पुलिस और सेना ही क्‍यों, समाज की ज्‍यादतियां क्‍या कम हैं?

कश्‍मीर में ‘आतंकवादी’ बुरहान वानी के सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में मारे जाने के बाद पुलिस और सेना की भूमिका और उनके द्वारा किए जाने वाले बलप्रयोग को लेकर इन दिनों भारी विवाद है। कहा जा रहा है कि पुलिस और सुरक्षा बलों को नागरिकों की हिंसा से निपटते समय संयम बरतना चाहिए। संसद में इस मुद्दे पर पिछले दिनों हुए हंगामे के दौरान यह बात भी उठी कि पुलिस ने जानलेवा गोलियां चलाने के बजाय, जिस ‘पैलेट गन’ को गैर जानलेवा बताते हुए हिंसा पर उतारू भीड़ पर इस्‍तेमाल करना शुरू किया है, वह भी बहुत गंभीर घाव दे रही है। गृह मंत्री राजनाथसिंह ने भरोसा दिलाया है कि सुरक्षा बलों को संयम बरतने के साथ साथ ‘पैलेट गन’ के विकल्‍प पर भी विचार करने को कहा गया है।

कश्‍मीर में विपक्षी दल जोर शोर से यह मुद्दा उठाते रहे हैं कि पुलिस की ऐसी ज्‍यादतियों और बलप्रयोग के कारण वहां के नागरिकों में और अधिक असंतोष भड़क रहा है और वे उग्रवाद की ओर आकर्षित हो रहे हैं। कश्‍मीर की तरह यह बात नक्‍सली क्षेत्रों और पूर्वोत्‍तर राज्‍यों में भी समय समय पर कही जाती रही है। पूर्वोत्‍तर राज्‍यों में तो आतंकवादी गतिविधियों से निपटने के लिए पुलिस व सुरक्षा बलों को आफ्सपा के तहत मिले विशेष अधिकार वापस लेने की मांग लंबे समय से हो रही है।

लेकिन देश के अलग अलग इलाकों में हो रही हिंसा की घटनाएं क्‍या सिर्फ सुरक्षा बलों या पुलिस की ज्‍यादती के कारण ही हो रही हैं? क्‍या सिर्फ इसी ज्‍यादती के कारण ही लोग आतंकवादी अथवा नक्‍सली बन रहे हैं? क्‍या समाज खुद ऐसी परिस्थितियां पैदा नहीं कर रहा जिससे लोगों में हिंसा करने या हिंसा की तरफ रुख करने की प्रवृत्ति में बढ़ोतरी हो रही है?

अभी हाल ही में गुजरात में कुछ दलित युवकों की, कथित गोरक्षा कार्यकर्ताओं ने जो निर्मम पिटाई की है उसके बाद आई एक सनसनीखेज खबर ज्‍यादा चर्चा में तो नहीं आ सकी लेकिन वह खबर नहीं एक चेतावनी है। यह साफ संकेत दे रही है कि समाज में न सिर्फ विभिन्‍न वर्गों के बीच खाई बढ़ रही है, बल्कि वे हिंसक तरीकों से एक दूसरे से हिसाब-किताब बराबर करने में लगे हैं। पुलिस अथवा कानून व्‍यवस्‍था में लगी एजेंसियों पर से उठता विश्‍वास न केवल लोगों को हिंसक बना रहा है, वरन उन्‍हें संगठित आपराधिक अथवा आतंकवादी गिरोह से जुड़ने की ओर भी धकेल रहा है।

जिस खबर का मैंने यहां जिक्र किया वह कथित गोरक्षा दल कार्यकर्ताओं के हाथों बुरी तरह पिटे दलित युवक रमेश सरवैया के बयान से जुड़ी है। दलित युवकों की पिटाई के बाद पूरे देश में काफी हल्‍ला मचा था और गुजरात सरकार ने पीडि़त दलितों को मुआवजा देने की बात की थी। इसी संदर्भ में रमेश ने मीडिया से चर्चा करते हुए कहा कि ‘’सरकार तो मुआवजे का प्रस्‍ताव दे रही है, लेकिन हम चाहते हैं कि प्रशासन मुआवजे के बजाय हमें उन लोगों को पीटने की इजाजत दे जिन्‍होंने हमारी पिटाई की थी। इस इजाजत के बदले में हम एक लाख रुपए देने को तैयार हैं।‘’

राजकोट से मीडिया रिपोर्ट्स के हवाले से आई इस खबर के तथ्‍यों में थोड़ा बहुत हेरफेर हो सकता है, लेकिन इस खबर की मूल भावना जैसे को तैसा की ही रही होगी, इससे इनकार नहीं किया जा सकता। और यही वह बिंदु है जो सबसे खतरनाक है। यह आंख के बदले आंख और हाथ के बदले हाथ की तर्ज पर, पिटाई के बदले पिटाई अथवा हत्‍या के बदले हत्‍या वाली मनोवृत्ति पूरे समाज के लिए घातक है। जिस तरह से गुजरात के दलित युवकों की पिटाई हुई, उसके दृश्‍य मीडिया में लोगों ने देखें हैं। रोंगटे खड़े कर देने वाले ये दृश्‍य जितनी बार भी देखे जा रहे हैं, वे दलित समुदाय के गुस्‍से को उतना ही गुना बढ़ा रहे हैं। यकीनन इसके साथ बदले की भावना भी बलवती होती जा रही होगी। जरा कल्‍पना कीजिए कि यदि पीडि़त युवक से जुड़ा समुदाय अपनी इस इच्‍छा को अंजाम दे दे, तो दृश्‍य कितना खतरनाक होगा।

ऐसा नहीं है कि ऐसे अपराध पहले नहीं हो रहे थे। लेकिन अब जो अंतर आ रहा है, वो यह है कि ऐसे अपराधों का शिकार होने वाले लोग, आरोपियों से कानून के जरिए नहीं, बल्कि अपनी ताकत से निपट लेना चाहते हैं। और यह ताकत उन्‍हें उनकी जाति, समूह या वर्ग से मिल रही है जो पूरे परिदृश्‍य को और विस्‍फोटक बनाती है। उत्‍तरप्रदेश में भी यही हुआ। भाजपा प्रदेश उपाध्‍यक्ष दयाशंकरसिंह ने बसपा सुप्रीमो मायावती के खिलाफ अभद्र टिप्‍पणी की, तो उनके खिलाफ मामला दर्ज हो गया। लेकिन बसपा के लोगों ने पुलिस कार्रवाई का इंतजार न करते हुए, दयाशंकर के परिवार को कई गुना अधिक गालियां सुनाकर और अभद्र व्‍यवहार कर हिसाब बराबर करने की कोशिश की। अब इसके जवाब में दयाशंकर के परिवार के साथ खड़ा होकर एक वर्ग या समूह बसपा पर कार्रवाई की मांग कर रहा है। यह शाब्दिक और शारीरिक हिंसा का अंतहीन सिलसिला है। यह समाज की हिंसा है और इसे रोकने का जिम्‍मा भी उसी का है। ‘जैसे को तैसा’ का तर्क देकर हम न तो अपनी जिम्‍मेदारी से बच सकते हैं और न ही यह कह सकते हैं कि ‘’नागरिकी हिंसा, हिंसा न भवति…’’

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