कुछ रंग ऐसे चीठे होते हैं, जो छुटाए नहीं छूटते…

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रोज कॉलम लिखना बहुत मुश्किल का काम है भाई! पहले तो विषय खोजो, फिर उसकी प्रासंगिकता पर विचार करो, फिर उसके लिए सामग्री जुटाओ… फिर तर्क हो, विश्‍लेषण हो, मीमांसा हो… कई तरह के खटराग करना पड़ते हैं, तब जाकर होता है कॉलम तैयार। कई बार कोई ठीक-ठाक विषय ही नहीं मिलता और कई बार विषय मिल जाता है तो उसका विस्‍तार नहीं हो पाता। क्‍योंकि समय पर उससे संबंधित तथ्‍यात्‍मक या प्रामाणिक जानकारी नहीं मिल पाती। और यदि ऐसे में कोई छुट्टी का दिन पड़ जाए तो मशक्‍कत दुगुनी हो जाती है।

सोमवार को रंगपंचमी के दिन ऐसा ही हुआ। काफी सोच विचार के बाद भी जब कोई ठीक ठाक विषय नहीं मिला, तो मैंने कुछ पुरानी चीजों को खंगालना शुरू किया। समाचार एजेंसी की पत्रकारिता के दिनों में हम लोग यह काम बहुत किया करते थे। ऐसे संकट के समय सरकारी रिपोर्टें और दस्‍तावेज बहुत काम आते हैं। उस जमाने में चूंकि इंटरनेट या सोशल मीडिया जैसी कोई चीज नहीं थी तो पत्रकारिता के पेशे से जुड़े लोग ऐसे मौकों पर खास खबरों के लिए ऐसी ही सामग्री के भरोसे रहते थे। पुराने जमाने को याद करते हुए मैंने भी वही नुस्‍खा आजमाया और एक ऐसी चीज हाथ लगी जिसमें मेरे लिए अपनी तरफ से कहने को कुछ ज्‍यादा नहीं है। बस आप उस बात को बांच लीजिए, आपकी प्रतिक्रिया खुद ब खुद जबान पर आ जाएगी। दरअसल विषय खोजते खोजते यूं ही नजर पिछले दिनों विधानसभा के पटल पर रखी गई शासकीय आश्‍वासनों संबंधी समिति की रिपोर्ट पर चली गई। यह समिति विधानसभा की ऐसी समिति है जो सदन में मंत्रियों द्वारा दिए जाने वाले आश्‍वासनों पर की गई कार्रवाई का लेखाजोखा रखती है। सदन में ऐसे अनेक अवसर आते हैं, जब सदस्‍य कोई मुद्दा या सवाल उठाते हैं और मंत्रीगण उस पर चर्चा या जवाब के दौरान भरोसा देते हैं कि जो बात उठाई गई है, उस पर कार्रवाई की जाएगी। चूंकि सदन में दिया जाने वाला यह आश्‍वासन नियमों से बंधा होता है इसलिए उसका पूरा ब्‍योरा रखा जाता है और सदन को बताया जाता है कि फंला मामले में, फलां समय, अमुक मंत्री ने जो आश्‍वासन दिया था उसका हश्र क्‍या हुआ। इस निगरानी के काम को सदन की शासकीय आश्‍वासनों संबंधी समिति ही अंजाम देती है।

इस समिति ने इसी महीने 18 मार्च को अपना सोलहवां प्रतिवेदन सदन के पटल पर रखा। इसमें विधानसभा के वर्ष 2004 में जून-जुलाई में आयोजित सत्र में दिए गए आश्‍वासनों की नतीजों का ब्‍योरा है। (चौंकने की जरूरत नहीं है, संसद या विधानसभाओं में पुराने मामलों को लेकर बरसों बाद तक ऐसी रिपोर्टें आती रहती हैं।) यहां मूल मामला रिपोर्ट का नहीं बल्कि समिति के निष्‍कर्षों का है।

समिति ने मंत्रियों द्वारा सदन में दिए गए आश्‍वासन पूरे नहीं होने पर एक तरह से खेद जताते हुए कहा है कि- आश्‍वासन पूरा करने के लिए मुख्‍य सचिव, मध्‍यप्रदेश शासन और संसदीय कार्य विभाग के सर्कुलर का भी कई विभागों ने पालन नहीं किया है और अनेक मामलों में 14 साल बाद भी आश्‍वासन पूरे नहीं हो सके हैं। नियमानुसार सबंधित विभागों को ऐसे आश्‍वासनों के बारे में एक रजिस्‍टर बनाना चाहिए, लेकिन न तो ऐसे रजिस्‍टर बनाए गए हैं और न ही वे मंत्रियों के सामने रखे जा रहे हैं।

श्री राजेंद्र पांडेय की अध्‍यक्षता वाली समिति ने अपने निष्‍कर्ष में जो बात कही है वो पूरी सरकारी व्‍यवस्‍था के कामकाज के तरीकों की पोल खोलने वाली है। समिति कहती है- ‘’ तीन मामलों में लोक स्‍वास्‍थ्‍य एवं परिवार कल्‍याण विभाग तथा एक मामले में राजस्‍व विभाग द्वारा प्रारंभिक जानकारी तक उपलब्‍ध नहीं कराई गई। समिति यह जानकर आश्‍चर्यचकित है कि लगभग ये सभी मामले पद के दुरुपयोग/ शासकीय नियमों के उल्‍लंघन/ आर्थिक अनियमितताओं तथा भ्रष्‍टाचार से संबंधित हैं। जिन पर समय रहते विभागों को कार्रवाई करना थी। मामलों पर विभागीय उदासीनता को देखते हुए यह स्‍पष्‍ट है कि दोषियों को बचाने की दृष्टि से ही यह सोची समझी उदासीनता बरती गई है। फलस्‍वरूप कतिपय दोषी अधिकारी/कर्मचारी सेवानिवृत्‍त हो चुके हैं और कुछ की मृत्‍यु भी हो चुकी है। मामलों में समय निकालकर दोषियों को बचाने का यह उपक्रम निश्चित ही निंदनीय है और ऐसी दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की अपेक्षा भी है।‘’

समिति ने आगे कहा है- ‘’इससे सामान्‍य रूप से यह संदेश जाता है कि व्‍यवस्‍था को सुविधानुसार अपने अनुकूल किया जा सकता है, इस वजह से विभागीय अधिकारियों/कर्मचारियों में दोषियों को बचाने की आपराधिक प्रवृत्ति में निरंतर वृद्धि होती रहती है।‘’

मुझे लगता है कि समिति ने जिन शब्‍दों और भावों में अपनी बात कही है वह सरकारी व्‍यवस्‍था के तमाम समझदारों की आंखें खोलने के लिए पर्याप्‍त है। इससे आगे कहने को कुछ बचता नहीं है। सो आप सभी को होली और रंगपंचमी की शुभकामनाएं। दोनों त्‍योहार बीत चुके हैं, अब आप अपने रंग छुटाने में लगें। यह बात अलग है कि व्‍यक्ति हो या सरकार कुछ रंग इतने गाढ़े होते हैं कि छुटाए नहीं छूटते।

 

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