राहुल राजनीतिक ‘ड्रेसिंग-रूम’ के कोड समझें

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राहुल गांधी का मन इस खुशफहमी में फुदक रहा है कि उनके दवाब में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार को कर्मचारी भविष्य निधि याने ईपीएफ टैक्स को वापस लेने के लिए विवश होना पड़ा। वो खुश हो सकते हैं, क्योंकि कांग्रेस के भीतर या बाहर, उन्हें कोई यह बताने वाला नहीं है कि राजनीति में सरकारों के फैसलों में तब्दीली और संशोधन के कारक एक नहीं, अनेक होते हैं। गत 3 मार्च को राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान वित्त मंत्री अरुण जेटली ने सदन के सामने परेशानी प्रकट करते हुए कहा था- ”वो जितना राहुल गांधी को सुनते हैं, उतना ही हैरान होते हैं….।” जेटली की इस मासूस सी टिप्पणी की राजनीतिक-गुदगुदी को सदन में हर सदस्य ने महसूस किया था, लेकिन राहुल हर वक्त, कुछ दिनों के अंतराल से विरोधियों को उनकी परिपक्वता पर सवाल उठाने का मौका देते रहते हैं। ईपीएफ मामले में भी उनकी विजयी भंगिमाओं में कच्चापन झलकता है। दिक्कत यह है कि वो ऐसे दल के मालिक हैं, जहां उनके मुगालतों को हवा देने वाले लोग ज्यादा हैं, सूरज की गरमी और चांद की नरमी को भी उनके हिसाब से नापा-परखा जाता है।

अभिभाषण पर इसी चर्चा के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कटाक्ष किया था कि कांग्रेस में कमतरी का भाव भी संसद की कार्रवाई में सबसे बड़ी बाधा है। उनका इशारा था कि राहुल की योग्यता से बड़े लोगों के लिए कांग्रेस में गुंजाइश नहीं हैं।  मोदी के कथन की पुष्टि में जेएसयू छात्रसंघ के नेता कन्हैया कुमार के प्रभावी भाषण से जुड़ा कांग्रेस-कार्यालय एक सच्चा प्रसंग सामने है। भाषण 24 अकबर रोड स्थित अखिल भारतीय कांग्रेस के दफ्तर में भी सुना गया। भाषण के बाद कतिपय वरिष्ठ नेताओं की यह उत्कंठा गौरतलब है कि अपनी कांग्रेस में कन्हैया जैसा भाषण करने वाले व्यक्ति के सर्वाइवल और आगे बढ़ने की संभावनाएं कितनी हैं? सवाल कांग्रेस की कुंठाओं और बौनेपन को उद्घाटित करने के लिए पर्याप्त है।

ये कुंठाएं फलीभूत होती हैं, जब राहुल सार्वजनिक जीवन में राजनीतिक-गत्यवरोधों के समाधानों की चर्चाओं में निजता, अनौपचारिकता और विश्वसनीयता के नाजुक पहलुओं के स्केल को पहचानने मे अधपके नजर आते हैं। वो यह समझने में भी कच्चे हैं कि कूट-वार्ताओं में कौन से क्षणों का खुलासा करना है और कौन सी बात को पी जाना है? राहुल ने जेटली और उनके बीच एक निजी संवाद को अपने भाषण का विषय बना लिया। राहुल ने काफी हल्के अंदाज में कहा – ”जेटलीजी,  मेरे पास आए और कहने लगे कि मनरेगा से अच्छी कोई दूसरी योजना आज तक नही बनी। मैंने उनसे कहा कि यह बात आप मुझसे क्यों कह रहे हो, अपने बॉस को क्यों नहीं समझाते….?” निश्चित ही राहुल और जेटली के बीच इस संवाद के आगे-पीछे बड़ा घटनाक्रम है, लेकिन टीवी एंकरो की तरह बगैर संदर्भों के वार्ता के किसी एक संवाद को मजाकिया लहजे में उजागर करना अपने आपको को ही अविश्वसनीय, खोखला, हल्का बनाना है। निजी वार्ताओं में दलों के राजनेता हकीकत से रूबरू सच्चाइयों पर खुल कर संवाद करते हैं, ठहाके लगाते हैं, लेकिन सार्वजनिक मंचों पर उनको बयां नहीं करते हैं। निजी वार्ताओं के मामले में राहुल काफी अगंभीर और अविश्वसनीय लगने लगे हैं। उनके साथ यह पहली घटना नहीं है। ललित मोदी प्रसंग पर संसद भवन की लॉबी में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के साथ एक अत्यंत निजी और मार्मिक संवाद की अहंकारी-प्रस्तुति आज भी लोग नहीं भूले होंगे। राहुल ने अहंकार-मिश्रित अंदाज में बताया था कि- ”आज सुषमाजी ने लॉबी में मेरा हाथ पकड़ कर कहा कि बेटा, तुम मुझसे नाराज क्यों हो? मैने उनसे कहा- ”मैं आपसे नहीं, भ्रष्टाचार के मुद्दे से नाराज हूं।” राहुल के लंबे भाषण में इस निजी खुलासे को ज्यादातर सदस्यों ने काफी असहज होकर सुना था।  राहुल को समझना होगा कि क्रिकेट के ड्रेसिंग-रूम की तरह राजनीति के ड्रेसिंग रूम में होने वाली घटनाओं का एक सुनिश्चित प्रोटोकोल और गोपनीयता होती है। परिपक्व खिलाड़ी इस प्रोटोकोल को कभी भी नजरअंदाज नहीं करते हैं।      निजी उल्लेख न केवल राजनीतिक लकीरों को छोटा बनाते हैं बल्कि, उथलेपन की जमीन पर खड़ा करते हैं। निजी जीवन में शिष्ट, सहज, सरल और खूबसूरत व्यक्तित्व के धनी राहुल  राजनीतिक-शिष्टाचर को आत्मसात करके धीर-गंभीर बनें, यह कांग्रेस की महती आवश्यकता है।

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