लोकतन्त्र का समीकरण : दोनों हाथ साथ ही धुलते हैं – विष्‍णुु बैरागी

1965  का भारत-पाकिस्तान युद्ध कोई नहीं भूल सकता। न हम, न पाकिस्तान। उस समय शास्त्रीजी प्रधान मन्त्री थे। अनेक प्रतिकूलताओं और अभावों के बीच भारतीय सेना ने वह युद्ध जीता था। सेना और भारतीय जन मानस को यह जीत समर्पित करते हुए शास्त्रीजी ने ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा दिया था। तब हम खाद्यान्न के मामले में आत्म-निर्भर नहीं थे। अमरीका का मुँह देखते थे। अमरीका पाकिस्तान के साथ था। उसने खाद्यान्न आपूर्ति रोकने की धमकी दी। इससे निपटने के लिए शास्त्रीजी ने देश के लोगों से मदद माँगी और प्रति सोमवार (एक समय भोजन करने का) व्रत लेने का आह्वान किया। व्रत की शुरुआत शास्त्रीजी ने खुद से की। शास्त्रीजी के इस आह्वान को पूरे देश ने सर-माथे लगा कर स्वीकार किया। जन-जन की भागीदारी से किसी राष्ट्रीय संकट का सामना करने का यह अनूठा उदाहरण था। पचास बरस से अधिक के बाद, आज भी अनेक लोग ‘शास्त्री सोमवार’ करते मिल जाएँगे।
यही युद्ध जीतने के बाद शास्त्रीजी को, पाकिस्तान से वार्ता के लिए ताशकन्द जाना था। तैयारी करते हुए अपने कपड़ों में उन्हें एक फटी धोती रखते देख परिजनों और परिचारकों ने टोका और दूसरी ‘ढंग-ढांग’ की धोती रखने की सलाह दी। शास्त्रीजी ने कहा कि देश के अनगिनत लोग फटी धोती पहन रहे हैं और उनसे भी अधिक लोगों के पास तो पहनने के लिए पूरे कपड़े ही नहीं हैं। ऐसे में वे भला ‘ढंग-ढांग’ की धोती के बारे में सोच भी कैसे सकते हैं? वे वही फटी धोती लेकर गए।
इससे पहले, नेहरूजी के समय केन्द्रीय मन्त्री होते हुए भी शास्त्रीजी रेल के साधारण डिब्बे में सफर किया करते थे। सफर के दौरान वे सरकार के और अपने विभाग के बारे में लोगों की राय जानते रहते थे। कोई निजी सचिव या सरकारी अमला साथ में नहीं होता। लोगों की शिकायतें/समस्याएँ/सुझाव, उनके नाम-पते खुद ही लिखते थे और दिल्ली पहुँच कर जो कार्रवाई करते, उसकी जानकारी सम्बन्धितों को पत्र के जरिए देते थे। वे अपनी बात नहीं कहते थे, कोई उपदेश नहीं देते थे, लोगों से आग्रह, अपेक्षा नहीं जताते थे। खुद चुप रहते और लोगों की बात सुनते थे।
लोगों से जुड़ाव के मामले में गाँधी आज तक ‘अनुपम और इकलौते’ बने हुए हैं। उनके तमाम चित्रों में वे ‘अधनंगे’ ही नजर आते हैं-कमर से ऊपर निर्वस्त्र और घुटनों तक की धोती पहने हुए। अपने गुरु गोपाल कृष्ण गोखले के कहने से, भारत को जानने के लिए वे जब देशाटन पर निकले थे तो पारम्परिक काठियावाड़ी पोषाख (माथे पर खूब मोटा साफा, घेरदार अंगरखा और धरती छूती धोती) पहने हुए थे। लेकिन यात्रा के दौरान ही वे ‘अधनंगे’ हो गए। दक्षिण भारत के एक गाँव में उन्हें मालूम हुआ कि एक परिवार में तीन महिलाएँ हैं लेकिन वे तीनों चाहकर भी गाँधीजी की प्रार्थना सभा में एक साथ नहीं आ पा रहीं। पूछताछ करने पर मालूम हुआ कि उन तीनों के बीच एक ही साड़ी है जिसे वे बारी-बारी से पहनती हैं। सुनकर गाँधीजी ने उसी दिन से पूरे कपड़े पहनना बन्द कर दिया। एक, अधूरी धोती को अपनी पोषाख बना लिया और आजीवन इसी स्वरूप में बने रहे।
उसी समय-काल में भारत ने विनोबा नामक एक और ‘लोक पुरुष’ को देखा। वे सम्भवतः अब तक के एकमात्र भारतीय होंगे जिन्होंने पूरे भारत को अपने पाँवों नापा। उनके कहने पर देश के अनेक भूमिपतियों, जागीरदारों, जमीदारों ने अपनी हजारों एकड़ जमीन विनोबा के ‘भूदान यज्ञ’ की समिधा बना दी।
सन् 1954 की इस घटना का तो मैं खुद साक्षी हूँ। उस समय मेरी उम्र आठ साल भी नहीं थी। गाँधी सागर बाँध का शिलान्यास करने के लिए जाते समय जवाहरलालजी की एक आम सभा मेरे गाँव मनासा के ऊषागंज में हुई थी। वे क्या बोले, न तो उस समय समझ थी न इस समय याद है। बस! इतना याद है कि बहुत ऊँचा मंच बना था और काँटेदार तारों की बागड़ जैसी घेराबन्दी कर लोगों के बैठने की जगह बनाई गई थी। लेकिन भाषण देते-देते जवाहरलालजी अचानक ही तेजी से उतरे और काँटेदार तारोेंवाले दो खम्भों को उखाड़ फेंका। उनकी शेरवानी फट गई। पुलिसवाले और दूसरे लोगों ने दौड़कर उन्हें पकड़ा और कार में बैठाया। बाद मालूम हुआ कि वे काँटेदार तार देख कर गुस्सा हुए थे। कह रहे थे कि उनके और उनके लोगों के बीच ऐसे काँटेदार लगाने की बेवकूफी और जुर्रत किसने, कैसे, क्यों की।
ये सब वे लोग थे जिनके पीछे देश के लोग खुद को, अपना सब कुछ भूल कर चल देते थे। इनके कहे को सर-माथे चढ़ाते थे। लोगों को भरोसा था कि ये लोग खुद के लिए नहीं, देश और लोगों के भले के लिए निस्वार्थ भाव से जी रहे हैं।
लेकिन इन सब बातों का आज क्या मतलब? क्या सन्दर्भ? दरअसल एक समाचार पढ़कर ये सारी बातें एक के बाद एक याद आ गईं। समाचार था कि देश में दालों की कमी दूर करने के लिए हमारी सरकार अफ्रीकी देश मोजाम्बिक से सम्पर्क कर रही है। एक अखबार ने तो वहाँ कुछ जमीन लीज पर लेने की बात भी कही। यही समाचार पढ़कर ये सब बातें याद आ गईं। कल तक अमरीकी लाल गेहूँ के लिए झोली फैलानेवाले हम वह देश हैं जिसने पहले हरित क्रान्ति का और बाद में श्वेत क्रान्ति का अजूबा कर दिखाया। लेकिन हमारे नेताओं की पुण्याई इतनी भी नहीं रह गई कि ऐसे संकट के समय वे लोगों से ‘त्याग’ करने का आग्रह कर सकें? निश्चय ही केवल इसलिए कि इसके लिए जो नैतिक साहस और आचरणगत शुचिता चाहिए होती है, वह हमारे नेताओं में दूर-दूर तक नजर नहीं आती। रक्षा मन्त्री मनोहर पर्रीकर ने एक समय भोजन करने का विचार दिया भी तो इतनी अगम्भीरता, इतनी आत्मविश्वासहीनता से कि वह समाचार माध्यमों में यथेष्ट जगह ही नहीं पा सका। कारण? हमारे नेता अपनी असलियत खूब अच्छी तरह जानते हैं। अपनी अपील पर एक करोड़ लोगों द्वारा गैस सबसिडी छोड़ने का उल्लेख हमारे प्रधानमन्त्री जब अपनी उपलब्धि की तरह करते हैं तो मुझे ताज्जुब होता है। इससे कई गुना अधिक तो उनकी पार्टी की सदस्य संख्या होने का दावा किया जाता है!
यह दरिद्रता भला क्यों कर आ गई? देश के तमाम दलों के तमाम नेताओं की यह दशा क्यों कर हो गई? नेता तो ‘वे’ भी थे और नेता तो ‘ये’ भी हैं? टैक्स तो ‘वे’ भी लेते थे और ‘ये’ भी ले रहे हैं? उनकी बात सब क्यों मानते थे और आज के नेताओं की क्यों नहीं? निश्चय ही इसलिए कि  ‘उन्होंने’ कभी भी खुद को राजा या शासक नहीं माना। किलों-महलों में कैद होकर नहीं बैठे रहे। ‘वे’ खुद चल कर सड़कों, पगडण्डियों पर आए, लोगों से मिले, उनके जैसे बने, धूल-मिट्टी में सने। उन्होंने दुहाइयाँ नहीं दीं, अपना किया नहीं गिनवाया, सदैव इसी संकोच में रहे कि वे जितना कुछ कर सकते थे, उतना नहीं कर पाए। उन्होंने कभी भी अपने ‘पूर्ण’ होने की गर्वोक्तियाँ नहीं की, सदैव खुद को अपूर्ण ही माना। वे अपनी हाँक कर, अपनी कह कर नहीं रह गए। उन्होंने अपनी या तो कही ही नहीं और कही तो बहुत कम। लोगों की अधिक सुनी-समझी-गुनी।
पूँजी को मिल रही निर्लज्ज, अशोभनीय और आपराधिक प्रमुखता के बावजूद यह देश भले और भोले लोगों का देश है। लोग सुनते भी हैं और मानते भी हैं। लेकिन भले और भोले होने का अर्थ मूर्ख होना कभी नहीं होता। वे उसी पर अपना सर्वस्व न्यौछावर करते हैं जो अपना ‘स्व’ उनमें विसर्जित कर दे। मालवी की कहावत है – ‘राखपच तो रखापच।’ तुम मेरी (बात का मान) रखो, मैं तुम्हारी (बात का मान) रखूँ। दोनों हाथ साथ ही धुलते हैं। लोग तभी सुनते हैं, जब लोगों की सुनी जाए। लोकतन्त्र का समीकरण बहुत ही सीधा -सपाट, सहज-सरल है: लोगों के मन की सुनो, मानो और अपने मन की सुनाओ, मनवाओ।
(लेखक विष्‍णु बैैरागी सवेरे के स्‍तम्‍भकार हैं।)

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