बहुत मुश्किल है निगरानी का सफर, चलो यूं कर लें…

मध्‍यप्रदेश सरकार ने जनता से जुड़ी योजनाओं के लिए अलग से निगरानी तंत्र (मॉनिटरिंग सिस्‍टम) विकसित करने का फैसला किया है। सरकार चाहती है कि प्रदेश की जनता और खासकर कमजोर वर्गों के लिए वह जो योजनाएं चला रही है वे जनता तक ठीक से पहुंच रही हैं या नहीं और वास्‍तविक हितग्राहियों को उन योजनाओं का फायदा मिल रहा है या नहीं इसकी पुख्‍ता जानकारी उसके पास हो।
वैसे तो योजनाओं का प्रभावी क्रियान्‍वयन सरकार और उससे जुड़े तंत्र की प्राथमिक जिम्‍मेदारी है लेकिन इसके राजनीतिक निहितार्थ भी हैं। ऐसी योजनाओं की अहमियत या मुसीबत चुनाव के समय सामने आती है जब विपक्षी दलों के साथ-साथ जनता भी पूछती है कि हुजूर आपने उस समय जो योजना चलाई थी या जो अमुक वायदा किया था, उसका क्‍या हुआ? चुनाव में ऐसी योजनाओं का हिसाब किताब लिया भी जाता है और सरकार में रहने वाले दल को उनका लेखा-जोखा देना भी पड़ता है। आशय यह कि ऐसी योजनाओं की निगरानी चुनाव के वक्‍त बड़ी काम आ सकती है। और इस लिहाज से मध्‍यप्रदेश सरकार की यह राजनीतिक दूरदर्शिता ही कही जाएगी कि उसने योजनाओं की जमीनी हकीकत को जानने के लिए कोई अलग ढांचा खड़ा करने का मन बनाया है। यदि सरकार के हाथ में योजनाओं की जमीनी हकीकत के आंकड़े होंगे तो 2018 में होने वाले विधानसभा चुनावों के समय वह जनता के सामने छाती ठोक कर बता सकेगी। वरना ये ही योजनाएं बाद में उसे छाती पीटने पर भी मजबूर कर सकती हैं।
अब जरा इस बात पर आ जाएं कि योजनाओं की निगरानी कैसे की जाए या उसके लिए क्‍या-क्‍या उपाय किए जाएं। आज जो हम देख रहे हैं उसमें तो यही लगता है कि सरकारी अमला रोजमर्रा के कामकाज भी प्रभावी ढंग से नहीं कर पा रहा तो सरकार की जनकल्‍याणकारी योजनाओं की निगरानी और उनके प्रभाव या जनता को होने वाले उनके लाभ के बारे में वास्‍तविक तथ्‍य कैसे जुटा पाएगा? अभी हालत यह है कि पेंशन देने या जन्‍म-मृत्‍यु प्रमाण पत्र देने, जैसे कई बुनियादी काम सरकारी अमले से समय पर कराए जा सकें इसके लिए लोक सेवा गारंटी अधिनियम बनाना पड़ता है। और जब ये छोटे मोटे काम ही समय पर नहीं हो रहे तो, किस अफसर या कर्मचारी को पड़ी है कि वह जनकल्‍याणकारी योजनाओं की ऐसी निगरानी करता फिरे कि जनता को उसका कितना लाभ हुआ है। या जिनके लिए वो योजना बनाई गई थी उनके जीवनस्‍तर में क्‍या परिवर्तन आया है। अलबत्‍ता ऐसी योजनाओं में ‘जनकल्‍याण’ से इतर ‘स्‍व–कल्‍याण’ पर ध्‍यान जरूर केंद्रित रहता हे।
अकसर देखा गया है कि जब भी सरकारी अमला इस तरह की निगरानी करने में असफल होता महसूस होता है राजनीतिक या प्रशासनिक स्‍तर पर ही यह काम किसी बाहरी/निजी एजेंसी को देने की बात चलने लगती है। कहने कि आवश्‍यकता नहीं कि ‘जनहित’ के नाम पर ऐसे सुझाव के पीछे कई ‘हित’ छिपे होते हैं।
ऐसे में कल्‍याणकारी योजनाओं की निगरानी के लिए एक सुझाव है। सरकार यूं करे कि हर ब्‍लॉक या पंचायत में किसी भी एक गांव को आधार बना ले। फिर यह देखा जाए कि उस गांव में जितनी भी आबादी है, उसके लिए कौन कौन सी योजनाएं लागू होती हैं या हो सकती हैं। इसके बाद गांव में रायशुमारी कर यह रिकार्ड तैयार कर लिया जाए कि सभी हितग्राहियों को उन योजनाओं का लाभ मिल रहा है या नहीं। जैसे यदि गांव की आबाद दो हजार है, तो निश्चित ही उसमें कुछ बच्‍चे होंगे, कुछ महिलाएं होंगी, कुछ वृद्ध होंगे, कुछ विधवाएं होंगी। जब आप पता करने निकलें तो वृद्धों से पूछ लें कि क्‍या सभी को बिना किसी बाधा के वृद्धावस्‍था पेंशन मिल रही है, विधवाओं से पूछ लें कि क्‍या उन्‍हें निराश्रित पेंशन का लाभ मिल पा रहा है, बच्‍चों में पता करवा लें कि यदि वे स्‍कूल जा रहे हैं, तो क्‍या उन्‍हें मध्‍याह्न भोजन, निशुल्‍क गणवेश, सायकिल, छात्रवृत्ति जैसी सुविधाएं मिल रही हैं। पांच साल से कम आयु के बच्‍चों के बारे में पता करवा लें क्‍या निशुल्‍क लगने वाले सारे टीके उन्‍हें लग चुके हैं, अनुसूचित जाति, जनजाति के लोगों को उनके लिए बनी योजनाओं का लाभ मिल रहा है या नहीं। किसी भी एक गांव से जुटाई जाने वाली ऐसी सारी जानकारी हांडी के चावल की तरह होगी। आप एक दाना उठाकर भी पता कर सकते हैं कि असलियत क्‍या है। यदि किसी गांव में सारी योजनाओं का, सभी पात्र लोगों को लाभ मिल रहा हो तो उसे आदर्श गांव मानिए और इसी तरह एक-एक गांव के बारे में पता करते चलिए। यह जिम्‍मा पंचायतों को दिया जा सकता है। यदि ऐसा चमत्‍कार हो जाए कि किसी गांव की पूरी आबादी को सभी सरकारी योजनाओं का बिना किसी बाधा के वास्‍तविक और पूर्ण लाभ मिल रहा हो, तो मान लीजिएगा कि आपकी सरकार भी ठीक काम कर रही है और आपका तंत्र भी। वरना वास्‍तविकता क्‍या है वह तो आपको भी पता है और जनता को भी… वैसे यदि ऐसा कोई गांव मिले तो बताइएगा जरूर….

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