसपास की प्राकृतिक, सामाजिक और सांस्‍कृतिक संपदा से परिचय कराना हमारे आज के खाऊ-उडाऊ पर्यटन में समय की बर्बादी माना जाता है।

नमूने के लिए पास के तवा जलाशय और सतपुडा टाइगर रिजर्व को ही लिया जा सकता है। टाइगर रिजर्व से धांई सरीखे अनेकों गांवों को सिर्फ इसलिए खदेड दिया गया और अब भी खदेडा जा रहा है क्‍योंकि, वन विभाग के मुताबिक, ग्रामीणों की मौजूदगी और गतिविधियों से वन्‍यप्राणी, खासकर बाघ विचलित होते हैं। अब उसी टाइगर रिजर्व से लगे तवा जलाशय में पर्यटन के नाम पर ऐसे क्रूज और बडी नावें उपलब्‍ध करवाई जा रही हैं जिनमें कई-कई डेसिबल शोर पैदा करने वाले डीजे लगाकर पार्टियां की जा सकती हैं। पर्यटन विभाग का कहना है कि रात दस बजे के बाद डीजे बंद करवा दिए जाते हैं, मानो बाघ समेत बेचारे सभी वन्‍यप्राणी दस बजे के बाद ‘गुड-नाइट’ करके सो जाते हैं।

सतपुडा टाइगर रिजर्व में पिछले सालों में पर्यटन और वन, दोनों विभागों ने मिलकर ‘फोरसिथ ट्रेल’ आयोजित की थी। इसका मकसद पर्यटकों को उस रास्‍ते का परिचय करवाना था जिसके जरिए उन्‍नीसवीं सदी के मध्‍य में केप्‍टन जेम्‍स फोरसिथ पचमढी पहुंचा था। अलबत्‍ता, बडे हो-हल्‍ले के साथ आयोजित इस यात्रा में कहीं उस कोर्कू राजा भभूतसिंह का कोई जिक्र नहीं था जिसे जबलपुर जेल में फांसी पर चढाकर अंग्रेजों ने पचमढी पर कब्‍जा जमाया था और इन्‍हीं फोरसिथ की देखरेख में देश में वन विभाग का पहला दफ्तर ‘बायसन लॉज’ में खोला था। भभूतसिंह और उनके संगी-साथियों की वीरगति के बाद अंग्रेजी राज और खासकर दूसरे विश्‍वयुद्ध के जहाजों के लिए सागौन की खातिर देश का पहला बोरी अभयारण्‍य भी बनाया गया था। इस इतिहास के बारे में प्रेस के पूछने पर वन विभाग का चौंकाने वाला जबाव आया कि अच्‍छा, ऐसा भी कभी हुआ था!

स्‍थानीय समाज की क्रूर अनदेखी कर किए जाने वाले पर्यटन से आखिर क्‍या हासिल होगा?  पर्यटन की कथित ‘इंडस्‍ट्री’ में लगे तमाम लोगों, खासकर सरकार से यह सवाल तो पूछा ही जाना चाहिए कि क्‍या उसके लिए पर्यटन का मतलब केवल खाना-पीना, मौज-मस्‍ती भर है? क्‍या दूर-दराज से भारी-भरकम पूंजी लगाकर आने वाले पर्यटकों को केवल उम्‍दा होटल, घर-जैसा भोजन और थोडे-बहुत तमाशे भर की दरकार होती है ? और क्‍या मौज-मस्‍ती की ये कलाबाजियां अंतत: नशे-पत्‍ते, ऐशो-आराम और बाल-शोषण जैसी गंदगी में नहीं पडेंगी?  मध्‍यप्रदेश के खजुराहो, उज्‍जैन समेत देश के अनेक धार्मिक, सांस्‍कृतिक पर्यटन-स्‍थलों में फलती-फूलती मौज-मजे की गंदगी अब उजागर होने लगी है। क्‍या अब भी सरकार नहीं चेतेगी?  क्‍या अब भी पर्यटन में लगे सरकारी, निजी खिलाडी समझदार पर्यटन को बढावा देंगे? और क्‍या पर्यटन के बहाने समाज को सीखने-समझने वाले पारंपरिक पर्यटन की भी कोई अहमियत समझी जाएगी?

 

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