दे दे राम, दिला दे राम, देने वाला श्री भगवान…

बचपन में हमारे मोहल्‍ले में कुष्‍ठ रोग से ग्रस्‍त कुछ लोग, एक पटिए पर चार पहिए लगी ‘पटिया गाड़ी’ को खींचते हुए, इसी गुहार के साथ अकसर भीख मांगने आया करते थे। उनकी आवाज के साथ बहता दर्द और पीड़ा इतनी गहरी होती थी कि कई सौ मीटर दूर से भी उनकी आवाज सुनाई दे जाती। और उनके जाने के काफी देर बाद तक ये पंक्तियां कानों में वैसी ही गूंजती रहतीं। उनकी पटिया गाड़ी में या तो किसी देवी-देवता की तसवीर बैठी होती या फिर उन्‍हीं के बीच का कोई कुष्‍ठ पीडि़त, जो आमतौर पर कोई बुजुर्ग या महिला होती थी। पहली पंक्ति गाड़ी को खींचने वाला बोलता और दूसरी पंक्ति गाड़ी में बैठी हुई महिला।
मां के कहने पर हम कभी उन लोगों को आटा, कभी रोटी या कभी कभार कोई पुराना कपड़ा देने जाते। उस जमाने में बच्‍चों को यह सख्‍त हिदायत दी जाती थी कि सारा सामान दूर से ही देना, उन लोगों को छूना मत। और जैसाकि होता है, बच्‍चा वही काम पहले करता है, जिसके लिए उसे मना किया जाए। सामग्री देने के बहाने हम जानबूझकर अपने हाथ का स्‍पर्श उन लोगों के हाथ से करवाते और (शायद) मां को परेशान करने की नीयत से, बाद में आकर कहते, मैंने तो दूर से ही दिया था, उसने मेरे हाथ को छू लिया। मां भड़क जातीं और तत्‍काल निर्देश होता- ‘’जाओ जाकर अच्‍छी तरह साबुन से हाथ धोओ। हजार बार मना किया है कि इन लोगों से दूर रहा करो, पर तुम सुनते कहां हो?’’ खैर हम मां के निर्देशानुसार हाथ-वाथ धो धा कर गली में खेलने चले जाते और वहां जाकर शुरू हो जाता वही ‘दे दे राम दिला दे राम‘ का खेल। किसी बच्‍चे को टायर के टुकड़े पर बिठाकर, उसे पटिया गाड़ी की तरह खींचते हुए ले जाना और घुमाते घुमाते उन्‍हीं कुष्‍ठ रोगियों की तर्ज पर गाना- ‘दे दे राम दिला दे राम, देने वाला श्री भगवान।‘ इसमें भी ‘श्री’ को ‘श्री’ की तरह नहीं बोला जाता, बल्कि इसे यूं गाया जाता- ‘देने वाला सिरी भगवान…’
आज न तो कुष्‍ठ निवारण दिवस है और न ही भिक्षावृत्ति विरोधी दिवस। इस प्रसंग की याद यूं आई कि सुबह से वाट्सएप पर रामनवमी की बधाई के संदेश आ रहे हैं। राम भगवान थे या नहीं, यह बात तो बाद में समझ आई, पर एक बच्‍चे के रूप में हमने ‘राम’ को घर में होने वाले पूजा पाठ के दौरान बोले जाने वाले श्‍लोकों के अलावा, आम जीवन में ‍’दे दे राम’ से ही जाना। इसीलिए आज यदि स्‍मृति के पटल पर ‘राम रक्षा स्‍तोत्र’ का ‘राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे, सहस्‍त्र नाम तत्‍तुल्‍यं राम नाम वरानने’ याद है तो उसी के समानांतर ‘दे दे राम दिला दे राम, देने वाला श्री भगवान भी’ वैसा ही ताजा का ताजा रखा है।
इस बार 14 अप्रैल को आंबेडकर जयंती और 15 अप्रैल को रामनवमी के प्रसंग ने, बचपन की उन यादों के साथ एक दिलचस्‍प कोलाज बनाया। लगा कि पुराने जमाने का वह दृश्‍य आज के हालात पर क्‍या खूब फिट हो रहा है। आप भी जरा ऐसे दृश्‍य की कल्‍पना करके देखिए। बस मांगने वाले बदल गए हैं, बाकी मूल वृत्ति तो वही की वही है। थोड़ा बहुत बदलाव चीजों में हुआ है, जैसे पटिया गाड़ी की जगह बड़ी एसयूवी गाडि़यों ने ले ली है और फटे चीथड़े वाले लोगों की जगह लकदक सफेद कुर्ता पायजामा वालों ने। हालांकि ये नए लोग ‘दे दे राम दिला दे राम’ तो नहीं गाते, लेकिन ये जो भी गाते या बोलते हैं, उसका निहितार्थ वही पुराना वाला ही महसूस होता है। उस समय उनकी पटिया गाड़ी में देवी देवताओं की तसवीर होती थी आज की गाडि़यों में ये तसवीरें बदलती रहती हैं। कभी देवी देवता होते हैं तो कभी गांधी, कभी आंबेडकर वगैरह वगैरह। जब जैसी हवा चल जाए…। लेकिन ‘सत्‍ता कुष्‍ठ’ से पीडि़त ये लोग काम तो वही कर रहे हैं। हर बार गाड़ी में किसी नई मूरत को सामने रखकर ‘दे दे राम, दिला दे राम’ जैसी टेर लगाई जा रही है। बरसों पहले तो अज्ञानवश ही सही, यह ताकीद की जाती थी कि इन लोगों से दूर रहो, लेकिन मुश्किल यह है कि आज सब कुछ जानते बूझते भी कोई यह कहने वाला नहीं है, कि इन लोगों से दूर रहो। कुष्‍ठ भले ही छूत की बीमारी न हो लेकिन यह जो नया राजनीतिक कुष्‍ठ है, वह जरूर छूत की बीमारी की तरह फैलता जा रहा है। हे ईश्‍वर, इस संक्रमण से बचा!

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