क्या हमारा देश धनवानों के रहने लायक नहीं है?

प्रश्न 1: बिहार सरकार ने शराबबंदी की ओर पहला क़दम बढ़ाते हुए देशी दारू पर प्रतिबंध लगा दिया है। वहां विधायकों ने शपथ ली है कि वे मदिरा को हाथ भी नहीं लगाएँगे और दूसरों को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित करेंगे। शराब न पीने की क़समों के टूटने का प्रतिशत मालूम करने के साथ जिन प्रान्तों में पूर्ण नशाबंदी है क्या वहां लोग मय को छूते भी नहीं हैं, इसकी जानकारी लेकर बिहार में शुरू की गई मुहिम की सफलता या असफलता का अनुमान लगाएँ।

प्रश्न 2: एक ओर जहाँ नीतीश कुमार ने बिहार को शराब से मुक्ति दिलाने की ठान ली है वहीं मध्यप्रदेश की राजधानी के पंचशील नगर के रहवासियों को मदिरा की दुकान हटवाने के लिए मानव अधिकार आयोग की शरण लेनी पड़ रही है। क्या यह उम्मीद की जाए कि महिलाओं और युवकों के कल्याण के लिए सतर्क और तत्पर रहने वाले मुख्यमंत्री तत्काल आबकारी नीति पर समग्रता से विचार करते हुए कुछ न कुछ अच्छी कार्यवाही अवश्य करेंगे? या मामला सरकारी लिखा पढ़ी की भूलभुलैया में भटकता रहेगा? संक्षेप में बताएँ।

प्रश्न 3: मोदीजी ने संयुक्त राष्ट्र में आतंकवाद को स्पष्ट रूप से परिभाषित करने की आवश्यकता पर ज़ोर देते हुए इसे धर्म से न जोड़ने की बात कही है। अमेरिका से प्रभावित यूएन में अभी भी आतंकवाद की स्पष्ट व्याख्या न होना आश्चर्यजनक है या नहीं? भारतीय योग जैसे कई मुद्दों को हमारे प्रधानमंत्री ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृति दिलवाई है। क्या पूरी दुनिया में दहशतगर्दी के ख़िलाफ़ प्रभावी लड़ाई लड़ने के लिए एकजुट होकर दृढ़ता के साथ खड़े होने के प्रेरणास्त्रोत भी मोदीजी बनेंगे? पचास शब्दों में बताएँ।

प्रश्न 4: चुनावी मौसम है। जुमलेबाजी ख़ूब फलफूल रही है। राहुल गांधी कह रहे हैं कि भाजपा सत्ता में आई तो असम की सरकार नागपुर से चलेगी। (क्या सभी भाजपा सरकारें नागपुर से चल रही हैं?) स्मृति ईरानी बता रही हैं कि कांग्रेस देश को विभाजित करने के रास्ते पर चल रही है।(अभी तक कांग्रेस ने देश के कितने विभाजन किए?) मोदीजी कहते हैं कि वे असम में ग़रीबी के ख़िलाफ़ हैं, गोगोई के नहीं। (सिर्फ़ विरोध करेंगे या ग़रीबी हटाएँगे भी?) वोट देने के लिए मानस बनाते समय मतदाता यह कैसे पता लगाए कि नेताओं के भाषण में कौन सी बात चुनावी जुमला है और कौन सा यक़ीन करने योग्य? समझने में मदद करें।

प्रश्न 5: न्यू वर्ल्ड वेल्थ की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2015 में चार हज़ार अरबपति भारत छोड़कर विदेश में रहने चले गए। फ़्रांस से दस, चीन से नौ और इटली से छ: हज़ार ने अपना देश छोड़ा। फ़्रांस में पलायन का कारण धार्मिक तनाव माना जा रहा है। यह जानकारी भी रोचक है कि ऑस्ट्रेलिया में आठ, अमेरिका में सात और कनाडा में पांच हज़ार बाहरी लोग रहने पहुँचे हैं। क्या इन मुल्कों का जीवन बेहतर है? लोग अपना वतन क्यों त्यागते हैं? क्या हमारा देश धनवानों के रहने लायक नहीं? इन आँकड़ो में छिपी सच्चाई उजागर करें।

 

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