राकेेश दीवान का नजरिया : राजन की विदाई का अर्थ

एक जमाने में भारतीय राजनीति के ‘पुच्‍छल तारा’ कहे जाने वाले सुब्रमण्‍यम स्‍वामी भले ही अपनी पीठ ठोंक रहे हों कि उन्‍होंने कोई ऐरे-गैरे नहीं, साक्षात केंद्रीय बेंक यानि रिजर्व बेंक के मुखिया को हटाकर दम लिया है, लेकिन जानने वाले जानते हैं कि यह सब स्‍वदेशी का भजन गाकर सत्‍तानशीन हुई उसी सरकार के इशारे पर हुआ है जिसे रघुराम राजन के जाने के अनेक फायदे दिखाई दे रहे हैं। राजनीति के गलियारों में कहा भी जा रहा है कि राजन तो केवल एक बहाना हैं, असल निशाना तो खुद वित्‍तमंत्री अरुण जेटली हैं।

विदेशी खासकर अमरीकी हितों को तरजीह देने के कथित आरोपी होने के नाते गरियाए गए रघुराम राजन की असली गलतियां क्‍या थीं? एक तो उन्‍होंने मौजूदा सरकार की ‘सकल घरेलू उत्‍पाद’ उर्फ जीडीपी की गणना को फर्जी बताते हुए उसे आंकडों की बाजीगरी बताया था। लेकिन यह तो ‘अंतर्राष्‍ट्रीय मुद्रा कोष’ यानि आईएमएफ समेत कई अंतरराष्‍ट्रीय वित्‍तीय सेवा कंपनियां अपने-अपने अध्‍ययनों के आधार पर कह रही हैं। ऐसी ही एक कंपनी ‘एंबिट’ के मुताबिक भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था 2014-15 के बाद से सुस्‍त पडी है और 14-15 तथा 15-16 में जीडीपी के क्रमश: 7.2 फीसदी और 7.6 फीसदी के आंकलन फर्जी हैं। वर्ष 2015-16 की दूसरी तिमाही में जीडीपी 6.2 फीसदी थी जबकि नए सरकारी अनुमान के अनुसार वह 7.7 फीसदी बताई गई। यही हाल तीसरी तिमाही में भी हुआ जब 5.4 फीसदी को 7.3 फीसदी बताया गया।

गरीबी रेखा की तरह विकास रेखा को फर्जी बताने और ‘मेक इन इंडिया,’ किंगफिशर के मालिक विजय माल्‍या आदि पर समीक्षात्‍मक टिप्‍पणी करने के अलावा राजन ने अपने कार्यकाल में सबसे बडे, जरूरी और सालों से जानबूझकर टाले जाते रहे बेंकों के ‘डूबत खाते’ को दुरुस्‍त करने का काम किया है। उन्‍होंने ‘रिजर्व बेंक’ की अगुआई में बेंकों की सेहत सुधारने की मुहीम चलाकर आम लोगों की मेहनत-मजूरी से जमा हुई रकम को वापस लाने और वापस न देने वालों पर कडी कार्रवाई करने की पहल की है। कर्ज लेकर जीम जाने की ये हरकतें दुबारा इस बडे पैमाने पर न हो सकें इसलिए कुछ कानूनों के बदलाव की बात भी राजन के नेतृत्‍व में ही की गई।

सरकार और वित्‍त मंत्रालय की आंख की किरकिरी बना राजन का तीसरा सबसे बडा ‘अपराध’ था-सस्‍ते कर्जों के लिए ब्‍याज दरों को सरकार के मुताबिक नहीं घटाना। राजन मानते हैं कि ब्‍याज दरें घटाने के लिए मंहगाई और ‘डूबत खातों’ समेत पूरी अर्थव्‍यवस्‍था की हालत दुरुस्‍त होना चाहिए, लेकिन सरकार इसे विकास में भारी अडंगा मानती है। वित्‍त मंत्रालय के अनुसार ब्‍याज दर घटेगी तो कर्ज सस्‍ते होंगे और नतीजे में सुस्‍त पडे बाजार में फिर उछाल आ जाएगा। राजन और इस अर्थनीति में हलका-फुलका दखल रखने वाले जानते हैं कि ब्‍याज दरों को घटाकर किसका मुनाफा बढाया जाएगा। अलबत्‍ता सरकार भर नहीं जानती या जानना नहीं चाहती कि सस्‍ते कर्ज होने से बेंकों के क्‍रोडों के नए कर्ज ‘डूबत खातों’ में तब्‍दील हो जाएंगे। पिछले अनेक सालों के आंकडे बताते हैं कि बार-बार ‘डूबत खातों’ की वजह से बेंकों की बदहाली की चेतावनियों के बावजूद उद्योग क्षेत्र के नामी-गिरामी खिलाडियों ने कर्ज लौटाने में कोई उत्‍सुकता नहीं दिखाई है।

लेकिन क्‍या राजन और उनके ‘पर कतरने’ में लगी सरकार डूबने को अभिशप्‍त इस अर्थनीति को अनदेखा करके किसी भी तरह की ‘विकास रेखा’ खींच पाएंगे? अभी हाल के दो उदाहरण काबिल-ए-गौर हैं। पहला तो पिछले चार महीनों से जारी फ्रांस के मजदूरों का तीखा आंदोलन है जिसमें दो दिन पहले खुद पुलिस ने आंदोलनकारियों से अपना आंदोलन कुछ दिन के लिए मुल्‍तवी करने का आग्रह करते हुए कहा है कि इस तरह वे और पुलिस अपनी-अपनी थकान मिटा सकेंगे। जाहिर है, जबाव में मजदूरों ने आंदोलन के अपने हक की बात की, लेकिन फ्रांस की समाजवादी सरकार द्वारा श्रम कानूनों को उद्योग-हितैषी बनाने के खिलाफ गोलबंद हुए मजदूरों का असली संकट आखिर क्‍या है?

फ्रांस दुनिया का ऐसा एकमात्र बचा-खुचा देश है जिसमें मजदूरों की हैसियत सम्‍मानजनक मानी और बरती जाती है। उन्‍हें अपनी दो पालियों के बीच 11 घंटों का समय देना अनिवार्य है और किसी विशेष परिस्थिति में ओवर टाइम करने पर भरपूर मुआवजा मिलता है। ऐसे मजदूरों को इन दिनों बेरोजगारी का सामना करना पड रहा है। यहां तक कि फ्रांस का सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण लोहा उद्योग बेहतर रोजगार शर्तों के चलते चीन चला गया है जहां अपेक्षाकृत कमजोर श्रम कानून हैं। लब्‍बे-लुआब यह कि मजदूरी की बेहतर शर्तें मौजूदा विकास को आगे नहीं बढने देती, इसके लिए घटिया हालातों में कम मजदूरी पर हाडतोड मेहनत करना होती है।

दूसरा उदाहरण आज ही आए ग्रेट ब्रिटेन के फैसले का है जिसमें वहां के नागरिकों ने ‘यूरोपियन यूनियन’ से बाहर निकलने का तय किया है। करीब 43 साल पहले बाकायदा मर्दुमशुमारी की मार्फत ‘यूरोपियन यूनियन’ में शामिल हुए ग्रेट ब्रिटेन को अब आखिर कौन-सी आफत ने घेर लिया है कि वह 28 देशों के इस जमावडे से बाहर होना चाहता है? क्‍या उन्‍हें भी लगता है कि ‘यूरोपियन यूनियन’ पूंजी और मुनाफे की खातिर खडा किया गया ढांचा भर था जिसे अब तोडना ही होगा? अर्थशास्त्रियों, समाजशास्त्रियों के इस पर तरह-तरह के तर्क हैं, लेकिन आम लोग तो मौजूदा आर्थिक नीतियों के चलते पडौसी देश ग्रीस उर्फ यूनान की बदहाली को देख, समझ रहे हैं। यूरोप की समूची संस्‍कृति, कला, राजनीति, साहित्‍य को निर्णायक दिशा देने वाले सुकरात, अरस्‍तू, सिकंदर जैसे महान दार्शनिकों, योद्धाओं के देश में आज सब कुछ बिकाऊ है। मौजूदा आर्थिक और विकास नीतियों के चलते ग्रीस में आज सरकारी, सार्वजनिक कही जाने वाली कोई भी वस्‍तु, स्‍थान, सुविधाएं अपनी-अपनी कीमतों की चिप्‍पी चिपकाए खडी हैं ताकि उन्‍हें बेचकर देश के नागरिक अपने लिए रोटी, कपडा और मकान की जरूरत पूरी कर सकें।

नोबल पुरुस्‍कार प्राप्‍त अर्थशास्‍त्री डॉ.अर्मत्‍य सेन द्वारा ‘दुनिया के श्रेष्‍ठ अर्थशास्त्रियों में से एक’ की हैसियत के माने गए डॉ. रघुराम राजन हों या दुनियाभर में दुंदुभी बजाती फिर रही हमारी सरकार, देश का ‘निर्वाण’ तो वे दोनों उन्‍हीं विकास नीतियों के भरोसे करना चाहते हैं जिनका खामियाजा ग्रीस, ग्रेट ब्रिटेन और फ्रांस समेत समूचा यूरोप भुगत रहा है। क्‍या आम लोगों की बेहतरी के लिए इसके अलावा कुछ और देखने, समझने का अब तक कोई वक्‍त नहीं आया है? कहते हैं, समझदार ‘दीवार पर लिखा’ बांच लेते हैं, लेकिन हमारे राजनेताओं और नीति-नियंताओं को उनके स्‍वार्थों ने इतना दृष्टिहीन कर दिया है कि अब मर्दानगी बढाने के विज्ञापनों के अलावा दीवार पर कुछ और पढ ही नहीं पाते।

                  

 

                         

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