‘केजरी इन, मोदी आउट’ का मतलब

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क्या कोई सर्वे, पत्रिका, अखबार, वेबसाइट या चैनल किसी व्यक्ति की असली ताकत, प्रतिभा, योगदान और रूतबे का सही आकलन कर सकता है? क्या ऐसे जीवित और सक्रिय व्यक्ति का वस्तुनिष्ठ आकलन संभव है? ये सवाल इसलिए कि इस बार ‘फाॅर्च्यून’ पत्रिका ने  ‘ 50 ग्रेटेस्ट लीडर्स आॅफ द वर्ल्ड’ यानी दु‍निया के 50 महान नेताओं की लिस्ट जारी कर दी है। इस सूची में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का नाम नहीं है, जबकि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को इस सूची में स्थान मिला है। मोदी पिछले साल इस लिस्ट में पांचवे स्थान पर थे। न जाने एक साल में ऐसा क्या हुआ कि मोदी लिस्ट से बाहर  और केजरीवाल अंदर हो गए। ‘फार्च्यून’ अमेरिका की पुरानी अौर त्रिसाप्ताहिक पत्रिका है। इसकी प्रसार संख्‍या 8 लाख से ज्यादा है। इसमें छपने वाले आलेख गंभीर, गहरे और विदत्तापूर्ण होते हैं। ‘फार्च्यून’ की स्थापना 1929 में हेनरी ल्यूस ने की। पत्रिका  की सबसे ज्यादा चर्चा इसकी विशिष्ट व्यक्तियों की सूची और रैंकिंग से होती है। यह अक्सर ‘फार्च्यून 500’, ‘फाॅर्च्यून 1000’ आदि सूचियां निकालती है, जिसमें दुनियाभर की हस्तियों को कुछ मानकों के आधार पर क्रम दिया जाता है।  इसी तर्ज पर अमेरिका की एक और नामी पत्रिका ‘फोर्ब्स’ भी लिस्ट जारी  करती है। फोर्ब्स’ मुख्‍य रूप से व्यवसाय जगत की पत्रिका है और इसे 1917 में बीसी फोर्ब्स ने शुरू किया  था। इसका प्रसार भी 9 लाख से अधिक है। यह द्विसाप्ताहिक  है। यह भी अपने बेबाक विचारों के लिए जानी जाती है। उदाहरण के लिए इस प‍त्रिका के पिछले अंक में प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी की स्टार्ट अप इंडिया की खासी खबर ली गई थी। कहा गया था कि यह योजना ‘आधा गिलास खाली’ जैसी है। ‘फोर्ब्स’ भी ‘विश्व के अरबपति’ जैसी सूचियां जारी करती है। इसी तर्ज पर भारत में भी कुछ पत्रिकाएं सूचियां जारी करती हैं, लेकिन उनमें शामिल नामों पर कई बार संदेह बना रहता है। कुछ लोग इस सूची में आने को लेकर ‘जोड़तोड़’ भी करते हैं।

कहना भी मुश्किल है ‍िक इन स्थापित अमेरिकी पत्रिकाअों की सूचियों में शामिल नाम कितनी निष्पक्षता और वस्तुनिष्ठता से शामिल किए जाते हैं। लेकिन उनसे एक वातावरण जरूर बनता है। जिससे सम्बनिधत व्यक्तियों और खुद पत्रिका को भी लाभ होता है। इससे विश्व के बदलते राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक  और सैन्य परिदृश्य को समझने मे मदद मिलती है।

असली सवाल इन सूचियों की प्रामाणिकता का है। पहला तो यह है कि ऐसी सूचियां बनाने का अधिकार मीडिया को किसने दिया? दूसरा, ऐसी सूचियां जारी करने का असली मकसद और फायदा क्या है? क्या ऐसी सूचियां हर साल बदलते वैश्विक परिदृश्य में होने वाले बदलाव को पूरी तरह प्रतिबिम्बित  करती हैं या  फिर उनका अपना एजेंडा होता है? या फिर यह केवल एक पूंजीवादी  शगल है। जिसका असली उद्देश्य किसी न‍ किसी रूप मे बाजार को बढ़ावा देना है, जो खुद सम्बनिधत एजेंसी से लेकर उन व्यक्तियों को अपना प्रभाव क्षेत्र बढ़ाने अथवा उसे पोसने में मदद करती है। क्योंकि ‘फार्च्यन’ की सूची से मोदी का नाम गायब होने और केजरीवाल का आने को लेकर माहौल कुछ यूं बनाने की कोशिश हो रही है, जैसे कोई जंग जीता और कोई हार गया हो। हर बात में सनसनी खोजना आज मीडिया  का चरित्र बनता जा रहा है। इसीलिए होली के मौके पर प्रधानमंत्री विपक्षी नेताअोंको फालो करते हैं तो इसे भी उनके ‘बैक फुट’ पर जाने की तरह पेश करने की कोशिश होती है। इतिहास रचने और उसे बदलने वाले लोग सूचियो के मोहताज नहीं होते। वे जो कुछ करते हैं, जिस विजन और प्रतिबद्धता के साथ करते हैं, वही तारीख में उनकी जगह तय करता है। ऐसे लोगों की सूचियां सालाना ब्रांड की तरह नहीं बनतीं।

 

 

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