टूट के बाहों में बिखर जाती हो

प्रशांत तिवारी

गज़ल
        टूट के बाहों में बिखर जाती हो
        तो मर जाता हूं मै,
        जब कभी हौले से
        मुस्कराती हो
        तो मर जाता हूं मैं,
        चलती राहों पे चुप रहता हूं
        कुछ बोलने की चाहत में
        तुम बिना बोले ही
        सब कुछ कह जाती हो
        तो मर जाता हूं मैं
        टूट के बाहों——।

        बात इतनी है कि,
        बताये ना बताई जाएगी
        ऐसी महफिल कभी ना लौटकर
        फिर आयेगी,
        जब बिना बात के शरमाती हो
        तो मर जाता हूं मैं
        टूट के बाहों——–।      

        दिले नादां को समझाने के लिये
        कुछ भी नहीं,
        बढ़ती धड़कन को बहलाने के लिये
        कुछ भी नहीं,
        जब कभी तेज सी नज़रों से
        देखती हो मुझे,
        तेरे आने की इक आहट से ही
        मर जाता हूं मैं
        टूट के बाहों में बिखर जाती हो
        तो मर जाता हूं मैं
        जब कभी हौले से
        मुस्कराती हो
        तो मर जाता हूं मैं।
                        
                           

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