सियासी दांव का आधार न हो निजी क्षेत्र में आरक्षण

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    भाजपा सहित सभी राजनीतिक दलों में बाबासाहब आम्बेडकर के प्रति जागे भक्ति-भाव में यह झलकने लगा है कि  2019 के लोकसभा चुनाव के पहले देश में निजी क्षेत्र भी किसी न किसी रूप में आरक्षण के दायरे में आ जाएंगे। लोकसभा चुनाव के पूर्व उत्तर प्रदेश सहित अन्य राज्यों में होने वाले चुनाव के मद्देनजर आरक्षण के नाम पर राजनीतिक-बोलियां लगाने का सिलसिला शुरू हो चुका है। राजनीतिक मजबूरियों के चलते कोई भी दल पीछे नहीं दिखना चाहता है। गैर-भाजपाई दलों के लिए आरक्षण की राजनीति पिछड़ों को गोलबंद करने के लिहाज से हमेशा लाभ का सौदा रही है, जबकि भाजपा अपनी सवर्ण छवि तोड़ने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रही है।  लोकसभा चुनाव के पहले विधानसभाओं में आरक्षण को लेकर जोर आजमाइश इसलिए भी है कि नीतीश कुमार नरेन्द्र मोदी के मुकाबले में खड़ा होना चाहते हैं। अपनी पीएमओ-उड़ान के लिए नीतीश कुमार को उत्तर प्रदेश की चुनावी हवाई पट्टी ज्यादा मुआफिक महसूस हो रही है।

इसीलिए जद (यू) के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने निजी क्षेत्र में आरक्षण और अन्य क्षेत्रो में आरक्षण का कोटा बढ़ाने की मांग उठाकर नया राजनीतिक एजेंडा सेट करने का दांव चल दिया है। यह सियासत को फिर से जाति उन्मुख करने और समाज को क्षैतिज रूप से विभाजित करने की सु‍नियोजित चाल भी है। सोच यह है कि देश में हिन्दुत्व के ज्वार की हवा जातीय विभाजन की सुई से निकाली जा सकती है। पिछले दिनों पटना के एक कार्यक्रम में नीतीश कुमार ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित आरक्षण की 50 प्रतिशत सीलिंग को बढ़ाना जरूरी है, क्योंकि अनुसूचित जाति और जनजाति की आबादी बढ़ी है। उन्होंने निजी क्षेत्र में भी आरक्षण व्यवस्था को लागू करने पर जोर दिया, क्योंकि सरकारी क्षेत्र में नौकरियों की संख्‍या घटती जा रही है। नीतीश के पहले यह मुद्दा राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग ने उठाया था। उसने सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग को इसी साल 4 फरवरी को एक चिट्ठी लिखी थी। इसमें ओबीसी के लिए निजी क्षेत्र में आरक्षण लागू करने की बात कही गई थी। केन्द्रीय सामाजिक न्याय मंत्री थावरचंद गेहलोत ने भी इस मांग का सैद्धांतिक समर्थन किया था। निजी क्षेत्र में रिजर्वेशन की मांग लोजपा के रामविलास पासवान और लालू यादव भी कई मंचों से उठा चुके हैं। तर्क यह है कि निजी क्षेत्र बैंको से लोन, सरकार से टैक्स छूट सहित कई लाभ लेते हैं। इसलिए उन्हें भी सरकार की सामाजिक न्याय नीति के क्रियान्वयन में समान रूप से भागीदार होना चाहिए। सरकार इसके लिए वैधानिक प्रावधान करे। हालांकि कॉरपोरेट क्षेत्र इससे सहमत नहीं है। वह पहले ही कह चुका है कि निजी क्षेत्र में वैधानिक आरक्षण लागू करना आर्थिक प्रगति और गुणवत्ता से समझौता करना होगा। वर्तमान परिस्थितियों में देश इसको ‘अफोर्ड’ नहीं कर पाएगा।

संविधान निर्माता बाबा साहब आंबेडकर ने संविधान में आरक्षण का प्रावधान केवल 10 वर्ष के लिए किया था। यह आरक्षण भी सरकारी क्षेत्र में और अनुसूचित जाति तथा जनजाति के लिए था। बाबा साहब स्वयं अपनी प्रतिभा और योग्यता के दम पर इस ऊंचाई तक पहुंचे थे। फिर भी उन्होंने समाज के कमजोर तबके को आरक्षण की पैरवी इस आधार पर की थी कि सामाजिक न्याय और सर्वांगीण प्रगति के लिए यह जरूरी है। सभी मानते हैं कि हिंदू धर्म में कठोर जाति व्यवस्‍था के कारण कई छोटी जातियों के साथ सदियों तक अन्याय हुआ। योग्यता और गुणवत्ता का एकाधिकार कुछेक जातियों तक सीमित रहा। बाबा साहब  यह भी मानते थे कि आरक्षण योग्यता का विकल्‍प नहीं है। लेकिन वह योग्यता के पैमाने पर गैरबराबरी समाप्त करने का प्रभावी माध्यम अवश्य है। आरक्षण के पीछे उनकी बहुजन समाज के कल्याण और सामाजिक उत्थान की पवित्र भावना थी। बाद में राजनीतिक दलों को आरक्षण में सत्ता की गारंटी और वोट बैंक नजर आने लगा। सामाजिक न्याय की मूल भावना ने मतों की गोलबंदी और जातीय किलेबंदी का रूप ले लिया। इसी के चलते अजा-जजा के बाद पिछड़ा वर्ग को भी आरक्षण दिया गया। वर्तमान में देश के अधिकांश राज्यों में 49.5 फीसदी आरक्षण लागू है। सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण की सीलिंग 50 प्रतिशत तय की हुई है।

देश में 1991 में लागू आर्थिक उदारीकरण ने जहां आर्थिक वृद्धि दर को तेज किया, वहीं बड़े पैमाने पर रोजगार सृजित करने शुरू किए। जबकि भारी घाटे और अकुशलता के कारण सरकारी क्षेत्र में रोजगार की संख्या घटने लगी। निजी क्षेत्र में आरक्षण का मुद्दा राजनीतिक दृष्टि से ज्यादा संवेदनशील है।  यह हिंदुत्व कार्ड का शर्तिया तोड़ और बुनियादी सवालों से बचने तथा नए सपने दिखाने का अच्छा जरिया है। निजी क्षेत्र में जाति से ज्यादा अहम काबिलियत और कुशलता है। कठिन प्रतिस्पर्धा में टिकना और स्वयं को समय की कसौटी पर कसते जाना ही उसके अस्तित्व की गारंटी है। निजी क्षेत्र में आरक्षण लागू करने का परोक्ष और सकारात्मक तरीका यही है कि वंचित जातियों को कौशल प्रशिक्षण दिया जाए और उन्हें आर्थिक क्षेत्र की प्रतिस्पर्धा में टिकने लायक बनाया जाए। इसी से रोजगार मिलेगा और सामाजिक विषमता मिटेगी। क्षुद्र राजनीतिक लाभों के लिए देश को दांव पर नहीं  लगाया जाना चाहिए।

 

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