विवाद की आग ठंडी होने से असली गुनहगार बेनकाब हो सकेंगे

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New Delhi: JNU teachers & students form a human chain inside the campus in protest against arrest of JNUSU President Kanhaiya Kumar, in New Delhi on Sunday.PTI Photo(PTI2_14_2016_000207A)

देश में अभूतपुर्व कटुता का सबब बने दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के विवाद के कंटीली राहें छोड़कर समझदारी की राहों की रूख करने के संकेत मिले हैं। दिल्ली पुलिस ने राष्ट्रद्रोह के आरोप में गिरफ्तार जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार की जमानत में नरमी के संकेत दिए हैं। केन्द्र सरकार की इस समझदारी के कारणों का खुलासा होना बाकी है लेकिन सरकार के इस हृदय-परिवर्तन के कारण देश राहत की सांस महसूस कर रहा है। विवाद की आग कुछ ठंडी होने के बाद अब सही गुनहगारों को सामने लाने में मदद मिलेगी। जेएनयू में देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाले लगभग आठ हजार छात्र शिक्षा पाते हैं। कहना मुश्किल है कि कन्हैया कुमार की जमानत का विरोध करने के मामले में सरकार के मौजूदा रवैए की शक्ल क्या होगी, लेकिन उसके इस आश्वासन के बाद आठ हजार छात्रो के परिजनों ने राहत की सांस ली है। पुलिस कहना है कि कन्हैया कुमार ने एक लिखित वक्तव्य में अफजल गुरू को महिमामंडित करने वाली घटनाओं पर क्षोभ व्यक्त किया है, जो 9 फरवरी के दिन घटी थी। देश भर के छात्रों को संबोधित कन्हैया कुमार की शांति-अपील के ड्राफ्ट में उनके उसी भाषण का कंटेंट है, जो पिछले कई दिनो से सोशल मीडिया पर भरपूर सराहना के साथ वायरल हो रहा है। सोशल मीडिया के विभिन्न माध्यमो पर  लगभग दस लाख लोग इसे सुन चुके हैं। कन्हैया ने उस भाषण के राजनीतिक अंशो को अलग कर दिया है, जिसमें उन्होने ने भाजपा और आरएसएस पर जबरदस्त प्रहार किए थे। कन्हैया ने देश की एकता-अखंड़ता में विश्वास व्यक्त करते हुए माना  कि 9 फरवरी की घटनाएं गलत थीं। कन्हैया ने सभी छात्रो से अनुरोध किया है कि वो विश्वविद्यालयों और समाज की शांति को भंग नहीं होने दें विभिन्न सूत्रों से प्राप्त वीडियो देखने के बाद लगता है कि कुछ जेएनयू और कुछ बाहरी लोगो ने देशविरोधी  असंवैधानिक नारेबाजी की थी। इसकी निंदा की जानी चाहिए।

इसके कारणों की मीमांसा में पहली बात तो यह समझ में आती है कि कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी शोला बनकर देश के सभी शिक्षा-परिसरों में फैलने लगी थी। दूसरे, भाजपा को इस बात का अंदाज नही था कि अफजल गुरू के मामले में भारत विरोधी नारों से सुलगी राष्ट्रवाद की लपटें दावानल में तब्दील होकर बेकाबू हो जाएंगी। भाजपा को लगता था कि राष्ट्रद्रोह की आग में कांग्रेस सहित सभी विरोधी दलों के घर स्वाहा हो जाएंगे, लेकिन प्रारम्भिक राजनीतिक बढ़त के बाद न्याय परिसर में समर्थक वकीलों की पत्रकारों से मुठभेड़ और अन्य लोगों से बेमतलब मारपीट ने हवाओं ने रुख यूं बदला कि लपटें अपने घर की ओर लौटने लगी। तीसरे, परिपक्व सत्तारूढ़ दल की तरह भाजपा घटना की स्क्रिप्ट सही तरह पढ़ने और समझने मे कमजोर रही। अपने युवा छात्र संगठनो की अतिशय महत्वाकांक्षाओं को संजोने में केन्द्र-सरकार ने अपनी मुट्ठी में चिंगारी भर ली, जिसके कारण उसकी हथेलियां जलना स्वाभाविक था। यह एक गैरजरूरी कसरत थी, और अखाड़े में उसके हैवी-वैट पहलवानो को उतारना फिजूल था।  सीताराम येचुरी जैसे लेफ्ट के और राहुल गांधी, मणिशंकर जैसे कांग्रेसी नेताओं का जेएनयू परिसर में आना सामान्य घटना है। लेकिन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के अप्रत्यक्ष हस्तक्षेप ने इस बड़ी राजनीतिक घटना में रूपान्तरित कर दिया। भाजपा को सोचना चाहिए  कि खुद के अलावा समूचे विपक्ष को राष्ट्रद्रोही कहने की तदबीरों की उम्र लंबी और विश्वसनीय नहीं हो सकती।

पांचवे, दिल्ली की पटियाला हायकोर्ट के आंगन में देश के प्रजातंत्र को कलंकित करने वाली काली घटनाओं पर सुप्रीम कोर्ट की नाराजी के बाद केन्द्र सरकार के रुख में यह बदलाव आया है। भाजपा के पास इस वकीलों के अराजक व्यवहार का जवाब नहीं था। दिल्ली पुलिस के कमिश्नर बीएस बस्सी ने कहा कि वो न्यायालय में जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार की जमानत का विरोध नहीं करेंगे। लेकिन इसके यह मायने नहीं है कि पुलिस देशद्रोह के मामले में कन्हैया कुमार को क्लीन चिट दे रही है। उन पर बाकायदा मुकदमा चलेगा और प्रशांत भूषण उनकी पैरवी करेंगे। पूरे घटनाक्रम में बस्सी सबसे ज्यादा राजनीतिक आरोपों का शिकार है।

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