माल्या पर ‘दरियादिल’ बैंकों की जनधन पर ‘हायतौबा’

प्रधानमंत्री जनधन योजना को लेकर जो खबरें आ रही हैं वे चिंता में डालने के साथ ही कई सारी बातों के खुलासे की मांग करती हैं। नरेंद्र मोदी सरकार ने यह महत्‍वाकांक्षी योजना बड़े जोर शोर से 28 अगस्‍त 2014 को शुरू की थी और इसकी अहमियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उसके बाद जितने भी चुनाव हुए हैं उसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस योजना का जिक्र अपनी उल्‍ल्‍ेखनीय उपलब्धि के रूप में जरूर करते हैं। इस योजना को वैसे तो गरीबों के हित में बताकर प्रचारित किया गया था, लेकिन आर्थिक विशेषज्ञों का मानना था कि सरकार मुफ्त में खाते यूं ही नहीं खुलवा रही। संभवत: उसकी मंशा विभिन्‍न कल्‍याणकारी योजनाओं के क्रियान्‍वयन में इन खातों को महत्‍वपूर्ण माध्‍यम के रूप में इस्‍तेमाल करने की है। विशेषज्ञों का मानना था कि सरकार योजनाओं में दी जाने वाली सबसिडी की रकम इन खातों के जरिए सीधे उपभोक्‍ता या हितग्राहियों तक पहुंचाएगी ताकि न तो बिचौलियों को हेराफेरी करने का मौका मिले और न ही बांटी जाने वाली रकम में कोई गोलमाल हो।
प्रधानमंत्री जनधन योजना की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार अभी तक इस योजना के अंतर्गत 21 करोड़ 51 लाख खाते खोले जा चुके हैं। इन खातों में 36 हजार 600 करोड़ रुपए से अधिक की रकम जमा है। योजना को गिनीज बुक ऑफ वर्ल्‍ड रिकार्ड में भी दर्ज किया गया है। अपने मध्‍यप्रदेश की स्थिति देखें तो जनधन खातों की जानकारी देने वाला हमारा समग्र पोर्टल कहता है कि राज्‍य में जनधन योजना के अंतर्गत राष्‍ट्रीय और वाणिज्यिक बैंकों में एक करोड़ 22 लाख 46 हजार 961 खाते हैं। इनमें से 91 लाख 62 हजार 315 ग्रामीण क्षेत्र में और 30 लाख 84 हजार 646 शहरी क्षेत्र में हैं।
जाहिर है जनधन खातों के इस विशाल ताने बाने के संचालन पर उतना ही अधिक ध्‍यान और गंभीरता जरूरी है। लेकिन हाल ही में बैंकिंग क्षेत्र से इस योजना का फीडबैक आया है कि ये खाते बैंकों के लिए मुसीबत का सबब बन गए हैं। बैंक अधिकारियों का कहना है कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के दबाव के चलते ‘जीरो बैलेंस’ पर खुले इन खातों को सक्रिय रखने के लिए बैंकों को खुद पैसे डालना पड़ रहे हैं। ऐसा इसलिए हुआ क्‍योंकि जीरो बैलैंस पर खाते तो खुल गए, लेकिन कई खातों में एक भी पैसा जमा नहीं हुआ।
चूंकि यह प्रधानमंत्री द्वारा घोषित योजना है, इसलिए बैंक उसे बंद करने का जोखिम भी नहीं उठा सकते। यानी इन खातों को लेकर वही पुरानी कहावत लागू हो रही है कि ‘सोने से ज्‍यादा बनवाई महंगी’। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक भारतीय स्टेट बैंक के एक अधिकारी का कहना है कि दो लाख रुपये का बीमा और पांच हजार रुपये के ओवरड्राफ्ट के लालच में पूरे देश में करोड़ों खाते खोल दिए गए। करीब 30 फीसदी खातों में एक भी पैसा नहीं है। जीरो बैलेंस होने के कारण उन खातों को न तो बीमा का लाभ मिल रहा है और न ही ओवरड्राफ्ट का। सार्वजनिक क्षेत्र के एक और बड़े बैंक पंजाब नैशनल बैंक के अधिकारी ने कहा कि खाता खुलवाने के बाद आधे खाताधारकों ने दोबारा बैंक का मुंह नहीं देखा। अब ऐसे खाताधारक बैंक के पत्र व्‍यवहार का भी कोई जवाब नहीं दे रहे। मुसीबत टालने के लिए बैंक मैनेजर ऐसे खातों में रुपये डाल रहे हैं। बाकायदा हर खाताधारक के नाम एक-एक रुपये के वाउचर काटे जा रहे हैं और इस खर्च को रोजमर्रा के चाय-पानी खर्च में समायोजित किया जा रहा है।
दरअसल गरीबों को ध्‍यान में रखकर बनाई गई जन धन योजना के तहत खाता धारकों को जीवन बीमा और दुर्घटना बीमा का लाभ भी मिलता है। आपत्ति के समय वे साहूकारों के कर्ज के चंगुल में न फंसें इसके लिए 5000 रुपए तक की राशि के ऋण की सुविधा भी इन खातों के साथ नत्‍थी है। लेकिन इन सब सुविधाओं के लिए उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे खाते में थोड़ा बहुत लेन देन करते रहें।
मुद्दा यह है कि अब जब बैंक ही इस योजना को ‘सिरदर्द’ मान रहे हैं तो आने वाले दिनों में इसका भविष्‍य क्‍या होगा? पहले से ही हजारों करोड़ की डूबत राशि से परेशानी में फंसे बैंकिंग सेक्‍टर को क्‍या यह योजना और मुश्किल में नहीं डाल देगी? लेकिन इसी के समानांतर एक और सवाल भी उठता है कि विजय माल्‍या जैसे लोगों को हजारों करोड़ का कर्ज देने वाले बैंक, गरीबों के नाम पर चलने वाली इस योजना पर हल्‍ला मचाकर कहीं अपने काले कारनामों पर परदा तो नहीं डालना चाह रहे? बेहतर यही होगा कि सरकार जनधन योजना को लेकर बैंकों की इस बयानबाजी पर जल्‍दी ही स्थिति स्‍पष्‍ट करें, वरना आर्थिक के साथ-साथ उसे राजनीतिक नुकसान भुगतने के लिए भी तैयार रहना होगा।

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