प्रभु जोशी का नजरिया : आभासी जाल के ये जुलाहे

इस ‘समय’ को गुज़रे अभी कोई ज़्यादा अर्सा नहीं हुआ है, बल्कि ठीक से हिसाब लगाया जाए तो इसकी गिनती, बस कुछ महीनों और दिनों में होगी, जब देश में, सत्ता द्वारा किए जाने वाले भ्रष्टाचार की खबरें, लगभग एक ‘दैनन्दिन विस्फोट’ की तरह आ रही थी। और आंकड़े लाखों नहीं, करोड़ों-करोड़ के कीर्तिमान बना रहे थे। भारतीय समाज को लग रहा था कि वह एक ऐसी बेलगाम व्यवस्था के भीतर जी रहा है, जो किसी भी दिन चरमरा कर टूट जाएगी। उसे लग रहा था, भारत एक ‘नायक-विहीन’ देश हो चुका है और बौनों की बिरादरी देश की संपदा की बंदर-बांट में लगी हुई है। हाहाकार चैतरफा था, लेकिन शिखर बैठे आदमी का मौन, मूर्तियों को भी मात दे रहा था। निन्दा से निबटारे का समय लद गया था। देश की दुर्दशा को कच्चे माल की तरह इस्तेमाल करते हुए, मसखरी के धंधे में धुत्त लोग, जनता में केवल दाँत निपोरने की लत विकसित कर रहे थे। जबकि, ये समय दाँत निपोरने का नहीं, बल्कि दाँत पीस कर पूछने का था कि तुम लोगों को वोट देकर, संसद में हमने क्या इसलिए भेजा था कि वहाँ तुम केवल चुप रहो और हरे गुलाल की तरह नोटों की गड्डियाँ हवा में उड़ाओ ?
इस बीच सत्ता ने देश की युवा पीढ़ी के बीच, एक बड़ा मुगालता बाँट दिया कि वे संसार के सूचना-उद्योग के शिल्पकार हैं। वे आई॰टी॰ जायण्ट हैं। जबकि, बकौल थॉमस फ्रीडमैन के, इनकी हैसियत, हक़ीक़तन तो आभूषण बनाने वाली दुकान के बाहर बैठे रहने वाले, उन कंगले कारीगरों की सी थी, जो केवल गहने को चमकाने भर का काम करते रहते हैं। दरअस्ल, माइक्रोसॉफ्ट और आई॰ बी॰ एम॰ प्रॉडक्ट बना रहे थे, और ये केवल उसे ‘अपडेट’ भर कर रहे थे। या फिर देर रात तक काल सेंटरों की नौकरियों में रतजगा करते हुए, किसी सात समन्दर पार बैठे उपभोक्ता की झिड़की सुनकर, चुपचाप इसलिए काम करते जा रहे थे कि वह ‘डॉलर’ में भुगतान करता है, और इसके कारण भारतीय माध्यम वर्ग में ‘कलगी उठाये’ बांग दे सकते हैं। लेकिन, कुछ ही समय में ‘डॉट कॉम’ के गुब्बारे भी धड़ाधड़ फूटने लगे और सूचना क्रांति का सुनहरा महल ढहता दिखने लगा। बेरोजगारी ने बढ़ कर, उस पढ़े लिखे मध्यम वर्ग के घरों के युवकों को भी ‘क्वालिटी लाईफ’ जीने की तमन्ना में वाहन चोरियों से लेकर बैंक डकैतियों तक के अपराधों की तरफ घेर दिया था।
भारत के ‘बेल-आउट डील’ पर हस्ताक्षर करने की घटना के दो-तीन साल आगे पीछे पैदा होने वाली पीढ़ी, बाजार को देख देख कर दीवानी हो रही थी। ‘मांगे मोर’ उनकी पंच लाईन थी। घर उनके लिए यातना शिविर होने लगा था। और वह घर में ही नहाते-धोते और खाते-पीते हुए भी ‘घर’ का नहीं, ‘बाहर’ का था। उसे लगता था, जो कुछ उसका हो सकता है, वह बाजार है। इन्दौर के ही एक अखबार के सर्वेक्षण से पता चल रहा था कि इन्दौर में ही रहने वाले परिवारों के लड़के-लड़कियां, निजी छात्रावासों में रहने में ज़्यादा स्वतंत्रता का अनुभव करते हैं। इसलिए उनको संस्कार के रूप में न तो भाषा मिल रही थी, ना ही कोई सामाजिक संास्कृतिक विवेक। उनके लिए गूगलदेव, माता-पिता, गुरु सब कुछ है। और जब फेसबुक आया तो अचानक ये वाली पीढ़ी, मुखर हो उठी। धोनी क्रिकेट के पिच पर धो रहा था, और ये फेसबुक पर। कहा जाने लगा, अब सोशल मीडिया भारतीय युवा की आवाज़ बन गया है। वहाँ बोलने और लिखने की अपार छूट थी। उसमे अराजकता की सीमा तक जाकर कुछ भी लिख कर पोस्ट कर सकते थे। नतीज़तन, जल्द ही उनकी भाषा में लमपट का लालित्य बढ़ गया। वे मारक और मुँहतोड़ मुहावरे में किसी की भी मरम्मत कर सकते थे। उनकी भाषा मंे बहुत तीखापन आता जा रहा था और ‘थ्री ईडियट्स’ और ‘डेली-बेली’ जैसी फिल्मों के प्रदर्शन के बाद तो उनकी भाषा की धार पर गालियों का पानी चढ़ गया। उनके लिए हर व्यक्ति ‘रेंचो-भेंचो’ था।
कहना न होगा कि तीखा होना संकीर्ण होना है । पेंसिल को तीखा होने के लिए आगे से संकीर्ण होना पड़ता है। यह उसकी शर्त भी है। तीखी भाषा, घोंपने के काम में आने लगी। बहरहाल, सांस्कृतिक रूप से अधकचरी समझ से उफनती युवा अभिव्यक्तियों के दौर में, सहसा चुनाव आये तो नरेंद्र मोदी की मुखरता में उन्हें अपने एक ‘अपराजेय नायक’ की संभावनाएं दिखने लगीं और उनके ‘अच्छे दिनों’ के आने के ‘आहवान’ पर तो पूरी पीढ़ी ही न्यौछावर हो गई। शायद नेहरू की युवावस्था में भी, उस वक्त की पीढ़ी उनके भाषणों और आक्रामक तेवरों की उतनी दीवानी नहीं रही होगी, जितनी कि मोदी की। युवा पीढ़ी के भीतर जो अधीरता होती है , उस अधीरता को नरेंद्र मोदी ने बहुत सफलता के साथ चैनलाईज्ड किया। मोदी के मतवाले राही, करोड़ों में हो गए। वे फेसबुक पर अपने नायक के विरुद्ध की गई टिप्पणी को देखते ही उसकी धज्जियाँ उड़ा देते थे। वे अभी तक अपनी अभ्यस्त मसखरी में इतने पारंगत हो चुके थे कि वे तर्कों नहीं, कुतर्कों से भी असहमति को किरच-किरच कर देते थे। एक अघोषित और असंगठित सार्वदेशीय एकता, तमाम युवाओं के भीतर काम करने लगी। चुनावों के बाद मोदी, विराट अवतार की तरह देश की राष्ट्रीय राजनीति में आये। इस बीच मोदी के इस प्राकट्य से दक्षिणपंथी राजनीति के अन्य घटकों में ग्लानि से भरे भारत में ‘हिन्दू राष्ट्रवाद’ के स्वप्न साकार कर देने वाले व्यक्ति की तरह देखना और दिखाना शुरू कर दिया।
नतीज़तन, लगे हाथ सोशल मीडिया पर युवा पीढ़ी की भाषा में आक्रामकता बढ़ी और वे ‘बाइनरी अपोजीशन्स’ की भाषा में ‘हम’ और ‘वे’ मे,ं समाज को बाँट कर देखने के दुर्दांत आग्रहों से घिर गये। वे भारतीय इतिहास और उसकी सामाजिक संस्कृति को भूलकर बदअखलाक भाषा में, ‘असहिष्णु’ दिखने लगे, जैसे कि भारत के अब एक ‘एथनोसेंट्रिक’ समाज बनने के दिन आ गए हैं, और अब वहाँ ‘अन्य’ के लिए कोई रियायत बरतना गलती है। इसके साथ ही संसार के सूचना-सम्राटों ने, इस्लामिक फोबिया भी खड़ा कर दिया।
बहरहाल, ये ‘आभासी दुनिया’ के घोड़े पर सवार पीढ़ी, न तो हिन्दुत्व के एजेन्ट की कोई मैदानी फौज है और ना ही उसकी किसी घटक का कोई सक्रिय सदस्य। यह तो सोशल मीडिया के नशे में धुत्त, बदअखलाक भाषा में, नहले पर दहला मारने वाली ‘विचारहीन विचार’ से भरी फोकटिया जमात है। न उसमें इतिहास-बोध है और न ही कोई भविष्य-दृष्टि। आज, अभी, अत्ता, ताबड़तोब-सी अपशब्दों में आत्मनिर्भर हुई एक ऐसी उत्पाती आबादी है, जिसमें समय, समाज और धर्म की रत्ती भर भी समझ नहीं है।
यदि हिंदुस्तान के बाहर बैठा कोई सोशल मीडिया का अध्येता इनकी टिप्पणीयों के आधार पर कोई आकलन प्रस्तुत कर रहा है तो वह सिद्ध कर सकता है कि ‘हिन्दू नाम’ वाले नब्वे प्रतिशत फेसबुकिया उपभोक्ता, सबसे अधिक ‘असहिष्ण’ु और ‘सांप्रदायिक’ हैं, जबकि भारत के अन्य धार्मिक समुदाय के लोग, दो प्रतिशत भी नहीं हैं। ये ही जमात, ‘थ्री ईडियट’ की गलेण्डी भाषा में देश की ‘असहिष्णुता’ का मानचित्र गढ़ रही है। ये मोदी के मतवाले दिखाई देते हैं, और लगता है जैसे ये एक खास एजेंडे को पूरा करने का संकल्प लिए हुए हैं। यदि, ऐसी ही सूचना, समाज में जाती रही तो मोदी के नायकत्व को शून्य करने के लिए उनको अपने किसी विरोधी दल की जरूरत नहीं पड़ेगी। ये ही ‘नायकत्व’ को छीन लेंगे। ये उस आनंदवाद के उन्माद में असहिष्णुता का जाल बुनने वाले आभासी जुलाहे हैं, जो एक दिन उत्सवी मौज में किसी मूर्ति को गाजे बाजे के साथ लाते हैं और फिर उसे खुद ही एक दिन सिरा भी देते हैं। वे किसी के नियंत्रण में नहीं हैं।

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