नकल रोकने की अमानवीय अकल

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परीक्षा में नकल करना अपराध है, लेकिन इसे रोकने परीक्षार्थियों के कपड़े ही उतरवा लिए जाएं, यह तो अमानवीय है। बिहार के मुजफ्फरपुर में सेना भर्ती परीक्षा में जो नजारा सामने आया, उसने समाज की सोच पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। सवाल तो यह भी है कि अगर रंगरूटों की भर्ती में परीक्षार्थियों को केवल अधोवस्त्र पहन कर बैठना पड़ा तो अफसरों की भर्ती में परीक्षा अायोजक किस सीमा तक जा सकते हैं, यह कल्पना की जा सकती है। पटना हाई कोर्ट ने इसे गंभीरता से लेते हुए इसका संज्ञान लिया है तो रक्षा  मंत्री ने भी इस मामले में सेना से रिपोर्ट मांगी है।

सेना में भर्ती के लिए सभी राज्यों के निश्चित केन्द्रों पर परीक्षा होती है। इसमें शामिल होने दूर-दूर से परीक्षार्थी आते हैं। इस परीक्षा को पास करने का मतलब सेना में नौकरी पाना है। जिसे काफी प्रतिष्ठित और बेहतर तनख्‍वाह व सुविधा वाला काम समझा जाता है। मुजफ्फरपुर सेना भर्ती रैली में भी लगभग डेढ़ हजार परीक्षार्थी शामिल हुए थे। चूंकि बिहार नकल की भी राजधानी है, इसलिए सेना के कुछ उत्साही अफसरों ने लिखित परीक्षा के पहले परीक्षार्थियों के अंडरवियर छोड़ सारे वस्त्र उतरवा‍ लिए। ताकि नकल न हो। जब इस परीक्षा की तस्वीर अखबारों में छपी तो लगा कि ये लोग सेना भर्ती के लिए परीक्षा दे रहे हैं या फिर कहीं पहलवानों की भर्ती हो रही है। पटना हाईकोर्ट ने इसका स्वत:संज्ञान लेते हुए परीक्षा के इस तरीके को ‘अमानवीय’ माना। यूं शारीरिक स्वास्थ्य परीक्षण के दौरान अधोवस्त्र छोड़कर बाकी उतारना पड़ते हैं। लेकिन यहां तो लिखित परीक्षा भी लगभग निर्वस्त्र अवस्था में ली जा रही थी।

परीक्षाअों में नकल इस देश की लाइलाज बीमारी है। देश का कोई राज्य इससे अछूता नहीं है। लेकिन बिहार, उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश का उत्तरी अंचल इसके लिए सबसे ज्यादा बदनाम है। पिछले साल बिहार में बोर्ड परीक्षा की वह तस्वीर पूरी दुनिया में चर्चित हुई, जिसमें परीक्षार्थियों को उनके सहयोगी खिड़कियों पर चढ़कर नकल की पर्चियां बेखौफ पहुंचा रहे थे। नकल करना और कराना एक संगठित उद्दयोग है। वे सब इसका फायदा उठाना चाहते हैं, जो बिना किसी मेहनत के बेहतर श्रेणी में पास होने का प्रमाणपत्र हासिल करना चाहते हैं। किसी ने इसे बिहार के ‘एग्जाम टूरिज्म’ का नाम दिया है। नकल करना वहां अपराध के बजाए ‘मौलिक अधिकार’ समझा  जाता है। इसमें पैसा भी खूब चलता है। लेकिन दूसरे राज्यों में भी स्थिति बहुत अच्छी है, ऐसा मान लेना गलत होगा। मप्र के भिंड मुरैना अौर विंध्य बेल्ट में पुलिस के लिए डाकू पकड़ना आसान है, लेकिन नकलचियों को पकड़ना दुष्कर है। महाराष्ट्र की बोर्ड परीक्षा में नकल रोकने  पिछले साल से जीपीएस सिस्टम का उपयोग ‍िकया जा रहा है। कई स्थानों पर प्रशासन और पुलिस नकल के खिलाफ व्यापक अभियान चलाते हैं। कई लोग पकड़े भी जाते हैं। लेकिन ‘नकल का कारोबार’ बदस्तूर  चलता रहता है। अब तो यह उच्चस्तरीय शिक्षा संस्थानों तक पहुंच गया है। सरकार ने कई कानून भी बनाए, लेकिन कुछ खास फर्क नहीं पड़ा।

नकल रोकने के लिए कई तरह से सख्ती भी लागू की गई। लेकिन नकलची पात-पात निकले। नकल करना कानूनी अपराध  के साथ अनैतिकता से भी जुड़ा है। नकलची खुद के साथ पूरे समाज को भी कमजोर करता है। नकल रोकी जाए, इसमें दो राय नहीं, लेकिन जिस तरह सेना ने किया, वह भी सही नहीं है। किसी भी अपराध पर अंकुश सामाजिकता और मानवीयता  के दायरे में लगाया जा सकता है। अमानवीय होकर नहीं। नकल करने वालों को आप फेल कर दीजिए, लेकिन कपड़े उतरवाने से तो मनुष्यता ही निर्वस्त्र होगी। ऐसा कृत्य सेना के आदर्शों के अनुरूप भी नहीं है।

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