सुरेश बाफना का नजरिया : एक साथ चुनाव, मोदी की नई चिन्ता

दिल्ली व बिहार के विधानसभा चुनावों में भारी शिकस्त खाने और आर्थिक व सामाजिक मुद्दों पर असफल रहने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने वजीरों के माध्यम से एक नई बहस छेड़ दी है कि लोकसभा, विधानसभा व पंचायतों के चुनाव एक साथ कराए जाए, ताकि देश तेजी के साथ तरक्की कर सकें। 2010 में वरिष्ठ भाजपा नेता लालकृष्ण आणवाणी ने एक ब्लाग के माध्यम से एक साथ चुनाव कराने का सुझाव दिया था। इस बहस को आगे बढ़ाने के लिए संसदीय समिति की रिपोर्ट को आधार बनाया गया है। यह निष्कर्ष निकाल लिया गया कि चुनावों की अधिकता की वजह से देश का विकास बाधित हो रहा है। एक साथ चुनाव कराने के सुझाव को यदि स्वीकार कर लिया जाए तो देश के संविधान में आमूलचूल परिवर्तन करने होंगे, जिसके लिए नई संविधान सभा का गठन करना होगा। आश्चर्य की बात है कि जिस चुनाव प्रक्रिया के माध्यम से मोदीजी सत्ता के शिखर पर पहुंचे हैं, आज वही चुनाव प्रक्रिया उनके लिए परेशानी का सबब बन गई है। वे अमेरिका व यूरोपीय देशों की संवैधानिक व्यवस्थाअों से प्रभावित होकर भारत के संविधान में बदलाव लाने की बात कर रहे हैं। उनका तर्क है कि हर वक्त चुनाव में व्यस्त के कारण पार्टी के कार्यकर्ता समाज सेवा का काम नहीं कर पा रहे हैं। मोदीजी के साथ दिक्कत यह है कि वे विधानसभा व पंचायत के चुनावों को भी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का सवाल बना देते हैं। मोदी सरकार में देवकांत बरूआ बने केन्द्रीय मंत्री वैंकेया नायडू को इस बात की चिन्ता सता रही है कि बार बार चुनाव होने की वजह से धन की बर्बादी हो रही है। लोकसभा व बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा ने कितने हजार करोड़ रूपए खर्च किए, यह देश की जनता अच्छी तरह जानती है।

विकास के तर्क को यदि स्वीकार कर लिया जाए तो नेहरूजी के कार्यकाल के दौरान देश की आर्थिक विकास दर 8 प्रतिशत के आसपास होनी जाहिए थी, जो केवल 3 प्रतिशत के भीतर थी। तब लोकसभा व विधानसभा के चुनाव एक साथ होते थे। भाजपा के नेता यह कहते हुए नहीं थकते हैं कि भारत के लोकतंत्र की अपनी कुछ स्वाभाविक विशेषताएं हैं, जिनकी तुलना पश्चिमी देशों में प्रचलित लोकतांत्रिक प्रणालियों से नहीं की जा सकती है। इन्हीं भाजपा नेताअों के मुंह से यह सुनना अजीब  लगता है कि अमेरिकी व यूरोपीय देशों की नकल करके हम लोकसभा व विधानसभाअों के कार्यकाल को पांच साल के लिए फिक्स कर दें। पहली बात यह है कि भारत की तुलना यूरोप के उन देशों के साथ नहीं की जा सकती है जहां एक स्तरीय शासन प्रणा‍लियां हैं। भारत की विशालता व विविधता दुनिया के लिए एक बड़ा अजूबा है। 1947 में ब्रिटेन के नेताअों ने कहा था कि भारत कई टुकड़ों में विभाजित हो जाएगा। उनकी यह भविष्यवाणी न केवल गलत सिद्ध हुई बल्कि भारत का लोकतंत्र दुनिया को अपनी तरफ आकर्षित कर रहा है। देश की अनेक स्तरीय विविधता को ध्यान में रखकर हमारे संविधान निर्माताअों ने संघीय ढाचे को अपनाया। यह सही है कि हालात बदलने पर संविधान में परिवर्तन करना पूरी तरह उचित है, लेकिन परिवर्तन नकारात्मक दिशा में नहीं होना चाहिए। खरीदफरोख्त व अवसररवादी राजनीति के आधार पर वैकल्पिक सरकार का गठन किए जाने की तुलना में जनता के बीच जाने का विकल्प ही बेहतर होता है। राजनीतिक अस्थिरता का दौर भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का एक अभिन्न हिस्सा है, जिससे घबराने की जरुरत नहीं है। इस बात को भूलना नहीं चाहिए कि पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने पूरे पांच साल तक अल्पमत की सरकार चलाई है। हमारे संविधान ने प्रधानमंत्री को यह अधिकार भी दिया है कि यदि वह चाहे तो केबिनेट में निर्णय लेकर समय से पहले भी चुनाव करवा सकता है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने छह माह पहले चुनाव करवाए थे।

 

एक साथ चुनाव कराए जाने के संदर्भ में एक तर्क यह भी दिया जा रहा है कि इससे समय और धन की बचत होगी। दिलचस्प बात है कि लोकसभा चुनाव में अरबों रुपए खर्च करने के बाद मोदीजी को चुनाव प्रक्रिया को सीमित करके धन बचाने की चिन्ता हुई है। कोशिश यह होनी चाहिए कि चुनाव में धनबल की भूमिका को किस तरह निम्नतम स्तर पर लाया जाए? वास्तविकता यह है कि लगभग सभी राजनीतिक दल काले धन की बैसाखी पर खड़े हुए हैं। वित्त मंत्री अरुण जेटली सभी वित्तीय लेनदेन को केशलैस और डिजिटल बनाने की कोशिश कर रहे हैं, क्या वे यह सुनिश्चित करेंगे कि भाजपा को जितना भी चंदा मिल रहा हैं उसका भी डिजिटल रिकार्ड बनाया जाए। चुनाव को एक लोकतांत्रिक उत्सव के रूप में देखा जाना चाहिए। लोकतंत्र को बनाए रखने की आर्थिक लागत होती है जो हर लोकतांत्रिक देश को वहन करनी पड़ती है। यह दोहराना जरुरी है कि लोकतंत्र में कई खामियां हैं, लेकिन इससे बेहतर शासन प्रणाली कोई दूसरी नहीं है। एक अनुमान के अनुसार लोकसभा चुनाव कराने का कुल सरकारी खर्च 4500 करोड़ रुपए है जो बहुत अधिक नहीं है। असली समस्या राजनीतिक दलों व उम्मीदवारों के खर्च के स्तर पर है, जिसका समाधान निकालने में किसी भी राजनीतिक दल की रुचि नहीं है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की आप पार्टी ने चंदे में पारदर्शिता का अच्छा उदाहरण पेश किया है, जिसे क्या मोदीजी भी स्वीकार करेंगे? यूरोप के 51 देशों की कुल आबादी 75 करोड़ के आसपास है और भारत की आबादी एक अरब 31 करोड़ तक पहुँच गई है। इतने विशाल देश में यदि किन्हीं राज्यों में चुनाव होते रहते तो यह हमारी लोकतांत्रिक ताकत का प्रतीक है। यदि कुछ राज्यों में लोकसभा चुनाव के साथ विधानसभा चुनाव होते हैं तो ठीक है और न हो पाते है तो परेशान होने की जरुरत नहीं है।

 

 

 

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