दिशाबोध कराती लघुकथाएं

कृष्णलता यादव
समाज सेवा व स्वतन्त्र लेखन में व्यस्त रहने वाले रक्तदान प्रणेता मधुकांत का नाम हिन्दी लघुकथा-लेखन में बहुपठित व बहुचर्चित है। इनके 12 एकल लघुकथा संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं, जिनमें 4 संग्रह एकल विषयों पर आधारित हैं। वैसे इनकी कलम विविध विधाओं की 72 से अधिक पुस्तकों द्वारा हिन्दी साहित्य की समृद्धि में योगदान दे चुकी है। इनकी कई कृतियां राजस्थानी, पंजाबी और अंग्रेजी भाषा में अनूदित हुई हैं।

समीक्ष्य कृति ʻमधुकांत की 66 लघुकथाएं और उनकी पड़तालʼ मधुदीप द्वारा संपादित है। पड़ाव और पड़ताल शृंखला की इस 23वीं कड़ी में मधुकांत की 66 चुनींदा लघुकथाएं और उनकी पड़ताल सम्मिलित है। लेखक ने 1978 में अपने बचपन के दोस्त मधुदीप के साथ मिलकर लघुकथा- लेखन कार्य आरम्भ कर 1980 में ‘ʻतनी हुई मुट्ठियां’ʼ नामक लघुकथा संग्रह संपादित-प्रकाशित करवाया।

पड़ताल खण्ड में मिथिलेश कुमारी मिश्र, डॉ. पुष्पा जमुआर, डॉ. सत्यवीर मानव और प्रो. रामसजन पाण्डेय के सुदीर्घ, दीर्घ व संक्षिप्त आलेख शामिल हैं। मिथिलेश कुमारी के मतानुसार, ʻमघुकांत उन लेखकों में से हैं जो बहुत ही संवेदनशील हैं और समाज में आंख-कान खोलकर चलते हैं। उन्होंने संख्यात्मक एवं गुणात्मक दोनों दृष्टियों से रचनाएं लिखी हैं औऱ पाठकों के हृदय में स्थान बनाया है।ʼ (पृष्ठ 127). डॉ. पुष्पा जमुआर का विचार है, ʻमधुकांत की लघुकथाओं में विषय वैविध्य है। इनमें उत्तर आधुनिकतावाद, पर्यावरण, बाजारवाद, आतंकवाद, सैनिकों की भूमिका, बदलती अर्थनीति व राजनीति, नारी शक्ति के बदलते परिणाम, दलित चेतना के वर्तमान स्वर या इसी प्रकार के अनेकानेक विषय हैं, जिन पर श्रेष्ठ एवं अलग-अलग कोणों की प्रत्यक्षदर्शी बनती लघुकथाएं होनी चाहिए थीं। खैर, 66 लघुकथाओं में अधिकांश ऐसी हैं जिनकी सराहना लघुकथा-जगत में होनी चाहिए।ʼ (पृ. 155, 156).

डॉ. सत्यवीर मानव के शब्दों में, ʻमधुकांत ने समाज के हर स्याह-सफेद बिन्दु को देखा है और अपनी लेखनी से सफलतापूर्वक उन्हें उकेरा है। चाहे पारिवारिक और दाम्पत्य जीवन के खट्टे-मीठे अनुभव हों अथवा किसी दलित-शोषित से जुड़े बिन्दु, लघुकथाकार का संवेदनशील हृदय उनसे उद्वेलित हुआ है। ये लघुकथाएं कथ्य की दृष्टि से ही समृद्ध नहीं हैं, शिल्प की दृष्टि से भी सुदृढ़ हैं।ʼ (पृ. 164, 166). प्रो. रामसजन पाण्डेय का मानना है, ʻमधुकांत की लघुकथाओं की समूची चेतना को पकड़कर कहा जा सकता है कि लेखक के दिल में एक ऐसा कथाकार बैठा है जो घटित जीवन व्यापार, घटना व्यापार व परिवेश व्यापार को बड़ी बारीकी के साथ देखता है, फिर उसके शब्दों व शब्द संकेतों के माध्यम से अंकित करता है।

पड़तालकर्ता महानुभावों ने इन लघुकथाओं को नख से शिख तक भली-भांति जांचा-परखा है और बिना जमा-घटा के निष्पक्ष रूप से उनका विवेचन किया है। खण्ड 23 में सम्मिलित इन रचनाओं में से बहुत-सी रचनाएं अपने कथ्य, शिल्प, संवाद योजना, भावप्रवणता व अर्थदीप्ति के बल पर दूर तक व देर तक पाठक के साथ रहती हैं। ये लघुकथाएं हैं–मौसम, शुरुआत, कर्जदार हरिया, नाखूनों की जबान, शेर की खाल, बच्चा, असल कमाई, बगुला, थैली के चट्टे-बट्टे, बड़े सपने, कच्चे धागे. हाथ की रोटी, खाली फ्रेम, छोटे बड़े, धंधे की चोरी, शोषण-दर-शोषण, चक्रवृद्धि और चेतना। संग्रह की कुछेक लघुकथाओं के शीर्षक चयन में अतिरिक्त चयन श्रम की गुंजाइश थी।

0पुस्तक : मधुकांत की 66 लघुकथाएं और उनकी पड़ताल, संपादक : मधुदीप प्रकाशक : दिशा प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ संख्या : 184 0मूल्य : 400.

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