बजट का ज्यादा लोड नहीं लेना चाहिए

आज भी बजट की ही बात को थोड़ा आगे बढ़ाने और उसके कई दूसरे पहलुओं पर बात करने का मन है। वैसे तो मैं पहले ही कह चुका हूं कि बजट कुल मिलाकर बहुत उबाऊ विषय है और इसमें तभी तक रुचि रहती है जब अपने नफे नुकसान की कोई बात होने वाली हो। अब जबकि अरुण जेटली के नए बजट से आने वाले एक साल में नफे नुकसान की सारी पोटलियां खुल चुकी हैं, इसलिए सिवाय झींकने के बजट में कुछ बचा नहीं है। लेकिन क्‍या करें, हम पत्रकारों के लिए यह विषय ही ऐसा है, जो हमें कुछ दिन इसके हैंगओवर में बनाए रखता है।
बजट की बारीकियों या पेचीदगियों पर भले ही कुछ मालूम-तालूम न हो लेकिन हम विश्‍लेषण जरूर करते हैं। सो, चारों तरफ इस विश्‍लेषण का दौर कुछ दिन चलेगा। यह विश्‍लेषण भी गजब तरीके से होता है। कई बार यह ‘अंधों का हाथी’ वाली कहानी की तरह दिखाई देता है। मसलन जो विश्‍लेषक जिस क्षेत्र में काम करता है, उसे बजट का वही सिरा नजर आता है। जैसे खेती वाला कहेगा- ‘’भई इसमें तो कुछ नहीं मिला। सरकार ने निराश किया।‘’ कॉरपोरेट कहेगा- ‘’नो रिलीफ, इट्स नॉट ए इंडस्‍ट्री फ्रेंडली बड्जट’’, सामाजिक क्षेत्र में काम करने वाले पक्‍के तौर पर इस बात को लेकर हाय तौबा मचाते मिलेंगे कि सरकार का महिलाओं और बच्‍चों की तरफ तो ध्‍यान ही नहीं है। मिडिल क्‍लास या वेतनभोगी लोगों का जन्‍मजात रोना रहता है- ‘’इनकम टैक्‍स में कोई रिलीफ नहीं मिला। और कितना लूटेगी ये सरकार।‘’ कई बार तो लगता है कि पूछ लें- ‘’तो भैया क्‍या करें, सारा बजट तुमको ही दे दें?’’
पिछले कुछ सालों से जब से टीवी आया है, कुछ लोग कैमरा और माइक लेकर लोगों के घरों में, किचन में घुस जाते हैं। वहां किचन में सजी धजी खड़ी महिला से वही पिटा पिटाया सवाल- ‘’आपको क्‍या लगता है, कैसा रहा बजट?’’ और बजट से ज्‍यादा इस फिक्र में डूबी, कि थोड़ी देर बाद मैं टीवी के परदे पर कैसी दिखूंगी, वो महिला वही रटा रटाया जवाब देती है- ‘’भोत मेंगाई है भैया, घर चलाना मुस्किल है। क्‍या करें हम तो बच्‍चों को दो टेम दूध भी नहीं दे पाते। सब कुछ तो मेंगा कर दिया इस सरकार ने, दाल हो चाए सब्‍जी हो, क्‍या करें क्‍या खाएं… कुछ समझ में ई नईं आता।‘’ इधर बाइट लेने का टंटा खत्‍म करके रिपोर्टर अगले किचन की तरफ चल देता है, उधर देश की वित्‍तीय स्थिति पर ‘गंभीर’ वक्‍तव्‍य देने वाली मोहतरमा बिजी हो जाती हैं तमाम नाते रिश्‍तेदारों को फोन लगाने में- ‘’थोड़ी देर में देखना, हम टीवी पे आने वाले हें…’’
जैसे बजट एक सालाना कर्मकांड है, वैसे ही हर साल बजट की पुण्‍य तिथि ऐसे ही छातीकूट के साथ मनाई जाती है। बजट के कारण जीना और सांस लेना भी मुश्किल बताया जाता है, लेकिन इतने सालों में मैंने तो कभी यह खबर न सुनी, न पढ़ी कि फलां आदमी खराब बजट पढ़ने से मर गया। न ही मैंने कभी यह देखा कि किसी बजट के बारे में यह आमराय रही हो कि- ‘’वाह! क्‍या बजट है!’’ वित्‍त मंत्री का काम बजट प्रस्‍तुत करना है और विश्‍लेषकों का काम उसके छिलके उतारना। वित्‍त मंत्री अपना काम करता है और विश्‍लेषक अपना। शायद दोनों ही नहीं जानते कि देश की ‘’असीम धैर्यवान’’ जनता हर हाल में जीना सीख चुकी है।
अच्‍छा, और मजे की बात ये कि कई भाई लोग तो बिना पढ़े या सुने प्रतिक्रिया देने बैठ जाते हैं। अभी बजट आया नहीं और पहले ही शुरू हो जाएंगे- ‘’लगता नहीं कि इस बार कोई राहत मिलेगी।‘’ बजट भाषण अभी चल ही रहा है, पर प्रतिक्रिया हाजिर है- ‘’मैंने पहले ही कहा था, इस बार का बजट त्रिशंकु होगा।‘’ पिछले साल का जो बजट सरकार को खुद अगले साल तक समझ में नहीं आता, उसके बारे में भाई लोग तड़ातड़ प्रतिक्रिया देने लगते हैं।
बजट के दिन अखबार के दफ्तर में भी बड़ी चहल पहल का माहौल होता है। आम दिनों के बनिस्‍बत फोन कुछ ज्‍यादा ही आते-जाते हैं। इनमें भी ज्‍यादातर फोन ऐसी फरमाइश के होते हैं- ‘’यार बजट पर प्रतिक्रिया भेजी है, जरा देख लेना’’ आप हां, हूं करके फोन जल्‍दी निपटाना चाहते हैं और उधर बंदा प्रेसनोट भेजने के बावजूद, अपनी पूरी प्रतिक्रिया फोन पर सुनाकर ही दम लेता है। फिर सवाल भी पूछता है- ‘’ठीक लिखा है ना.. बाकी जरा कुछ हो तो तुम देख लेना।‘’ आप पल पल भारी होते उस माहौल में बात खत्‍म करना चाहते हैं और अगला उसे च्‍यूइंग गम की तरह चबाता जा रहा है, आप खुद को किसी तरह जब्‍त करते हुए कहते हैं- ‘’ठीक है मैं देख लूंगा।‘’ लेकिन अगला सवाल आपका दिमाग झन्‍ना देता है, सामने वाला बड़ी मासूमियत से पूछता है- ‘’फोटू भी भेज दूं क्‍या?’’
कई बार लगता है वित्‍त मंत्री को ऐसे भड़ासियों के लिए कोई अखिल भारतीय प्रतियोगिता रखनी चाहिए। ‘आप बनाएं भारत का बजट।‘’ मेरा दावा है कि ऐसे जितने भी ‘वक्‍तव्‍य वीर’ हैं, वे बजट का ‘ब’ भी नहीं लिख पाएंगे। कुल बजट का आंकड़ा दे दो तो वे बजरबट्टू बता भी नहीं पाएंगे कि 19 लाख करोड़ में कितनी शून्‍य लगेंगी। लेकिन प्रतिक्रिया जरूर देंगे… क्‍योंकि वहां करना क्‍या है, दिमाग को शून्‍य ही तो रखना है।
नैतिक शिक्षा- बजट का ज्‍यादा लोड नहीं लेना चाहिए।

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