क्या संविधान की व्यवस्था सभी मजहबों पर लागू होगी?

प्रश्न 1: मध्यप्रदेश में भाजपा के संगठन मंत्री अरविंद मेनन को बदला जाना बड़ी घटना के रूप में देखा जा रहा है। मुख्यमंत्री के साथ बहुत अच्छा तालमेल रखने वाले मेनन की विदाई के बाद सत्ता और संगठन की जुगलबंदी को पुन: पुरानी लय पकड़ने में थोड़ा वक़्त लग सकता है। (बशर्ते यह बदलाव ज्यादा सुर-ताल में चल रहे युगलगान में व्यवधान डालने के लिए न किया गया हो !) प्रधानमंत्री की प्रदेश यात्रा के दो दिन पहले और सिंहस्थ से दस दिन पूर्व इस परिवर्तन के कोई राजनैतिक मायने हैं या यह एक रूटीन प्रक्रिया है, क्योंकि भाजपा में सत्ता और संगठन कभी अलग-अलग राग नहीं अलापते हैं। आकलन करें।

प्रश्न 2: केरल की सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश को लेकर चल रही सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने मंदिर के वकीलों से पूछा है कि क्या परम्पराएँ संविधान से बड़ी हैं? बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश के बाद शनि शिंगणापुर में स्त्रियों को मिली पूजा की अनुमति से उत्साहित महिला संगठन देश के सभी मंदिरों में प्रवेश की आशा कर रही होंगी। संविधान की व्यवस्था क्या केवल हिंदू मंदिरों पर लागू होगी या सभी मज़हबों के धर्मस्थल पर? जिन परम्पराओं की रक्षा तर्क और उचित व्याख्या द्वारा नहीं की जा सके उन्हें ढोते रहने का औचित्य क्या है? या रीति-रिवाज तर्क से परे होते हैं? विवेचना करें।

प्रश्न 3: पश्चिम बंगाल चुनावों में ज़ुबानी जंग पूरे शबाब पर है। मोदीजी ने टीएमसी(तृण मूल कांग्रेस) का फुल फॉर्म ‘टेरर, मौत, करप्शन’, बताया तो ममता दीदी ने जवाबी हमला करते हुए बीजेपी (भारतीय जनता पार्टी) को भयानक जाली पार्टी के रूप में परिभाषित करने में देर नहीं की। और भी बहुत कुछ कहा और किया जा रहा है जो अवांछनीय की सीमा तक पहुँचता प्रतीत होता है। एक समय अटलजी ने कहा था कि चुनाव जीतने के लिए कमर के नीचे प्रहार नहीं होना चाहिए। इस नसीहत को अधिकांश दल तोड़ते नज़र आते हैं। क्या अब सत्ता पाने के लिए नया मंत्र जपा जा रहा है कि युद्ध, प्रेम और चुनाव में सब जायज़ है? सहमति या असहमति दर्ज कराएँ।

प्रश्न 4: जद(यू) का अध्यक्ष बनते ही नीतीश कुमार ने कहा है कि वे भाजपा विरोधी सभी दलों जैसे कांग्रेस, वामपंथी और क्षेत्रीय दलों को विचारधारा तथा गवर्नेन्स के न्यूनतम साझा कार्यक्रम के अंतर्गत साथ लाते हुए एकजुट करने का प्रयास करेंगे। उन्होंने दावा किया है कि 2019 में भाजपा पुन: सत्ता में नहीं आएगी। क्या नीतीश कुमार बिहार में महागठबंधन की सफलता से उत्साहित होकर राष्ट्रीय परिदृश्य में भी ऐसे प्रयोग की विजय का सपना देख रहे हैं? क्या यह काम दादुरों को एक थाली में एकत्र करने जैसा है? पक्ष या विपक्ष में राय दें।

प्रश्न 5: उत्तरप्रदेश की एक ग्राम पंचायत ने लड़कियों को जीन्स न पहनने का फ़रमान जारी किया है। जहाँ एक ओर स्त्री-पुरुष समानता के लिए सामाजिक क्रांति लाने के प्रयास किए जा रहे हैं, कई मंदिरों में सैकड़ों वर्षों की औरतों के प्रवेश पर लगी पाबंदी ख़त्म की जा रही है वहाँ अभी भी ऐसी पंचायतों और उनके फ़तवों का वजूद क़ायम रहना किसकी नाकामी मानी जाय- सरकार की, समाज की या प्रगतिशील ताक़तों की? विश्लेषण करते हुए सुधार के उपाय सुझाएँ।

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