ओ मानस के राजहंस, तुम भूल न जाना आने को

80 और 90 के दशक में ‘स्‍नेही स्‍वजन’ को विवाह समारोह में आमंत्रित करने के लिए, किसी अनाम कवि द्वारा रचित निम्‍नलिखित पंक्तियां निमंत्रण पत्रिकाओं में पूरे भक्ति भाव के साथ अनिवार्य रूप से लिखी जाती थीं-
भेज रहे हैं स्‍नेह निमंत्रण, प्रियवर तुम्‍हें बुलाने को
ओ मानस के राजहंस तुम भूल न जाना आने को
मध्‍यप्रदेश में इन दिनों सरकार की ओर से ऐसा ही निमंत्रण गांव वालों को दिया जा रहा है। दरअसल पूरे देश के साथ साथ हमारे प्रदेश में भी आज से ‘ग्राम उदय से भारत उदय’ अभियान शुरू हो रहा है। इसके तहत जन प्रतिनिधि और सरकारी अमला गांव गांव जाकर सरकार की विभिन्‍न योजनाओं के बारे में जानकारी लेगा। इस अनुष्‍ठान के आरंभ होने की पूर्व संध्‍या पर मुख्‍यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने अपने संदेश में कहा है- ‘’ग्राम उदय से भारत उदय अभियान वास्‍तव में ग्राम उत्‍थान का ऐसा आयोजन है जो भारत के सर्वांगीण विकास को निश्चित ही संबल प्रदान करेगा। अंत्‍योदय की अवधारणा के साथ अभिकल्पित यह अभियान जन सहभागिता से ही मूर्तरूप ले सकेगा। मेरा आप सबसे अनुरोध है कि आगे आएं और इस पुनीत अभियान में सकारात्‍मक योगदान देकर इसे सफल बनाएं।‘’
हालांकि केंद्र सरकार और मध्‍यप्रदेश सरकार के अभियान में थोड़ा अंतर है। केंद्र का अभियान जहां 14 से 24 अप्रैल यानी दस दिन चलेगा वहीं मध्‍यप्रदेश सरकार ने इसे और विस्‍तार देते हुए 31 मई यानी 45 दिन तक चलाने का फैसला किया है। इसका अर्थ यह हुआ कि इन 45 दिनों तक राज्‍य की सरकार गांवों में होगी।
देश के गांव आज जिस स्थिति से गुजर रहे हैं, उसे देखते हुए वास्‍तविकता जानने का यह अभियान स्‍वागत योग्‍य है। जैसे चिकित्‍सा के पेशे में कहा जाता है कि अच्‍छा या लोकप्रिय डॉक्‍टर वही है जो मरीज की बात पूरे धैर्य से सुने। मरीज भी डॉक्‍टर को अपनी रामकहानी सुनाकर आधा हलका हो जाता है। ठीक यही हाल हमारे ग्रामीणजनों का है। गांव वालों की सबसे बड़ी शिकायत यह रही है कि उनकी बात सुनने वाला कोई नहीं। दवा देने बात तो छोडि़ए, कोई उनका दर्द भी जानना नहीं चाहता। ‘ग्राम उदय से भारत उदय’ अभियान में और कुछ न करते हुए जन प्रतिनिधि व नौकरशाही यदि गांव वालों का दर्द ही धैर्यपूर्वक सुन लें तो बहुत बड़ी बात होगी।
आमतौर पर सरकारें जब भी जमीनी हकीकत जानने के ऐसे अभियान चलाती है, वे अंतत: एक कर्मकांड बनकर रह जाते हैं। पिछले साल जब मौसम की मार से मध्‍यप्रदेश में फसलें खराब हुई थीं, तो मुख्‍यमंत्री ने तमाम आला अफसरों को हड़का कर गांव जाने और वास्‍तविकता का पता लगाने को कहा था। नए अभियान से पहले, अफसरों को उस दौरे को लेकर मीडिया में छपी खबरों की कतरनें एक बार दिखा दी जानी चाहिए। दरअसल वह अभियान गांव की पिकनिक बनकर रह गया था। खुद मुख्‍यमंत्री ने बाद की बैठकों में नौकरशाही के इस रवैये पर नाखुशी जाहिर की थी। कहीं ऐसा न हो कि ‘ग्राम उदय से भारत उदय’ के तहत 45 दिन की यह यात्रा भी अपने मूल उद्देश्‍य से भटक जाए। ऐसा नहीं है कि इस तरह लोगों से रूबरू होने के परिणाम नहीं मिलते। यदि इस अभियान को गंभीरता से अंजाम दिया जाए तो इससे जुटने वाली जानकारी प्रशासन के लिए एक मार्गदर्शी दस्‍तावेज बन सकती है। वहीं सत्‍तारूढ़ दल के लिए इसका फीडबैक आने वाली दिनों में ‘एंटी इन्‍कंबंसी’ से मुकाबला करने में मदद कर सकता है।
अभियान के दौरान इस बात पर भी ध्‍यान दिया जाना चाहिए कि यह केवल सत्‍तारूढ़ दल का कार्यक्रम बनकर न रह जाए। मध्‍यप्रदेश में आज भी विपक्षी दल कांग्रेस के 57 विधायक हैं। यह स्‍पष्‍ट नहीं है कि कांग्रेस ने अपने विधायकों के लिए इस अभियान को लेकर क्‍या दिशानिर्देश जारी किए हैं। लेकिन यह सरकार का दायित्‍व है कि जिन क्षेत्रों का प्रतिनिधित्‍व विपक्षी दलों के जन प्रतिनिधि कर रहे हैं, वहां से भी समुचित फीडबैक मिले। सरकार की ओर से खुद विपक्षी दलों के नेताओं से बात की जाए और उन्‍हें इस अभियान में सक्रिय रूप से भाग लेने के लिए राजी किया जाए। यह अभियान कांग्रेस के लिए भी एक अवसर होगा, खासकर ग्रामीण क्षेत्र की समस्‍याओं को सामने लाने का। इसमें अरुचि दिखाकर वे अपना राजनीतिक अहित करेंगे। होना तो यह चाहिए कि विपक्षी दलों की नुमाइंदगी वाले क्षेत्रों से, सरकार और नौकरशाही के पास इतना तगड़ा फीडबैक जाए कि उसे देखकर बाकी क्षेत्रों में की गई लीपापोती या औपचारिकता की पोल खुद-ब-खुद सामने आ जाए। वैसे भी यह अभियान किसी राजनीतिक दल का नहीं बल्कि भारत और मध्‍यप्रदेश की सरकारों का है। और सरकारें पूरे देश या प्रदेश का प्रतिनिधित्‍व करती हैं, किसी एक राजनीतिक पार्टी का नहीं। जनता भी अपने नुमाइंदों व अफसरों के सामने खुलकर अपनी बात रखे, ताकि असलियत सामने आ सके। हम भी इन 45 दिनों में इस अभियान के विभिन्‍न पहलुओं को लेकर बात करते रहेंगे।

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