सियासी स्वार्थों में सहमा तिरंगा !

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इन दिनों सबसे असमंजस में कोई है तो वह तिरंगा है। हमारा राष्ट्रध्वज। पहले तिरंगा राष्ट्रीय त्यौहारों और कुछ सरकारी इमारतों पर फहराया करता था। लोग उसे दूर से देख कर भी गर्वित होते थे। तिरंगे को भी अपनी ऊंची हैसियत का अहसास था। खास मौकों पर फहराकर वह भी खुश और संतुष्ट था। लेकिन हाल के ‘देशभक्ति’ और ‘अभिव्यक्ति की अाजादी’ के ज्वार में तिरंगे समझ नही पा रहा कि वह क्या करे। देशभक्त भी उसी के तले नारे लगा रहे हैं और ‘देशभक्तो’ की दबंगई का विरोधी भी तिरंगा ही लहरा रहे हैं। तकरीबन हर हाथ और हर कंधे पर फहराते तिरंगे के चलते पार्टियों और संगठनों के अपने झंडों की हैसियत तीसरे दर्जे की हो गई है। वो शायद समारोहों की झंडियों के लायक ही रह गए हैं।

आजादी के बाद देश में ऐसी  ‘तिरंगा लहर’ अण्णा हजारे के लोकपाल आंदोलन में दिखी। जब जत्थे के जत्थे तिरंगा हाथ में लिए ‘क्रांति’ करने निकले थे। लगने लगा कि अांदोलनकारियों के आक्रोश में भ्रष्टाचार उसी तरह बह जाएगा, जैसे बारिश का पानी। इस आंदोलन का ज्वार तो ठंडा हो गया, लेकिन तिरंगा हाथ में लेकर ‘इंकलाब’ लाने वालों का उत्साह कम नहीं हुआ। उसमें टोपी और जुड़ गई। इसके पहले हर पार्टी अपने झंडों और प्रतीकों को तवज्जो देती थी। झंडे से पता चल जाता था कि कौन सी पार्टी किस एंगल से पाॅलिटिक्स कर रही है और क्यों कर रही है। लेकिन इस तरह तिरंगा हाथ में लेकर चलने से राष्ट्रभक्ति का भ्रम तो कम अराजकता के दर्शन ज्यादा होने लगे। अब तो गजब ही हो रहा है। देशभक्ति का उग्र प्रदर्शन भी तिरंगा हाथ में लेकर हो रहा है तो ऐसे ‘देशभक्तों’ का ‍िवरोध भी उसी तिरंगे के साथ हो रहा है ।

तिरंगे की तारीफ में ‘झंडा गीत’ लिखने वाले श्यामलाल गुप्त पार्षद ने भी ‍इस स्थिति की कल्पना नहीं की होगी कि ‘झंडा ऊंचा रहे हमारा’ का अर्थ अलग-अलग संदर्भों में अलग-अलग होगा। अब तो ‍तिरंगे में निहित भावनाएं एक तरफ रह गई हैं, उसकी हाइट की देशभक्ति की ऊंचाई  का पैमाना बन गई है। झंडे की शान रहे न रहे, उसमें निहित भाव संरक्षित रहे न रहे पर उसकी ऊंचाई जरूर रहे। इसी के चलते मध्यप्रदेश में 235 फीट का तिरंगा लहराया गया तो फरीदाबाद में ढाई फीट का तिरंगा लगाकर हरियाणा ने अपनी ज्यादा ‘ऊंची’ देशभक्ति का परिचय‍ दिया। जेएनयू प्रकरण की हवा निकालने  केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी ने सभी केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में 207 फीट का झंडा फहराने  का ‘ऊंचा’ आदेश कुलपतियों को दिया। इसमें 207 फीट का क्या राज है, इसका खुलासा  आज तक नहीं हो सका है। अभी तक साधु-संत और बाबाअो के आगे 108 या 1008 वगैरह लिखा देखा था। लेकिन झंडे की ऊंचाई में ‘आॅड-ईवन’ का मेल पहली बार देखा। अगर इसके बाद भी देशभक्ति की हाइट कम लगी तो कोई राष्ट्रभक्त  यह सुझाव भी दे सकता है कि एवरेस्ट से ऊंचा  झंडा फहराया जाए ताकि चांद से भी उसे देखा जा  सके। यह बात अलग है कि तेनजिंग नोर्गे कई साल पहले एवरेस्ट की चोटी पर तिरंगा फहरा चुके हैं। लेकिन तब वह राष्ट्र गौरव का प्रतीक था, ‘देशभक्ति’ का नहीं था।

समझना मुश्किल है कि तिरंगे को ‘हर हाथ को काम’ की तर्ज पर इतना आम क्यों बनाया जा रहा है। तिरंगा हमारी सार्वभौमता का गौरवपूर्ण ऐलान है। उसकी एक पवित्रता है, एक गरिमा है, जो हमारे क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थों से कई गुना ज्यादा है। वह राष्ट्र की अखंड दृष्टि है। वह सर्वोच्च समर्पण और आत्माभिमान का गौरवगान है। उसे निहित स्वार्थों का प्रतीक बनाने की कोशिश क्यों हो रही है? कोई तो दे इसका जवाब ?

 

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