सुरेश बाफना का नजरिया : जेटली पर स्‍वामी के तीर

जब डा. सुब्रमण्यम स्वामी ने रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन को अपना निशाना बनाया था, तब ही स्पष्ट था कि उनका मुख्य निशाना वित्त मंत्री अरुण जेटली ही है। डा. स्वामी ने मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम व आर्थिक मामलों के सचिव शक्तिकांत दास के खिलाफ खुला मोर्चा खोलकर मोदी सरकार के भीतर जारी शीतयुद्ध को सार्वजनिक कर दिया है। डा. स्वामी का कहना है कि उनके पास 27 ऐसे वरिष्ठ अधिकारियों की सूची है, जो अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत के हितों के खिलाफ काम कर रहे हैं। इतना ही नहीं उन्होंने जेटली का नाम लिए बगैर उनकी वेषभूषा पर यह टिप्पणी कर दी कि टाई-सूट में वे वेटर की तरह दिखाई देते हैं। डा. स्वामी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को सुझाव दिया है कि विदेश यात्रा पर जानेवाले मंत्रियों को निर्देश दे कि वे अनिवार्य तौर पर भारतीय वेषभूषा ही पहनें। उधर अरुण जेटली ने डा. स्वामी को सलाह दी है कि वे अनुशासन की परिधि में रहें और संयत भाषा का इस्तेमाल करें। जवाबी हमला करते हुए डा. स्वामी ने कहा कि यदि उन्होंने अनुशासन तोड़ा तो पार्टी के भीतर खून-खराबा हो जाएगा। उनका कहना है कि जेटली क्या कहते हैं और क्या नहीं कहते हैं, इससे उनको कोई फर्क नहीं पड़ता, मैं तो सीधे प्रधानमंत्री व पार्टी अध्यक्ष से बात करता हूं। डा.स्वामी और जेटली के बीच चल रहे इस संवाद का अर्थ यह है कि मोदी सरकार में शीर्ष स्तर पर सत्ता संघर्ष शुरू हो गया है। यह बात किसी से छुपी नहीं है कि मोदी और जेटली के असहमति के बावजूद राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के दबाव में आकर डा. स्वामी को राज्यसभा का मनोनीत सदस्य बनाया गया था। मोदी सरकार व भाजपा के भीतर संघ का ऐजेंडा लागू करने की विशेष जिम्मेदारी डा. स्वामी को दी गई है। वित्त मंत्रालय के अधिकारियों के खिलाफ टिप्पणियां करके उन्होंने वित्त मंत्री अरूण जेटली के लिए अप्रिय स्थिति निर्मित कर दी है। आश्चर्य की बात यह है कि इतना सब होने के बावजूद भाजपा अध्यक्ष व वरिष्ठ नेताअों ने अभी तक इस पर कोई टिप्पणी करना जरुरी नहीं समझा। खून-खराबे की बात कर डा.स्वामी ने यह संकेत भी दिया है कि उनके पास जेटली के खिलाफ भी विस्फोटक मसाला है।

पिछले दो साल के दौरान मोदी सरकार व संघ परिवार के बीच रिश्ते सामान्य बने रहे, लेकिन स्वदेशी जागरण मंच से जुड़े नेता मोदी सरकार की आर्थिक नीति से पूरी तरह सहमत नहीं है। हाल ही में रक्षा सहित कई क्षेत्रों में 100 प्रतिशत विदेशी निवेश की अनुमति दिए जाने का निर्णय भी संघ के नेताअों को रास नहीं आया है। संघ नेताअों का कहना है कि मोदी सरकार यूपीए सरकार की नीतियों को ही आगे बढ़ा रही है। डा. स्वामी यह सवाल कर रहे हैं कि मोनटेक सिंह अहलूवालिया और मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों में क्या अंतर है? इस सवाल का जवाब वित्त मंत्री अरूण जेटली के पास नहीं है। मोदी सरकार रोजगार सृजन के मोर्चे पर बुरी तरह विफल रही है। संघ नेता इस बात से परेशान है कि अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के सवाल पर मोदी सरकार एक इंच आगे नहीं बढ़ पाई है। डा. स्वामी ने घोषणा की थी कि इस साल के अंत में राम मंदिर के निर्माण का काम शुरू हो जाएगा। इसलिए यह माना जा रहा है कि डा. स्वामी ने वित्त मंत्रालय के अफसरों के खिलाफ जो अभियान शुरू किया है, उसे संघ के कई वरिष्ठ नेताअों का समर्थन प्राप्त है। संघ के कई नेता इस बात से भी नाखुश है कि नरेन्द्र मोदी ने भाजपा को पूरी तरह अपने कब्जे में कर लिया है और समूची सत्ता उनके भीतर समाहित हो गई है। गृह मंत्री राजनाथ सिंह व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज नाम के मंत्री है और उनके मंत्रालयों का संचालन प्रधानमंत्री कार्यालय से होता है। संघ के नेता इस बात से भी परेशान हैं कि कई साल विदेशों में रहनेवाले लोगों को महत्वपूर्ण पदों पर बिठाया गया है़, जो देश की समस्याअों के बारे में पूरी तरह नहीं जानते हैं। डा. स्वामी ने रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन पर आरोप लगाया था कि उनकी नीतियों की वजह से विदेशी निवेशकों को फायदा मिला है और भारत के उद्योगों को नुकसान पहुंचा है।

डा. स्वामी के इन आरोपों को हवा में नहीं उड़ाया जा सकता है। एक तरह से इन आरोपों के छींटें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तक भी पहुंचते हैं। भाजपा व सरकार के स्तर पर एकछत्र नेता बनने के बाद पार्टी के भीतर पहली बार नरेन्द्र मोदी को निशाना बनाने की कोशिश की जा रही है। यह साफ दिखाई दे रहा है कि पार्टी व सरकार के स्तर पर सामूहिक नेतृत्व के सिद्धांत को फिर से स्थापित करने का प्रयास हो रहा है। जेटली के समर्थक नेताअों की तरफ से मांग की जा रही है कि डा. स्वामी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए, लेकिन यह मांग कोई भी खुलकर करने के लिए तैयार नहीं है। इसका अर्थ यही है कि डा. स्वामी जो कुछ भी कर रहे हैं, उसके पीछे संघ के वरिष्ठ नेताअों की सहमति है। नरेन्द्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब स्थानीय संघ के नेताअों के साथ उनके संबंध काफी तनावपूर्ण होते थे। सभी जानते है कि राजनीतिक विवशता के तहत ही संघ ने मोदी को प्रधानमंत्री पद के लिए स्वीकार किया था। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि मोदी और संघ के बीच रिश्ते सामान्य है। आर्थिक नीतियों के सवाल पर संघ हमेशा स्वदेशीकरण के पक्ष में रहा है, वही मोदी वैश्वीकरण के सबसे बड़े समर्थक बन गए हैं। संघ को लगता है कि मोदी चतुरता के साथ हिन्दुत्व की बात जरूर करते हैं, लेकिन उनके इस एजेंडे को आगे बढ़ाने में सफल नहीं हुए हैं। इस संदर्भ में डा. स्वामी के बयानों को भाजपा के भीतर उत्सुकता के साथ देखा जा रहा है।

 

 

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