मान क्यों नहीं लेते कि सब कुछ संपन्न हो चुका

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मंगलवार से मध्‍यप्रदेश विधानसभा का बजट सत्र औपचारिक रूप से आरंभ हो गया। इस सत्र में जो सबसे ‘महत्‍वपूर्ण काम’ होना है वह है प्रदेश के बजट की प्रस्‍तुति और उसका पारित किया जाना। बाकी तो वही सब कुछ होगा, जो इन दिनों संसद और विधानसभाओं में हो रहा है। कहने को सत्र 39 दिन तक चलेगा लेकिन इसमें सदन की बैठकें 25 दिन ही होंगी, बाकी दिन अवकाश रहेगा। तारीखें यदि कुछ कहती हैं और तारीखों से जुड़े मिथ यदि कुछ संकेत करते हैं, तो प्रदेश की जनता इस बात के अर्थ लगाने के लिए स्‍वतंत्र है कि यह सत्र ‘एक अप्रैल’ तक चलने वाला है।
बजट सत्र की शुरुआत परंपरागत रूप से राज्‍यपाल रामनरेश यादव के अभिभाषण से हुई। स्‍वास्‍थ्‍य संबंधी कारणों से ‘महामहिम’ ने 47 पेजी अभिभाषण सिर्फ 1 मिनट में खत्‍म कर दिया। 154 बिंदुओं में से उन्‍होंने शुरू के दो बिंदु और आखिरी का एक बिंदु पढ़ा और उनका पूरा भाषण ‘पढ़ा हुआ मान लिया गया।‘ संसदीय सदनों में विशेष स्थितियों में यह परंपरा रही है कि कोई भाषण, प्रस्‍ताव आदि यदि किसी भी कारण से पढ़े या प्रस्‍तुत नहीं किए जा सकें तो उन्‍हें ‘पढ़ा हुआ’ या सदन के पटल पर ‘रखा हुआ’ मान लिया जाता है।
मान लिए जाने की यह परंपरा बहुत पुरानी है। लेकिन इन दिनों संसदीय संस्‍थाओं में जिस तरह के हालात चल रहे हैं, उनके चलते इसका महत्‍व बहुत अधिक बढ़ गया है। यदि सत्‍ता पक्ष विपक्ष को और विपक्ष सत्‍ता पक्ष को अपनी बात सुनने के लिए नहीं ‘मना’ पाता तो वह ‘मान लिए जाने’ का टोटका कर इच्‍छा पूरी कर लेता है। इस तरह कई सारी चीजें इस ‘मान’ ली गई परंपरा के तहत पूरी हो जाती हैं। मध्‍यप्रदेश विधानसभा में भी पिछले कई सत्रों में ऐसा हुआ है कि कई महत्‍वपूर्ण दस्‍तावेज सदन के पटल रख दिए गए और मान लिया गया कि उन पर चर्चा हो गई। संसद के पिछले सत्र में जिस तरह का अभूतपूर्व हंगामा हुआ था उसमें भी ऐसे ही कई महत्‍वपूर्ण विषय बिना चर्चा के मंजूर हुए मान लिए गए।
यानी जो बात हुई नहीं, हो नहीं सकी या होने नहीं दी गई उसे अब ‘संपन्‍न हुआ’ मान लिया जाता है। भोपाल में राज्‍यपाल के अभिभाषण से और नई दिल्‍ली में राष्‍ट्रपति के अभिभाषण से बजट सत्र की शुरुआत हुई है। दोनों जगह ‘असली’ कामकाज एक दो दिन बाद शुरू होगा और तब पता चलेगा कि लोकतंत्र का मंदिर कही जाने वाली इन संस्‍थाओं में इस बार भी कोई कामकाज हो पाता है या नहीं। मध्‍यप्रदेश में तो थोड़ा बहुत कामकाज होने के आसार फिर भी दिखाई देते हैं लेकिन संसद में हंगामे की आशंकाएं पिछले सत्रों से भी ज्‍यादा हैं। ऐसे में क्‍या यह नहीं हो सकता कि रोज रोज के हंगामे और शोर शराबे के बजाय संसद और विधानसभा के सत्र भी ‘संपन्‍न हुए’ मान लिए जाएं। ऐसा होने के कई फायदे हैं, सबसे बड़ा फायदा तो यही होगा कि जनधन की हानि रुकेगी। अभी तो करोड़ों रुपए खर्च करके आयोजित होने वाले सत्रों में धेले भर का काम नहीं हो पाता। संसदीय काम की चिंता तो अब किसी को है नहीं, तो ऐसा क्‍यों न कर लें कि उस बहाने ‘खर्च’ होने वाला पैसा ही बचा लिया जाए। दूसरा फायदा सरकार या सत्‍ता पक्ष को यह होगा कि किसी भी बिल आदि को पास करने कराने की झंझट ही खत्‍म हो जाएगी। सरकार बिल लाई और उसे पारित हुआ मान लिया गया। वाद-विवाद का कोई टंटा ही नहीं….
एक बार संसद या विधानसभाओं में यह परंपरा शुरू हो जाए तो फिर कई और अवसर खुल जाएंगे। वो कहते हैं ना- बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी- उसी अंदाज में कई योजनाओं को सरकार लागू हुआ मान लेगी, कई मामलों में मान लिया जाएगा कि लोगों का भला हो चुका। … न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी की तर्ज पर गरीबी को खत्‍म हुआ मान लिया जाएगा, भूखे को भरपेट और नंगे को सोलह श्रृंगार से सज्जित मान लिया जाएगा। जरा सोचकर तो देखिए… कितने कितने फायदे हैं, इस ‘मान लिए जाने’ की अवधारणा में।
हमारे समय में अंकगणित में ब्‍याज आदि के सवालों को हल करने का फार्मूला ही इस वाक्‍य से शुरू होता था कि मान लीजिए मूलधन 100 है। सवाल हल हो या न हो लेकिन मूलधन तो 100 मान ही लिया जाता था। मानना ही तो है, मानने में किसी के पिताजी का क्‍या जाता है? इसलिए यह भी मान लीजिए कि सत्र संपन्‍न हो गया। आप चाहें तो यह भी मान सकते हैं ‘अच्‍छे दिन’ आ गए। आलोचक भले ही यह मानते रहें कि वे तो कभी आए ही नहीं थे। लेकिन जब हम मान चुके हैं तो आप कौन होते हैं, न मानने वाले…

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