सवा सौ साल बाद भी वाक्य तो वही के वही हैं

जिस समय मैं यह कॉलम लिख रहा हूं, उस समय पूरी दुनिया में अंतर्राष्‍ट्रीय महिला दिवस मनाया जा रहा है। महिला अधिकार, समानता, समता जैसे तमाम मुद्दों पर अलग-अलग एंगल से विमर्श हो रहा है। दुनिया की बात न करें और अपने देश तक ही सीमित रहें, तो हमारे देश में पिछले लंबे समय से अलग अलग मुद्दों को लेकर सिर्फ और सिर्फ बहस ही चल रही है। ऐसा लगता है कि हमारा पूरा समाज ही किसी वृहद वाद-विवाद प्रतियोगिता में हिस्‍सा ले रहा है। इस प्रतियोगिता की खासियत यह है कि इसका निर्णायक कोई नहीं है। चूंकि निर्णायक या जज नहीं है, इसलिए चारों तरफ से अपने-अपने पक्ष में तर्क-कुतर्क के पत्‍थर उछाले जा रहे हैं।
महिला दिवस जैसे मौकों पर चर्चा या बहस का सबसे प्रिय विषय ‘महिला सशक्तिकरण’ होता है। पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद के केंद्रीय कक्ष में महिला जन प्रतिनिधियों के राष्‍ट्रीय सम्‍मेलन के समापन सत्र को संबोधित करते हुए ‘महिला सशक्तिकरण’ पर कहा कि ‘’हमें इस मनोवैज्ञानिक अवस्‍था को बदलने की जरूरत है। सशक्तिकरण तो उनका होता है, जिनका सशक्तिकरण नहीं है, लेकिन जो सशक्त हैं, उनका सशक्तिकरण कौन करेगा? पुरुष होते कौन हैं जो महिलाओं को सशक्त करेंगे? आवश्यकता इस बात की है कि महिलाएं खुद को, अपनी ताकत को पहचानें।‘’
प्रधानमंत्री की बात सुनकर स्‍वामी विवेकानंद की याद आ गई। स्‍वामी विवेकानंद के संचार पर किताब लिखते समय मुझे उन्‍हें अलग अलग आयामों से पढ़ने और समझने का अवसर मिला था। इसीलिए जब नरेंद्र मोदी ने संसद में कहा कि पुरुष कौन होते हैं जो महिलाओं को सशक्‍त करेंगे तो मुझे याद आया कि यह तो ठीक वही बात है जो स्‍वामी विवेकानंद ने करीब सवा सौ साल पहले कही थी। यानी महिलाओं के प्रति विमर्श का दायरा आज भी वही है जो स्‍वामी विवेकानंद के समय था। फर्क यदि कुछ है तो सिर्फ इतना कि स्‍वामीजी जब वह बात कर रहे तब देश अंग्रेजों का गुलाम था और नरेंद्र मोदी जब यह बात कह रहे हैं तो देश को आजाद हुए 68 साल हो चुके हैं।

मोदीजी का भाषण तो मीडिया में हाल ही में रिपोर्ट हुआ है इसलिए वह ताजा ताजा आपकी स्‍मृति में होगा, लेकिन आपके संदर्भ के लिए मैं वो बातें बताना चाहूंगा जो स्‍वामी विवेकानंद ने कहीं थीं। मैं जानता हूं कि आजकल हमारे पुराने मनीषियों का संदर्भ देना ‘अपराध’ जैसा हो गया है, लेकिन यदि अपने पूर्वग्रहों को थोड़ी देर के लिए हम अलग रखकर विवेकानंद के कथनों पर सोचें तो शायद अपने भीतर यह तो जरूर महसूस करेंगे कि भौतिक रूप से या बाह्य परिदृश्‍य में स्थितियां भले ही बदली हुई दिखती हों लेकिन आंतरिक रूप से बहुत कुछ वहीं का वहीं ठहरा हुआ है।

स्‍वामीजी ने कहा था- ‘’हमें नारियों को ऐसी स्थिति में पहुँचा देना चाहिए जहाँ वे अपनी समस्या को अपने ढंग से स्वयं सुलझा सकें। उनके लिए यह काम न कोई कर सकता है और न किसी को करना चाहिए। हमारी भारतीय नारियाँ संसार की अन्य किन्हीं भी नारियों की भाँति इसे करने की क्षमता रखती हैं।‘’

”इस देश में पुरुष और स्त्रियों में इतना अंतर क्यों समझा जाता है, यह समझना कठिन है। वेदांत शास्त्र में तो कहा गया है, एक ही चित् सत्ता सर्वभूत में विद्यमान है। तुम लोग स्त्रियों की निंदा ही करते हो। उनकी उन्नति के लिए तुमने क्या किया, बोलो? स्मृति आदि लिखकर, नियम-नीति में आबद्ध करके इस देश के पुरुषों ने स्त्रियों को एकदम बच्चा पैदा करने की मशीन बना डाला है।‘’
स्त्री सुधार में लगे लोगों को आगाह करते हुए स्वामीजी कहते हैं- ”पहले अपनी स्त्रियों को शिक्षित करने की व्यवस्था करो और उन्हें स्वयं की चिंता करने दो। तत्पश्चात वे स्वयं ही तुम्हें बता देंगी कि उन्हें किन समाज सुधारों की आवश्यकता है। उनके मामले में हस्तक्षेप करने वाले तुम कौन होते हो?’’
‘’…स्त्री जाति के प्रश्न को हल करने के लिए आगे बढ़ने वाले तुम कौन हो? क्या तुम हर एक विधवा और हर एक स्त्री के भाग्यविधाता भगवान हो? दूर रहो! अपनी समस्याओं का समाधान वे स्वयं कर लेंगी।”
नारी शक्ति में अपार विश्‍वास व्‍यक्‍त करते हुए स्‍वामी विवेकानंद ने कहा था- ”पाँच सौ पुरुषों के द्वारा भारत को जय करने में पचास वर्ष लग सकते हैं, परंतु पाँच सौ नारियों के द्वारा यह काम मात्र कुछ सप्ताहों में ही संपन्न हो सकता है।”
क्‍या ऐसा नहीं लगता कि महिलाओं की दशा बदलने की आज जो गति है, उसके चलते अभी कम से कम सौ साल तो हमें और लगेंगे नारी सशक्तिकरण के इन उपदेशों की भाषा बदलने में। तब तक हम चाहें तो पिंक टोपी, रूमाल या कमीज धारण कर काम चला सकते हैं।

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