सुरेश बाफना का नजरिया : मोदी मोनोलॅाग का समय खत्म

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व बसपा सुप्रीमो मायावती के बीच अनेक असमानताएं हैं लेकिन मीडिया को लेकर दोनों का रवैया एक जैसा है। दोनों ही मीडिया को हिकारत की नजर से देखते हैं। चुनाव प्रचार के दौरान मोदी ने एक बार अपने भाषण में कहा था कि मीडिया न्यूज का सौदागर बन गया है। यह सही है कि आज मीडिया का एक बड़ा हिस्सा कारपोरेट हितों का संरक्षक बन गया है, लेकिन यह भी सचाई है कि मीडिया का एक छोटा हिस्सा आज भी जनता के व्यापक हितों के साथ कोई समझौता करने के लिए तैयार नहीं है। कारपोरेट मीडिया आज का यथार्थ है जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती है। कारपोरेट  मीडिया को यदि सामाजिक व नैतिक मानदंडों के आधार पर समझने की कोशिश करेंगे तो हम गलत नतीजें पर ही पहुंचेंगे। कारपोरेट मीडिया के आंतरिक अर्न्तविरोध है जिनको समझने की जरूरत है। पिछले दिनों  जवाहरलाल नेहरू विश्‍वविद्यालय से जुड़े घटनाक्रम के दौरान यह स्पष्ट हुआ कि कारपोरेट जगत से जुड़े मीडिया ने एक जैसा रवैया नहीं अपनाया। इस संदर्भ में हमें यह याद रखना जरूरी होगा कि मोदी व भाजपा की ऐतिहासिक चुनावी जीत में कारपोरेट मीडिया ने बड़ी भूमिका निभाई थी। जेएनयू प्रसंग में हालत यह हो गई थी कि भाजपा से जुड़े उन केन्द्रीय मंत्रियों को भी अखबारों में लेख लिखने पड़े जिन्होंने कभी लिखने की जरूरत महसूस नहीं की थी। भाजपा के भीतर इस बात को लेकर खलबली थी कि उनका प्रिय कारपोरेट मीडिया भी कन्हैया का राग अलाप रहा है। जैसे ही कन्हैया की टीआरपी का दौर खत्म हुआ, कारपोरेट मीडिया ने फिर मोदी का गुणगान शुरू कर दिया। कारपोरेट मीडिया के इस रूप को नरेन्द्र मोदी अच्छी तरह पहचानते हैं। इसलिए वे पत्रकारों की परवाह नहीं करते हैं।

गुजरात के मुख्य मंत्री के रूप में पत्रकारों के साथ उनका रिश्ता सदैव घृणा का ही रहा है। गुजरात दंगे के बाद दिल्ली के पत्रकारों के साथ भी उनके संबंध काफी खराब हो गए थे। गुजरात विधानसभा व लोकसभा चुनाव के पूर्व चुनिंदा पत्रकारों को इंटरव्यू देना उनकी राजनीतिक  विवशता या रणनीति का हिस्सा माना जाना चाहिए। लोकसभा चुनाव के बाद लंबे समय तक उन्होंने मीडिया के साथ किसी तरह का संवाद स्थापित करना जरूरी नहीं समझा। बाद में चार किश्तों में भाजपा की विचारध्रारा से जुड़े व अन्य चुनिंदा पत्रकारों और समाचार पत्रों के मालिकों से अनौपचारिक मुलाकातों में सवालों के जवाब दिए। प्रधानमंत्री पद पर आसीन होने के बाद मोदी ने एक बार भी पत्रकारों के सवालों का औपचारिक सामना नहीं किया है। यह रवैया उस भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री का है, जो मीडिया को प्रजातंत्र का चौथा मजबूत स्तम्भ  मानती है। भारतीय मीडिया की परिपक्वता व बचकानेपन को लेकर कई स्तरों पर वाजिब सवाल उठाए जा सकते हैं, लेकिन उसे पूरी तरह से रिजेक्ट करना किसी भी रूप में उचित नहीं है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सोशल मीडिया, मन की बात व विदेशों में अनिवासी भारतीयों के सामने दुनिया भर के विषयों पर विस्तार में मोनोलॅाग करते हैं, लेकिन पत्रकारों के सवालों का सामना करने से कतराते हैं। उनके व्यक्तिव को समझने के लिए यह जानना ही पर्याप्त है कि वे किन विषयों पर चुप्पी साधे हुए हैं। मोदीजी का असली चेहरा उनकी चुप्पी में छुपा हुआ है। देश के प्रधानमंत्री में, पत्रकारों के किसी भी बचकाने या बुद्धिमत्तापूर्ण सवाल का जवाब देने की क्षमता होनी चाहिए। इस मामले में वे अपने पूज्यनीय नेता व पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी से बहुत कुछ सीख सकते हैं। यह सोच अलोकतांत्रिक है कि भारी बहुमत से जीतने के बाद वे सभी सवालों से परे हो चुके हैं। पत्रकारों को भी चाहिए कि वे मोदीजी के साथ सेल्फी खींचवाने की बजाय उनको सवालों के कटघरे में खड़ा करने की कोशिश करें।

देश का प्रधानमंत्री यदि आत्मविश्‍वास के साथ सार्वजनिक रूप से अप्रिय सवालों का जवाब देता है तो देश व विदेश में इसका एक सकारात्मक संदेश भी जाता है। इस मामले में आम आदमी पार्टी के नेता व दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को आदर्श के रूप में देखा जा सकता है। केजरीवाल जनता व मीडिया के साथ सीधा संवाद स्थापित करके कठिन निर्णयों को भी लागू करने में सफल हो जाते हैं। ब्यूरोक्रेसी के स्तर पर ही नहीं, राजनीतिक नेतृत्व के स्तर पर भी पारदर्शिता की जरुरत है। दिल्ली की राजनीति में केजरीवाल ने इस बात को प्रमाणित किया है कि मोदी ब्रांड की राजनीतिक सीमाएं व कमजोरियां क्या है? मोदीजी को इस भ्रम से मुक्त होना चाहिए कि दुनिया का सारा ज्ञान उनमें समाहित हो गया है और हर सवाल का जवाब उनके पास है। राजनीतिक चतुरता एक सीमा तक ही सफल हो सकती है। एक हिन्दी कवि की पंक्तियां है कि ‘चतुरता अंतत: मूर्खता ही है’। संवाद के माध्यम से ही मोदीजी अपने विकास के एजेंडे को सफलता के मुहाने तक ले जा सकते हैं। मोनोलॅाग का रास्ता आत्ममुग्धता (मेगेलोमेनिया) की तरफ ले जाएगा।

 

 

 

 

 

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