यूपी में साढ़े तीन मु‍ख्यमंत्रियों का योग

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उत्तर प्रदेश में साढ़े तीन मुख्‍यमंत्री का जुमला छेड़कर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने राज्य के कड़वे राजनीतिक माहौल में नई रंगत ला दी है। शाह ने बाराबंकी में राज्य की अखिलेश सरकार को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि जब तक समाजवादी पार्टी सत्ता में रहेगी, यूपी का विकास नहीं हो सकता।  उन्होने कहा कि दिल्ली से मोदी सरकार धन भेजती है, लेकिन वह लोगों को तक नहीं पहुंचता। क्योंकि यूपी  देश का अकेला राज्य है, जहां एक नहीं पूरे साढ़े तीन मुख्यमंत्री राज करते हैं। इतने मुख्यमंत्रियों के बीच राज्य का विकास फंसा हुआ है। शाह ने इसका ब्रेक-अप देते हुए कहा  कि पहले मुख्यमंत्री खुद अखिलेश, दूसरे मुख्‍यमंत्री उनके पिताश्री मुलायमसिंह यादव, तीसरे मुख्‍यमंत्री अखिलेश के दो चाचा रामगोपाल और शिवपाल तथा आधे मुख्यमंत्री आजम खान हैं। एक तरफ सरकार में इतने मुख्‍यमंत्री हैं, वहीं समाजवादी पार्टी मुख्तार अंसारी जैसे गुंडों से भरी पड़ी है। शाह ने कहा कि इन सबसे मुक्ति पानी  हो तो भाजपा को सत्ता सौंपनी होगी।

यूपी की जनता शाह की बात को कितनी गंभीरता से लेगी, कहना मुश्किल है, लेकिन उन्होने साढ़े तीन का आंकड़ा देकर अपनी हिंदू मानसिकता का संदेश भी दिया है। सनातन धर्म में ‘साढ़े तीन’ का महत्व शुरू से रहा है। हांलाकि यह साढ़े तीन ही क्यों, पूरे तीन या चार क्यों नहीं, यह सवाल अभी भी अनुत्तरित है। ज्योतिषि मानते हैं कि वर्ष में साढ़े तीन मुहूर्त ऐसे हैं, जिनमें कोई ज्योतिष दोष नहीं होता। इन दिनों में शुभ कार्य के लिए पंचांग देखने की जरूरत नहीं है। इन्हे सिद्ध मुहूर्त कहा जाता है। ये साढ़े तीन मुहुर्त हैं-विजयदशमी, वर्ष प्रतिपदा, अक्षय तृतीया और आधा मुहूर्त यानीबलि प्रतिपदा। महाराष्ट्र में तो साढ़े तीन देवियों का भी महत्व है। ये शक्ति पीठ हैं तुलजा भवानी, रेणुका देवी, महालक्ष्मी तथा सप्तश्रृंगी देवी।

मराठा इतिहास में साढ़े तीन सयानों की अलग कहानी है। पेशवाअों के उत्तर काल में एक दौर ऐसा भी आया, जब राज्य संचालन पेशवा की जगह सयानों की एक कौंसिल करती थी। ये साढ़े तीन सयाने थे- सखाराम बापू बो‍कील,‍ विट्ठल सुंदर, देवाजी पंत चोरघड़े तथा नाना फडणवीस। नाना फडणवीस को आधा सयाना माना जाता था। क्योंकि वे शास्त्र में पारंगत थे, लेकिन शस्त्र में कमजोर थे। बाकी सयाने दोनो में महारत रखते थे। यह बात अलग है कि इन साढ़े तीन सयानों की आपसी प्रतिस्पर्धा ने पेशवाअों के साम्राज्य को गर्त  में पहुंचा दिया।

अमित शाह को लगता है कि यूपी में भी ‘साढ़े तीन मुख्यमंत्रियों की सरकार’ भी उसी दिशा में जाने वाली है। पांच सालों में यूपी प्रशासन ठीक से समझ नहीं पाया कि उसे किससे आदेश लेना है या किसका आदेश मानना है। लोग बिहार में ‘जंगल राज’ की बात करते हैं, लेकिन यूपी में तो धड़ल्ले से ‘अंकल राज’ चल रहा है। एक पैबंद लगाता है, दूसरा उसी में पलीता लगा देता है। नेताजी यानी मुलायमसिंह का ज्यादातर वक्त इन विवादों को बुझाने और खुद की अहमियत बनाए रखने में जाता है। इस घरेलू महाभारत में अखिलेश की भूमिका अर्जुन जैसी है, जिसके कृष्ण बदलते रहते हैं। जबकि आजम खान का काम हर काम में लंगड़ी मारना और विवादों का अलाव जलाए रखने का है। इन सभी में समानता है कि ये किसी भी मामले में एकमत नहीं होते। सवाल यह है कि अगर विस चुनाव में यूपी में साढ़े तीन सीएम हट भी जाएंगे तो बदले में कितने आएंगे, कहना मुश्किल है। क्योंकि खुद भाजपा में भी ऐसी ही स्थिति है। अभी तो पार्टी सीएम कै‍ंडिडेट तय ही नहीं कर पाई है, अगर सत्ता मिली तो हो सकता है कि साढ़े तीन में दो का गुणा करना पड़े।

 

 

 

 

 

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