सुरेश बाफना का नजरिया : उप्र में कांग्रेस का चुनावी गणित

 

दिल्ली की पूर्व मुख्‍यमंत्री व कांग्रेस की वरिष्ठतम नेता शीला दीक्षित(78) को उत्तर प्रदेश विधानभसभा चुनाव के लिए मुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित करके कांग्रेस पार्टी ने यह स्वीकार कर लिया है कि वह उत्तर प्रदेश में किंग बनने की बजाय किंगमेकर बनना चाहती है। 403 सीट वाली उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के पास फिलहाल 28 सीटें हैं। 2017 के चुनाव में यदि कांग्रेस को 50 से अधिक सीटें भी मिल जाए तो यह उसकी बड़ी उपलब्धि मानी जाएगी। कांग्रेस पार्टी का पहला विकल्प यह था कि बहुजन समाज पार्टी के साथ कोई सम्मानजनक चुनावी तालमेल हो जाए, लेकिन बहन मायावती की तरफ से कोई आशाजनक संकेत नहीं मिला तो कांग्रेस ने अकेले ही चुनाव मैदान में उतरने का फैसला किया है। आजादी के जमाने से उत्तर प्रदेश कांग्रेस पार्टी का बड़ा गढ़ माना जाता था, पर पिछले 25 सालों से पार्टी हाशिए पर बनी हुई है। पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बसपा से तालमेल करके कांग्रेस की दुर्गति की नींव रखी थीं। उन्होंने लगभग तीन-चौथाई सीटें बसपा के हवाले करके कांग्रेस को केवल एक-चौथाई सीटों पर सीमित कर दिया था। बाद में मंडल, कमंडल व बसपा की दलित राजनीति उत्तर प्रदेश के राजनीतिक क्षितिज पर छाई रहीं, जिसमें कांग्रेस पार्टी हर चुनाव में 30 सीटों के भीतर सिमट गई। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का मूल वोट बैंक मुख्य दलित, ब्राहम्ण व मुस्लिम समुदाय हुआ करता था। दलित समुदाय बसपा और ब्राह्म्ण समुदाय भाजपा की झोली में चला गया। मुस्लिम समुदाय के मतदाता सपा व बसपा की तरफ चले गए। उत्तर प्रदेश की राजनीति का मूल सिद्धांत यह हो गया कि यदि किसी पार्टी के पास किसी बड़े जातिगत समुदाय के वोटों का आधार है, तो वह पार्टी अन्य छोटे समुदायों को अपनी तरफ खींच पाने में कामयाब हो सकता है। इसलिए भाजपा और कांग्रेस दोनों ही पार्टियां उन जातिगत समुदायों को अपनी तरफ खींचने की कोशिश कर रहे हैं, जो किन्हीं कारणों से सपा व बसपा से खुश नहीं है। जाहिर है शीला दीक्षित को मुख्‍यमंत्री पद का दावेदार बनाने के पीछे कांग्रेस पार्टी की सोच यह है कि अपने पुराने जनाधार ब्राह्म्ण समुदाय को अपने साथ लाने की कोशिश की जाए। यदि ब्राह्म्ण समुदाय के मतदाता कांग्रेस के पाले में आ गए तो इससे भाजपा की स्थिति कमजोर होगी और कई सीटों पर बसपा को लाभ मिलेगा।

पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान ब्राह्म्ण समुदाय का बड़ा हिस्सा भाजपा के साथ जुड़ गया था। कांग्रेस चुनाव के बाद बसपा के साथ मिलकर सत्ता में पहुंचने का सपना भी देख रही है। चूंकि उत्तर प्रदेश की अधिकांश सीटों पर त्रिकोणीय या चतुष्कोणीय मुकाबला होगा, इसलिए जिस उम्मीदवार को 30-35 प्रतिशत वोट मिल जाएंगे, वह जीत जाएगा। 2012 के चुनाव में 29.15 प्रतिशत वोट प्राप्त करके समाजवादी पार्टी ने 224 सीटों पर विजय पाई थी। वही 25.91 प्रतिशत वोट पाकर बसपा ने केवल 80 सीटें जीती थीं। कांग्रेस को 11.63 प्रतिशत वोट के साथ 28 सीटें मिली थीं। सभी राजनीतिक दल चुनावी मंच पर विकास की बात करेंगे, लेकिन मंच के पीछे जातिगत समीकरण बनाना ही मुख्य लक्ष्य होगा। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का चुनावी अभियान खुले तौर पर जाति के आधार पर चलाया जा रहा है।

2019 में होनेवाले लोकसभा चुनाव के संदर्भ में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव को कांग्रेस पार्टी के लिए जीवन रक्षकअॅाक्सीजन के रूप में देखा जा रहा है। यदि कांग्रेस 20 प्रतिशत वोट के साथ 50 से अधिक सीटें जीतने में कामयाब रहीं तो पार्टी के लिए लोकसभा चुनाव के दौरान मोदी सरकार के खिलाफ अन्य दलों के संभावित गठबंधन का नेतृत्व करने की संभावना बढ़ जाएगी। कांग्रेस का गणित यह है कि ब्राह्म्ण समुदाय के वोट शीला दीक्षित और युवाअों के वोट उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राज बब्बर जुटाने में सफल होंगे। राज्य पार्टी का गठन भी जातिगत समीकरण को ध्यान में रखकर किया गया है। पार्टी के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद को चुनाव प्रभारी बनाया गया है, जो मुस्लिम समुदाय के वोटों को प्रभावित करने की कोशिश करेंगे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार की चुनावी रणनीति बनानेवाले प्रशांत किशोर अब उत्तर प्रदेश में कांग्रेस पार्टी को जिन्दा करने की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। कहा जा रहा है कि उनके सुझाव पर ही शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री पद के रूप में पेश करने का निर्णय लिया गया। कांग्रेस पार्टी की चुनावी रणनीति पूरी तरह शीला दी‍क्षित की इस क्षमता पर टिकी हुई है कि वह किस हद तक ब्राह्म्ण वोटों को कांग्रेस की तरफ आकर्षित कर पाने में सफल होती है? अतीत में बसपा की चुनावी जीत में भी ब्राह्म्ण वोटों का निर्णायक योगदान रहा है। भाजपा यह मानकर चल रही है कि लोकसभा चुनाव की तरह ही ब्राह्म्ण वोटों का बड़ा हिस्सा उसकी झोली में ही गिरेगा। मुस्लिम वोटों के बारे में यह मान लिया गया है कि वह उसी पार्टी या उम्मीदवार के पक्ष में वोट करेगा, जो भाजपा को हराने की स्थिति में है। सोनिया गांधी व राहुल गांधी के प्रदेश में यदि कांग्रेस को विधानसभा चुनाव में सफलता नहीं मिली तो उनके राष्ट्रीय नेतृत्व पर ही गंभीर सवालिया निशान लग जाएगा। उत्तर प्रदेश के कांग्रेस नेता अंतिम ब्रह्मास्त्र के रूप में प्रियंका गांधी को समूचे चुनाव मैदान में उतारने की मांग कर रहे हैं, जो शिखर नेतृत्व द्वारा प्रायोजित अभियान लगता है। प्रियंका को लाने की मांग का सीधा अर्थ यह भी है कि राहुल गांधी का नेतृत्व विफल हो चुका है। पिछले चुनाव नतीजों से स्पष्ट हुआ था कि रायबरेली व अमेठी में भी गांधी परिवार का जादू फीका हुआ है। अब गांधी  परिवार उत्तर प्रदेश में शीला दीक्षित से उम्मीद कर रहा है कि वे जादू की छड़ी घुमाकर कांग्रेस पार्टी में नई जान फूंक दें।

 

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